राजस्थान: दलित युवकों की पिटाई मामले में अब तक क्या हुआ?

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- Author, नारायण बारेठ
- पदनाम, जयपुर (राजस्थान) से, बीबीसी हिन्दी के लिए
राजस्थान के नागौर ज़िले में दो दलित युवकों के साथ ज़्यादती के मामले में पुलिस ने कार्रवाई तेज़ की है. अब तक आठ लोगों की गिरफ़्तारी की जा चुकी है.
कोई चार दिनों तक नेता, अफसर और लोगों की सघन आमदो-रफ़्त के बाद अब उस इलाके में ख़ामोशी है.
दलित संगठन कहते हैं कि सियासी पार्टियां ऐसे मुद्दों पर अपनी सहूलियत देख कर आक्रामकता तय करती है. ऐसी घटनाओं पर सतत निगरानी के लिए बनी राज्य स्तरीय समिति की बीते कई वर्षों से कोई बैठक नहीं हुई. यह समिति मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में काम करती है.
पुलिस के अनुसार 'घटना की हर पहलु से जाँच की जा रही है.
मामले की जांच कर रहे पुलिस अधिकारी मुकुल शर्मा ने बीबीसी को बताया, "आठ लोग गिरफ़्तार किए जा चुके हैं. वे अभी पुलिस हिरासत में हैं और उनसे पूछताछ की जा रही है. अगर कुछ और नाम सामने आए तो उनके ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की जाएगी. हम जल्द से जल्द जाँच पूरी कर अभियोग पत्र दाखिल करेंगे."
पुलिस के अनुसार पीड़ितों का मेडिकल बोर्ड से मेडिकल परीक्षण करवाया गया है. पीड़ित विसाराम और पन्ना राम चचेरे भाई हैं. पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक 16 फ़रवरी को आरोपियों ने चोरी का आरोप लगाते हुए इन दोनों को बेदर्दी से पीटा और गुप्तांगों में पेट्रोल डाल दिया.
विसाराम ने बीबीसी से कहा, "अब वो पहले से बेहतर महसूस कर रहा हूं. उस वक्त तो बहुत बुरा हुआ. मुझे काफी पीटा गया. फिर पता चलने पर मेरे गांव में ही पड़ोसी मौके पर पहुंचे और मदद की."
24 साल का विसाराम पढ़ नहीं सका. खेती मजदूरी कर जीवन यापन करता है.
वे कहते हैं, "मुझे सिर्फ हस्ताक्षर करने आते हैं. हम दस भाई है. ज़मीन बहुत कम है. अभी चार भाई पढ़ रहे हैं."
विसाराम को सात माह की एक बेटी है. वे कहते हैं, "नियति ने साथ दिया तो बेटी को अच्छा पढ़ाऊंगा."

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जब से यह घटना हुई है उनसे मिलने वालों का तांता लग गया. कोई मंत्री है तो कोई अफसर. वे उनके नाम नहीं जानते पर कहते हैं कि उनमें से कोई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास बैठते हैं तो कोई राहुल गांधी के नजदीकी हैं. हालांकि इस आवाजाही से उनके गिरे हुए मनोबल में वापस जान आई है.
क्या हुआ था विसाराम के साथ?
पुलिस में विसाराम ने जो रिपोर्ट लिखवाई है उसके मुताबिक, वे एक स्थानीय सर्विस सेंटर पर अपनी मोटर साइकिल की सर्विस के लिए गए थे. वहीं सर्विस सेंटर के लोगों ने चोरी का आरोप लगाते हुए उन्हें यातनाएं दीं और बेरहमी से पीटा. उनके गुप्तांगों में पेचकस घुसा दिया गया. इस पूरे मामले का वीडियो वायरल होने के बाद यह घटना दुनिया के सामने आई. इसके बाद पुलिस ने एफ़आईआर दर्ज की और प्रशासन हरकत में आ गया.
पीड़ित अनुसूचित जाति के नायक समाज से हैं. नायक समाज के नेता गौतम नायक ने बीबीसी से कहा, "अब तक की कार्रवाई से तसल्ली है मगर हम नज़र रखे हुए हैं. हम चाहते हैं कि मामले की जाँच के बाद अदालत में दिन प्रतिदन सुनवाई हो और विशेष अभियोजक नियुक्त किया जाए." नायक कहते हैं कि सरकार ने उनकी यह मांग मान ली है लेकिन हम कोई ढील नहीं देंगे.
गौतम कहते हैं, "इस घटना में अभियुक्त राजपूत समाज से हैं. लेकिन यह अच्छी बात है कि राजपूत समाज के किसी भी व्यक्ति ने आरोपियों की न तो हिमायत की और न ही सोशल मीडिया पर पक्ष-विपक्ष में कोई टिप्पणी की. बल्कि स्थानीय राजपूत समाज ने घटना की कड़ी निंदा की है.
घटना के बाद राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के तीन लोगों की एक समिति मौके पर पहुंच कर पीड़ितों से मुलाक़ात की और उन्हें सांत्वना दी. इस समिति में समाज कल्याण मंत्री भंवर लाल मेघवाल भी शामिल थे.
वहीं केंद्र सरकार की तरफ से केंद्रीय मंत्री अर्जुन मेघवाल बीजेपी नेताओं के साथ वहां पहुंचे और पीड़ितों से बात की.

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राज्य के राजस्व मंत्री हरीश चौधरी ने भी दौरा किया और पीड़ितों को न्याय का वादा किया. सरकार ने पीड़ितों को पचास पचास हज़ार की सहायता राशि दी है.
कांग्रेस पर विपक्ष का हमला
नागौर से राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक पार्टी के सांसद हनुमान बेनीवाल और उनकी पार्टी के तीन विधायकों ने इस घटना को लेकर सरकार को जमकर घेरा.
बेनीवाल के नेतृत्व में लोगों ने धरना दिया, विरोध प्रदर्शन किया और कहा कि वे इंसाफ़ मिलने तक लड़ाई जारी रखेंगे.
बेनीवाल ने इस घटना के लिए पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है.
सांसद बेनीवाल ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर निशाना साधा है.
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया कहते है कांग्रेस सरकार आने के बाद कानून व्यवस्था बिगड़ गई है. अब जबकि गृह मंत्री खुद गहलोत है, ऐसे में उन्हें नैतिक आधार पर पद छोड़ देना चाहिए.
इस बीच दलित संगठनों ने भी अपने स्तर पर मामले की जाँच की है और सरकार को ज्ञापन दिया है.
नागौर में मौके का दौरा कर लौटे दलित अधिकार केंद्र के सतीश कुमार ने बीबीसी से कहा. "हमारे कहने के बाद पुलिस ने दंड विधान की धारा 326 भी जोड़ दी है. इसके तहत ऐसे अपराध में दस साल से लेकर उम्र कैद तक की सजा का प्रावधान है."

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राजनीतिक पार्टियों से नाराज़ दलित संगठन
कुमार कहते हैं, "राजनीतिक पार्टियां उन्ही मामलों में बढ़ चढ़ कर आगे आती हैं जो सुर्खियों में रहता है. हमारा अनुभव कहता है जब किसी घटना पर नागरिक अधिकार संगठन मुखर होते है, उसके बाद ही सियासी पार्टियां सक्रिय होती है."
कुमार कहते है, "कानून के तहत मुख्य मंत्री के नेतृत्व में बनी निगरानी कमेटी की साल में दो बैठक होना जरूरी है. पर पिछले सात साल से इस कमेटी को बैठक करने का वक्त नहीं मिला. आखिरी बैठक गहलोत के नेतृत्व में 2012 में हुई थी. इसके बाद बीजेपी पांच साल हुकूमत में रही, कोई बैठक नहीं हुई. कांग्रेस फिर से सत्ता में आ गई, मगर अब तक कोई बैठक नहीं हुई है, यह रवैया बताता है ये दल कितने गंभीर हैं."
दलित महिला अधिकार मंच की राज्य समन्वयक सुमन देवठिया ने बीबीसी से कहा, "दलित अत्याचार की घटनाओं में सियासी पार्टियां जाति देख कर अपनी कार्रवाई की गहनता तय करती है. जब जो विपक्ष में होता है, घटना होने पर जोर शोर से विरोध करता है. लेकिन सत्ता में आते ही रुख बदल जाता है."
"हमें याद है 2017 में डेल्टा मेघवाल की हत्या और बलात्कार के मामले में क्या हुआ था. राजनीतिक दल अपनी सुविधा के अनुसार प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं. फिर दलितों में जो छोटी और कमजोर जातियां है, उनके साथ हुई सितम की घटना को अधिक महत्व नहीं मिलता है.
वहीं, दलित अधिकार केंद्र के सतीश कुमार कहते है कि दलितों के साथ नाइंसाफ़ी रोकने में न तो सियासी दलों की इच्छा शक्ति है और न ही उनकी मंशा है.

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