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कश्मीर की लड़की के मन में सीएए-एनआरसी पर क्या सवाल हैं?
दिल्ली से सौम्या और श्रीनगर की दुआ एक-दूसरे को चिट्ठियाँ लिख रही हैं. दोनों अब तक धारा 370 से लेकर सीएए और एनआरसी तक की बातें कर रही हैं. इस कड़ी में छह चिट्ठियाँ लिखी गईं हैं. नीचे पढ़िए चौथी चिट्ठी.
तारीख़ - 23.01.20
प्यारी सौम्या,
जब मैंने जेएनयू के स्टूडेन्ट्स पर हमले की ख़बर सुनी तो सदमे में आ गई. सच कहूं तो इन दिनों ख़बरों के लिए टीवी ऑन करने से डर लगता है. देश में जो हो रहा है वो चौंकाने वाला ही नहीं बल्कि दिल तोड़ने वाला भी है.
आपने सीएए और एनआरसी के बारे जो कहा उससे तो लगता है कि हम आगे बढ़ने की जगह पीछे होते जा रहे हैं.
मुझे अब भी यक़ीन नहीं हो रहा कि 21वीं सदी में भी लोग जाति, धर्म और समाज के कुछ हिस्सों में तो जेंडर के आधार पर भेदभाव करते हैं.
हमारे समाज से ये चलन ख़त्म करने की ज़रूरत है, तभी हम ख़ुद को 'मॉडर्न' या 'ब्रॉड-माइंडेड' कह पाएंगे.
मेरे ख़याल से सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन एकदम सच्चे हैं और इस बात का सबूत हैं कि लोग अब भी एक-दूसरे के लिए खड़े होने में यक़ीन रखते हैं और मानवता ज़िंदा है.
देश के और शहरों से अलग, कश्मीर में इस क़ानून पर शांति बनी हुई है. अपने दिलों में हम जानते हैं कि ये क़ानून ग़लत है पर इन दिनों हम कश्मीरियों को वादी के बाहर के हालात की ज़्यादा परवाह नहीं है.
इसलिए यहां कोई प्रदर्शन नहीं हो रहे. हम अगर अपनी आवाज़ उठाना भी चाहें तो जानते हैं कि वो दबा दी जाएगी. हमारी आवाज़, हमारे हक़ूक़ पहले भी नज़रअंदाज़ किए जा चुके हैं और अब भी किए जा रहे हैं.
कुछ दिन पहले नीति आयोग के एक सदस्य, वी के सारस्वत ने यहां लगाए कम्यूनिकेशन बैन की सफ़ाई में ये तक कह डाला कि, "कश्मीरी इंटरनेट का इस्तेमाल सिर्फ़ 'गंदी फ़िल्में' देखने के लिए ही करते हैं".
उन्होंने ये भी कहा कि इंटरनेट बंद करने का अर्थव्यवस्था पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ता. हम आम लोगों के लिए 18,000 करोड़ रुपए बहुत बड़ी रक़म है पर लगता है कि अधिकारियों के लिए ये कोई मायने नहीं रखती.
हालांकि उन्होंने अपने इन बयानों के लिए बाद में माफ़ी भी मांगी पर ऐसी बातें हम दिमाग़ से यूँ ही निकालकर फेंक भी तो नहीं सकते.
बाक़ी मुल्क के लिए इनविज़िबल?
क्या वहां लोग हमारे बारे में सचमुच ऐसा सोचते हैं? क्या कश्मीरियों को कम्यूनिकेशन सर्विसेज़ का कोई हक़ नहीं है? इंटरनेट बैन की वजह से हमें जो दिक्क़तें आ रही हैं उनके बारे में कोई बात ही नहीं कर रहा है.
क्या हम बाक़ी मुल्क के लिए बिल्कुल इनविज़िबल (ग़ायब) हो गए हैं?
आप कश्मीरी औरतों के बारे में जानना चाहती हो ना. कश्मीरी औरतें मज़बूत इरादों की मिसाल हैं. 90 के दशक में अगर उन्होंने हिम्मत ना दिखाई होती तो आज कश्मीर हमारे लिए एक क़ैद बन गया होता.
आज हमें यहां एक ही चीज़ रोके हुए है और वो है हमारे परिवारों के लिए हमारा प्यार. यहां अगर हम खुल के बोलेंगे तो हमारे परिवार मुश्किल में पड़ जाएंगे, इसीलिए हममें से ज़्यादातर अब खुल कर नहीं बोलते.
पर इसका मतलब ये नहीं कि हम ऐसा कर नहीं सकते और ये मतलब बिल्कुल भी नहीं कि ज़रूरत पड़ने पर नहीं करेंगे.
सौम्या, 26 जनवरी अब बहुत क़रीब है. मैं जानना चाहती हूं कि दिल्ली भी क्या बेहिसाब तलाशियों से गुज़रती है?
मुझे मालूम है कि ये ज़रूरी है पर क्या इस व़क्त की जाने वाली बेहिसाब तलाशियां और एहतियात बच्चों की पढ़ाई पर असर डालते हैं?
क्या कभी रिपब्लिक डे से एक हफ़्ता पहले से कोचिंग सेंटर्स बंद किए गए हैं?
यहां कश्मीर में ये अधिकारियों के बीच नया 'ट्रेंड' लगता है, क्योंकि हमारे कोचिंग सेंटर नेशनल हॉलिडे से एक हफ़्ता पहले बंद कर दिए गए हैं.
पहले ही पिछले छह महीनों में हमारी पढ़ाई का बहुत नुक़सान हुआ है. स्कूल में सर्दी की छुट्टियां चल रही हैं और इंटरनेट ना होने की वजह से ज़्यादातर स्टूडेंट्स ने पढ़ाई में हुए नुक़सान की भरपाई के लिए कोचिंग लेनी शुरू कर दी है.
ऐसे हालात में पढ़ाई के मामले में हर घंटा क़ीमती है और स्टूडेन्ट्स के लिए ज़्यादा छुट्टी लेना मुनासिब नहीं.
आज 26 जनवरी के नाम पर हो रहा है, कल 14 फ़रवरी (पुलवामा हमले की सालगिरह) के नाम पर होगा. आपको लगता है कि नेशनल हॉलिडे के नाम पर पढ़ाई को रोकना वाजिब है?
आपके जवाब के इंतज़ार में.
दुआ
जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में बड़ी हो रही 17 साल की दुआ भट और दिल्ली की 18 साल की सौम्या सागरिका ने एक-दूसरे की अलग ज़िंदगियों को समझने के लिए चिट्ठियों के ज़रिए दोस्ती की.
क़रीब दो साल पहले एक-दूसरे को पहली बार लिखा. कई आशंकाएं दूर हुईं.
फिर पिछले साल अगस्त में जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के साथ-साथ वहां कई सारी बंदिशें लागू कर दी गईं. संपर्क करना मुहाल हो गया. पाँच महीने बाद जब इनमें कुछ ढील दी गई तो ख़तों का सिलसिला फिर शुरू हुआ.
दोनों के बीच दिसंबर से फ़रवरी के दौरान लिखे गए छह ख़तों में से यह चौथा ख़त है. इस चिट्ठी में लिखी बातें दुआ की अपनी राय और समझ हैं जिनमें बीबीसी ने कोई फेरबदल नहीं किया है.
(प्रोड्यूसर: बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य; इलस्ट्रेटर: नीलिमा पी. आर्यन)
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