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कश्मीरी लड़की से दिल्ली की लड़की के सवाल
जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में बड़ी हो रही 17 साल की दुआ भट और दिल्ली की 18 साल की सौम्या सागरिका ने एक-दूसरे की अलग ज़िंदगियों को समझने के लिए चिट्ठियों के ज़रिए दोस्ती की.
क़रीब दो साल पहले जब एक-दूसरे को लिखा तो सौम्या ने कश्मीर में नौजवानों के पत्थरबाज़ी करने और आज़ादी की मांग करने पर अपनी जिज्ञासा रखी.
दुआ ने बताया कि हड़तालें, स्कूलों का बंद किया जाना, इंटरनेट और फ़ोन बंद करने से कश्मीर में पढ़ रही लड़कियों को कितनी दिक़्क़त होती है.
फिर पिछले साल अगस्त में जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के साथ-साथ वहां कई सारी बंदिशें लागू कर दी गईं. वहां संपर्क करना मुश्किल हो गया. पांच महीने बाद जब इनमें कुछ ढील दी गई, सौम्या ने दुआ को फिर लिखना शुरू किया.
पढ़िए दिसंबर से फ़रवरी के बीच दोनों के लिखे गए छह ख़तों में से पहला ख़त, जो दिल्ली से सौम्या ने लिखा है.
तारीख़ - 18 दिसंबर 2019
प्यारी दुआ,
दिल्ली से प्यार भरा सलाम.
कैसी हो तुम? घर में सब कैसे हैं? हमारे आख़िरी पत्र के बाद किया हुआ वादा कि हम हमेशा "पेन-पैल्स" रहेंगे शायद थम सा गया था, पर दोबारा ये सिलसिला शुरू कर मुझे बेहद ख़ुशी हो रही है.
तुमसे बात करना या अगर मैं ये कहूं कि पत्र से तुमसे बात करना मेरे लिए काफ़ी अलग अनुभव रहा है.
मुझे अपनी बात रखने का एक ज़रिया मिला है जो मुझे शायद ही कभी मिल पाता और सबसे बड़ी बात जो मैंने पहले भी अपने पत्रों में कही है कि दूसरे शहर में एक दोस्त बनाकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई. तुम्हारे लिए ये अनुभव कैसा है?
तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है? और तुम्हारे भाई अवीन की?
मैंने भी अपनी 12वीं क्लास की परीक्षा इस बार दी और अब दिल्ली विश्वविद्यालय से इंग्लिश ऑनर्स में बी.ए. कर रही हूं. साथ में इटैलियन भाषा का कोर्स भी कर रही हूं.
कॉलेज की ज़िंदगी स्कूल की ज़िंदगी से काफ़ी अलग है. मेरे कॉलेज में ना सिर्फ़ दिल्ली बल्कि भारत के कई शहरों से स्टूडेन्ट्स आते हैं और उनके साथ रहकर उनकी संस्कृति को जानने का मज़ा ही कुछ और है.
दो साल में तो काफ़ी कुछ बदला होगा तुम्हारी ज़िंदगी और तुम्हारे आस पास के माहौल में. अभी कुछ महीनों पहले सुनने में आया कि कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटा दिया गया है.
कुछ समय तक वहां टेली-कम्युनिकेशन भी ठप रहा और इंटरनेट तो शायद अब भी चालू नहीं हुआ है.
वैसे तो इंटरनेट और टेली-कम्युनिकेशन पहले भी बंद होता रहा है जिसके बारे में हमने पिछले पत्रों में बात भी की थी.
पर जब से जम्मू-कश्मीर यूनीयन टेरिटरी बना है तबसे वहां का माहौल तो ज़रूर बदला होगा. वहां के लोग सुरक्षित तो हैं ना?
अब दिल्ली और बाक़ी हिंदुस्तान का एक तबका वहां प्लॉट ख़रीदने और शादी करने के ख़्वाब देख रहा है. भले ही उनको यहां भर-पेट खाना नसीब ना हो और रहने को छत ना हो.
इन लोगों को ये बात समझ नहीं आ रही कि कश्मीर को अब उद्योगपतियों के हवाले छोड़ दिया जाएगा और वहां के पर्यावरण को जो नुक़सान होगा वो पूरे देश को प्राकृतिक आपदाओं की ओर धकेलेगा.
इस सबके बारे में तुम क्या सोचती हो? और कश्मीर के लोग कैसे देखते हैं इस बदलाव को?
मुझे माफ़ करना कि पहले ही पत्र में मैं तुम्हें इतने सारे सवालों से परेशान कर रही हूं, पर ये बातें कहीं न कहीं मुझे बहुत परेशान कर रहीं थी और तुमसे अच्छी जानकारी मुझे शायद कोई और न दे पाए.
तुम्हारे अगले पत्र के इंतज़ार में,
तुम्हारी दोस्त
सौम्या
(सौम्या के खत का जवाब श्रीनगर से दुआ ने लिखा है जिसे रविवार को बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम पर प्रकाशित किया जाएगा.)
प्रोड्यूसर: बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य;
इलस्ट्रेटर: नीलिमा पी. आर्यन
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