चौरी-चौरा से राजघाट की पदयात्रा पर निकले दस लोग गिरफ़्तार, जेल में शुरू किया अनशन

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर ज़िले में चौरीचौरा से राजघाट तक पदयात्रा निकाल रहे दस लोगों को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया है. मजिस्ट्रेट ने उन लोगों को ज़मानत देने की शर्त यह रखी है कि हर व्यक्ति ढाई लाख रुपये जमा करे और किसी राजपत्रित अधिकारी से उसकी पुष्टि कराए.
गिरफ़्तार किए गए लोगों में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सात छात्र और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अलावा दिल्ली की एक पत्रकार प्रदीपिका सारस्वत भी शामिल हैं. ये सभी लोग दो फ़रवरी से गोरखपुर के चौरी चौरा से दिल्ली स्थित राजघाट तक की क़रीब तेरह सौ किलोमीटर की पदयात्रा पर निकले थे.
क़रीब नौ दिन की यात्रा के बाद ग़ाज़ीपुर पहुंचने पर इन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया.
नागरिक सत्याग्रह यात्रा ने नौ दिनों में तीन ज़िले- गोरखपुर, आज़मगढ़ और मऊ पार करते हुए ग़ाज़ीपुर में प्रवेश किया. सत्याग्रह में शामिल लोगों के मुताबिक, इन जगहों पर न तो किसी ने रोकने की कोशिश की और न ही किसी तरह की चेतावनी दी गई लेकिन ग़ाज़ीपुर पहुंचते ही पहले हमारे साथ पुलिस लगाई गई और फिर मरदह थाने के बाद सत्याग्रह में शामिल लोगों से पूछताछ की गई और फिर उन्हें हिरासत में ले लिया गया.
ग़ाज़ीपुर के पुलिस अधीक्षक डॉक्टर ओम प्रकाश सिंह ने बीबीसी को बताया, "पूरे ज़िले में धारा 144 लगी है. मुख्य रूप से धारा 144 के उल्लंघन के आरोप में ही इन लोगों को गिरफ़्तार किया गया है लेकिन कुछ ऐसे दस्तावेज़ भी इनके पास से मिले हैं जिनसे माहौल ख़राब होने की आशंका थी. गिरफ़्तार करने के बाद मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया तो उन्होंने न्यायिक हिरासत में भेज दिया."
पर्चे में क्या लिखा है?
एसपी ने इस बारे में कोई भी जानकारी देने से मना कर दिया कि सत्याग्रहियों के पास से कौन से आपत्तिजनक दस्तावेज़ मिले हैं लेकिन सत्याग्रह से जुड़े दिवाकर बताते हैं कि ज़रूरी सामान के अलावा केवल वो पर्चे उनके पास हैं जिनमें पैदल यात्रा का मक़सद, गांधी की विचारधारा और सीएए क़ानून के ख़िलाफ़ हुई पुलिस कार्रवाई के बारे में जानकारी दी गई है.
इन लोगों के पास जो पर्चा है उसमें लिखा है, "हमारा सत्याग्रह अपने अंदर के डर, झूठ और हिंसा के ख़िलाफ़ है. साथ ही, हाल ही में उत्तर प्रदेश में सीएए और एनआरसी आंदोलन में आम आदमी पर हुए बर्बर ज़ुल्म और दमन के भी ख़िलाफ़ है. इस दमन में न सिर्फ़ 23 लोगों की जानें गईं बल्कि सैकड़ों लोग घायल भी हुए."
'आओ हमारे साथ चलो' नाम से छपे इन पर्चों में भारत का मतलब?, लोकतंत्र क्या है? और आज क्या हो रहा है? शीर्षकों के ज़रिए मौजूदा परिस्थितियों और सरकारी कार्रवाइयों की चर्चा की गई है.
बताया जा रहा है कि ये बातें सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाली हैं और इसी वजह से इस यात्रा को रोकने की कोशिश की गई है.

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ढाई ढाई लाख रुपये के दो बॉन्ड भरने तक जमानत नहीं
वहीं गिरफ़्तारी के अगले दिन यानी बुधवार को ग़ाज़ीपुर के उप ज़िलाधिकारी सदर प्रभास कुमार की कोर्ट में ज़मानत की अर्जी डाली गई लेकिन उप ज़िलाधिकारी ने इन लोगों को तब तक ज़मानत देने से इनकार कर दिया जब तक कि ज़मानत की राशि नहीं जमा कराते.
ज़मानत के लिए दिए गए आदेश में एसडीएम ने कहा है कि जितने लोग गिरफ़्तार किए गए हैं, सभी को ढाई-ढाई लाख रुपये के दो-दो बॉन्ड भरने हैं हर व्यक्ति को दो राजपत्रित अधिकारियों से गारंटी भी दिलानी होगी.
हालांकि मजिस्ट्रेट के इस आदेश के ख़िलाफ़ गिरफ़्तार किए गए लोगों ने जेल में ही भूख हड़ताल शुरू कर दी है. यात्रा में शामिल धनंजय कहते हैं, "कोई भी व्यक्ति ग़ाज़ीपुर का रहने वाला नहीं है, उसे कोई राजपत्रित अधिकारी कैसे गारंटी देगा. हम लोग बुधवार को दिन भर इस शर्त को हटाने की अपील करते रहे लेकिन नहीं सुनी गई. अब हम इसके ख़िलाफ़ ज़िला अदालत और फिर हाईकोर्ट जाएंगे."
जहां तक धारा 144 के उल्लंघन और आपत्तिजनक दस्तावेज़ के लिए ढाई लाख रुपये के बॉन्ड का सवाल है तो क़ानून के जानकारों में ये उतना बड़ा मामला नहीं है लेकिन बॉन्ड की राशि तय करना मजिस्ट्रेट के विवेक पर निर्भर करता है.
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता दुष्यंत पाराशर बताते हैं, "बॉन्ड की राशि पूरी तरह से मजिस्ट्रेट के ऊपर निर्भर करती है कि वो सौ रुपये भी तय कर सकता है और लाख रुपये भी. लेकिन अहम बात ये है कि केस की मेरिट क्या है. ग़ाज़ीपुर का मामला प्रथम द्रष्ट्या ऐसा कहीं से नहीं लगता कि उसमें ढाई लाख रुपये के बॉन्ड की ज़रूरत हो. लेकिन, यदि यह तर्कसंगत नहीं होगा तो अदालत इसे ख़ुद ही ख़ारिज कर देगी."

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'हमने क़ानून का उल्लंघन नहीं किया'
धनंजय त्रिपाठी बताते हैं कि यात्रा कर रहे सत्याग्रहियों ने कहीं भी धारा 144 का उल्लंघन नहीं किया. उनके मुताबिक, "हर दिन दस-बारह लोग एक साथ चल रहे थे और तीन-चार की टोलियों में लोगों से मिलते-जुलते और संवाद करते हुए जा रहे थे. लोगों को हम ये भी बताना चाहते थे कि हम चौरी चौरा से इसलिए यात्रा की शुरुआत कर रहे हैं क्योंकि यही वो जगह थी जहां 1922 में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ हुई हिंसा के कारण महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था. महात्मा गांधी का स्पष्ट संदेश था कि हिन्दुस्तान में हिंसा को लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, भले ही वो हमारा दुश्मन ही क्यों न हो."
पदयात्रा करने वाले सत्याग्रही जिन तीन अन्य ज़िलों को पार करते हुए आगे बढ़े, धारा 144 वहां भी लागू थी और वहां भी इनके पास ये सभी दस्तावेज़ रहे ही होंगे लेकिन वहां किसी को भी न तो गिरफ़्तार किया गया और न ही किसी से कोई पूछताछ की गई.
इस सवाल के जवाब में एसपी ओम प्रकाश सिंह साफ़तौर पर कहते हैं, "हमें अन्य ज़िलों के बारे में नहीं मालूम लेकिन ग़ाज़ीपुर में इन लोगों ने क़ानून का उल्लंघन किया, इसलिए उन्हें गिरफ़्तार किया गया."

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गिरफ़्तार लोगों में प्रदीपिका सारस्वत अकेली महिला
सत्याग्रह में शामिल छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का यह वही समूह है जिसने पिछले महीने नागरिकता संशोधन क़ानून यानी सीएए के ख़िलाफ़ उत्तर प्रदेश में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा में पुलिस कार्रवाई पर सवाल खड़े करते हुए 'स्टूडेंट्स रिपोर्ट ऑन पुलिस ब्रुटैलिटी एंड आफ़्टरमैथ' नामक रिपोर्ट जारी की थी. इनकी यात्रा का प्रथम चरण बनारस में 16 फरवरी 2020 को बनारस में सम्पन्न होना तय था.
गिरफ़्तार लोगों में इस पदयात्रा को कवर कर रहीं स्वतंत्र पत्रकार प्रदीपिका सारस्वत को भी गिरफ़्तार किया गया है और वो गिरफ़्तार लोगों में अकेली महिला भी हैं.
प्रदीपिका सारस्वत ने गिरफ़्तार होने से पहले ही सोशल मीडिया के ज़रिए ये सूचना दी थी कि पुलिस उन लोगों पर कुछ दिनों से नज़र रख रही है और यात्रा को लेकर सवाल-जवाब भी किए जा रहे थे.
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