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लोगों के कश्मीर को सिर्फ़ प्रॉपर्टी मानने की बात दिल्ली की लड़की ने क्यों कही?
दिल्ली की सौम्या और श्रीनगर की दुआ एक दूसरे को चिट्ठियों के ज़रिए अपनी ज़िंदग़ी के बारे में बता रही हैं. बात हो रही है जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटने की, दिल्ली के शाहीन बाग़ की, स्कूलों या कोचिंग में पढ़ाई की मुश्किलों की. छह चिट्ठियों में ये है पाँचवीं चिट्ठी-
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- दुआ की पहली चिट्ठी और दूसरी चिट्ठी पढ़ने के लिए क्लिक करें
तारीख़ - 26.01.20
प्यारी दुआ,
तुम्हारी चिट्ठी से वहां के स्टूडेंट्स की स्थिति के बारे में जानकर बेचैनी होती है और अपना भविष्य भी कुछ वैसा ही दिखता है क्योंकि जिस तरह पढ़ाई आज की सरकार के लिए ज़्यादा ज़रूरी नहीं है और जिस तरह के बदलाव शिक्षा के क्षेत्र में आ रहे हैं वो हमें कहां ले जाएंगे ये कह पाना मुश्किल है.
नीति आयोग के सदस्य वीके सारस्वत का बयान कोई पहला नहीं है. इससे पहले भी काफ़ी लोगों ने कश्मीर के लिए या शिक्षा और स्वास्थ्य पर ऐसे बयान दिए हैं.
साल-दो-साल पहले तब केंद्रीय राज्य मंत्री रहे अश्विनी कुमार चौबे ने कहा था, "बिहारी दिल्ली के एम्स अस्पताल में बेकार में भीड़ बढ़ा रहे हैं". ये बयान भी दिल तोड़ने वाला था.
मैं बस तुम्हें इस बात का अंदाज़ा देना चाहती हूं कि सिर्फ़ कश्मीर ही नहीं और भी राज्यों के लिए हमारी सरकार बहुत कुछ कह चुकी है.
मुझे लगता है कि यहां लोग कश्मीर को देश की क़ीमती प्रॉपर्टी की तरह मानते हैं और इनकी नज़र में कश्मीरी लोगों की और कोई अहमियत नहीं है.
अभी दो-चार दिन पहले टीवी पर 'शिकारा' फ़िल्म, जो सात फ़रवरी को रिलीज़ होने वाली है, उस पर चर्चा हो रही थी. ये फ़िल्म कश्मीरी पंडितों पर बनी है.
तीस साल से उनके हालात पर यहां की अवाम के बीच कोई चर्चा नहीं हुई. और इस फ़िल्म के आने से भी मुझे नहीं लगता लोग इसे देखने जाएंगे या इसके बारे में बात करेंगे क्योंकि उस टीवी प्रोग्राम से पहले हमने 'शिकारा' फ़िल्म का नाम तक नहीं सुना था.
मुझे लगता है कि चाहे वो कश्मीर हो या उत्तर या दक्षिण भारत का कोई क्षेत्र, सभी जगह रहने वाले लोगों को इंटरनेट, शिक्षा, स्वास्थ्य और बराबरी पाने का पूरा हक़ है.
और इस सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ आंदोलन में जो मैंने सीखा है वो ये कि अधिकार क़ानून से नहीं मिलते हैं, इन्हें पाने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है.
वैसे तो 26 जनवरी के आस-पास हर जगह सिक्योरिटी बढ़ जाती है, ट्रैफ़िक धीमा हो जाता है. लेकिन एक-दो दिन से ज़्यादा छुट्टियां नहीं होती. मैं ये जानना चाहती हूं कि क्या हर साल इसी तरह से तुम्हारे कोचिंग क्लास एक हफ़्ते पहले बंद कर दिए जाते हैं या इस बार ही ऐसा हुआ है?
मैं इसे स्टूडेंट्स के साथ सरासर ज़्यादती मानती हूं और उम्मीद करती हूं कि ये सब जल्द ठीक हो जाए ताकि तुम और कश्मीर के सारे स्टूडेंट्स अच्छे से पढ़ाई पूरी कर पाएं.
तुम्हें याद होगा कि पिछली बार जब हम लोगों ने चिट्ठियाँ लिखी थीं और बीबीसी पर लाइव आए थे तो तुम्हें भी बहुत ट्रोल किया गया था और मुझे भी.
लेकिन मुझे हमारी दोस्ती बहुत पसंद है और इन चिट्ठियों से मैं कश्मीर और मुसलमानों के बारे में जो आम धारणाएं हैं उससे अलग बहुत कुछ समझ पाई हूं.
बहुत सारे मुसलमान हमारे फ़ैमिली फ़्रेंड्स हैं लेकिन इन मसलों पर खुलकर उनसे बात नहीं हो पाती कि कहीं वो बुरा ना मान जाएँ.
इस सीएए-एनआरसी के मुद्दे ने मेरे हिंदू होने के बावजूद मुझे इसका विरोध करने के लिए प्रेरित किया क्योंकि मैं सोचती हूं कि अन्याय किसी के भी ख़िलाफ़ हो वो अन्याय ही होता है और हमें उसका विरोध करना चाहिए.
और मैं तुमसे ये जानना चाहती हूं कि क्या तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के लोगों के अंदर आज के समय में, आज की बदलती परिस्थिति में मुसलमान होने के कारण डर है?
जितना तुम्हारे पत्र से मुझे कश्मीर के बारे में पता चला, उस सबने मेरे काफ़ी सारे डर को ख़त्म किया है और मुझमें कश्मीर और कश्मीरियों के बारे में जानने की इच्छा बढ़ाई है.
मुझे पहले आम समाज की धारणा और मीडिया के द्वारा बनाई गई छवि डराती थी लेकिन तुमसे बात करने के बाद मैं कश्मीर आने के लिए उत्सुक हूं और वहां की ज़िंदगी को क़रीब से देखना और समझना चाहती हूं. क्या अब कश्मीर वादी बाहर के लोगों के लिए खुली है या नहीं?
उम्मीद है ऐसे ही संपर्क बना रहे.
सौम्या
जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में बड़ी हो रही 17 साल की दुआ भट और दिल्ली की 18 साल की सौम्या सागरिका ने एक-दूसरे की अलग ज़िंदगियों को समझने के लिए चिट्ठियों के ज़रिए दोस्ती की.
क़रीब दो साल पहले एक-दूसरे को पहली बार लिखा. कई आशंकाएं दूर हुईं.
फिर पिछले साल अगस्त में जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के साथ-साथ वहां कई सारी बंदिशें लागू कर दी गईं. संपर्क करना मुहाल हो गया. पाँच महीने बाद जब इनमें कुछ ढील दी गई ख़तों का सिलसिला फिर शुरू हुआ.
दोनों के बीच दिसंबर से फ़रवरी के दौरान लिखे गए छह ख़तों में से यह तीसरा ख़त है. इस चिट्ठी में लिखी बातें सौम्या की अपनी राय और समझ हैं जिनमें बीबीसी ने कोई फेरबदल नहीं किया है.
(प्रोड्यूसर: बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य; इलस्ट्रेटर: नीलिमा पी. आर्यन)
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