दिल्ली चुनाव नतीजे : क्या बीजेपी के ख़िलाफ़ मुसलमान एकजुट हो गए?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्या इस बार के दिल्ली विधानसभा चुनाव में मुसलमानों ने बीजेपी का खेल बिगाड़ा?
इस सवाल का उत्तर जानने के पहले, कुछ तथ्यों पर नज़र डालना ज़रूरी है.
•दिल्ली की 70 में से 6 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहाँ मुसलमान वोटरों की संख्या 40 फीसदी से ज़्यादा है.
•इनमें से सभी सीटों पर आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की.
•सभी सीट पर दूसरे नंबर पर बीजेपी के उम्मीदवार रहे.
•2015 में बीजेपी ने मुस्तफ़ाबाद सीट जीती थी, इस बार वह हार गई.

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दिल्ली की वो 6 सीटें, जिन पर मुस्लिम वोटरों की संख्या बाकी विधानसभा सीटों से ज़्यादा है, वो हैं - ओखला, बल्लीमारान, मटिया महल, मटियाला, सीलमपुर और मुस्तफ़ाबाद. इन सीटों पर इस बार कौन हारा, कौन जीता यह जानना अपने आप में दिलचस्प है.
ओखला - पूरे दिल्ली विधानसभा चुनाव में एक सीट जिस पर सबसे ज़्यादा चर्चा हुई, वह है ओखला विधानसभा सीट. आम आदमी पार्टी के अमानतउल्ला ख़ान ने इस सीट पर पिछली बार भी जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार फ़ासला पहले से ज़्यादा रहा. 2015 में अमानतउल्ला खान 65 हज़ार वोट से विजयी हुए थे. इस बार यह अंतर लगभग 72 हज़ार वोटों का रहा. कांग्रेस के परवेज़ हाशमी को सिर्फ 5 हज़ार वोटों से संतोष करना पड़ा.
बल्लीमारान - आम आदमी पार्टी के इमरान हुसैन ने जीत दर्ज की है. पिछली बार 33,877 वोटों से जीत दर्ज की थी. इस बार 36 हज़ार वोटों के अंतर से जीते हैं. इस सीट पर दूसरे नंबर पर रही भारतीय जनता पार्टी की लता. इस सीट पर दिल्ली के पूर्व मंत्री और कांग्रेस उम्मीदवार हारुन यूसुफ़ को भी बड़ी मुश्किल से 5 हज़ार वोट मिले.
मटिया महल - इस सीट से शोएब इकबाल ने जीत दर्ज की है. पाँच बार के विधायक रह चुके इक़बाल ने चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी का दामन थामा था. जीत का अंतर 50 हज़ार से ज़्यादा का रहा. इस सीट पर भी दूसरे नंबर पर रहे भारतीय जनता पार्टी के रविन्द्र गुप्ता. पिछले चुनाव में इस सीट पर आम आदमी पार्टी के असीम अहमद ख़ान ने जीत हासिल की थी. इस बार उनका टिकट काट दिया गया था. पिछली बार असीम की जीत का अंतर 26 हज़ार वोटों का था. कांग्रेस के मिर्ज़ा जावेद अली को तकरीबन 3 हज़ार वोट मिले.
मटियाला - आम आदमी पार्टी नेता गुलाब सिंह ने दूसरी बार इस सीट से चुनाव जीता है. हालांकि, इस बार जीत का अंतर कम हुआ है. 2015 में उन्होंने 47 हज़ार वोटों से जीत दर्ज़ की थी, जबकि 2020 में जीत का अंतर 28 हज़ार रह गया. इस सीट पर दूसरे नंबर पर भारतीय जनता पार्टी के राजेश गहलोत रहे. इस सीट पर कांग्रेस के सोमेश शौकीन को केवल 7 हज़ार वोट मिले.
मुस्तफ़ाबाद - इस बार यह सीट आम आदमी पार्टी ने बीजेपी से छीन ली है. आम आदमी पार्टी के हाजी यूनुस ने भारतीय जनता पार्टी के जगदीश प्रधान को तकरीबन 21 हज़ार वोटों के अंतर से हराया है. पिछली बार इस सीट पर भाजपा के जगदीश प्रधान ने मात्र 6 हज़ार वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी. कांग्रेस के अली मेहदी को इस सीट पर लगभग 5 हज़ार वोट मिले.
सीलमपुर - सीलमपुर में इस चुनाव में वोटर टर्नआउट 71.4 फ़ीसदी था. यहां से आम आदमी पार्टी के नेता अब्दुल रहमान ने जीत दर्ज कराई. 2015 के मुकाबले 10 हज़ार ज्यादा वोट उन्हें मिले. यहां भी दूसरे नंबर पर भाजपा के उम्मीदवार ही रहे.
इन आंकड़ों से यह साफ़ है कि मुस्लिम बहुल इलाकों में सभी सीट पर कांग्रेस तीसरे नंबर की पार्टी बनकर रह गई और उसके उम्मीदवार पाँच-सात हज़ार से ज़्यादा वोट हासिल नहीं कर सके.

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दिल्ली में मुसलमान वोटरों की संख्या
दिल्ली के वोटरों में मुसलमानों का तादाद औसतन 13-14 फीसदी है. लेकिन ऐसी कोई विधानसभा सीट दिल्ली में नहीं है, जहां मुसलमान वोटर ही उम्मीदवार की जीत और हार तय करते हों, इनमें से किसी भी सीट पर जीत हासिल करने के लिए हिंदुओं के वोटों की भी ज़रूरत होती है.
सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) के निदेशक डॉ. संजय कुमार के अनुसार, "दिल्ली में लगभग 6 से 7 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम वोटरों की संख्या अच्छी है. अगर वो एकजुट होकर वोट करें और अपने वोट बंटने न दे तो हो सकता है कि उम्मीदवार की जीत या हार तय कर सकें. लेकिन यह कहना कि वो अकेले ही जीत-हार तय कर सकते हैं, यह कहना गलत होगा."
संजय आगे जोड़ते हैं, "ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि दिल्ली में ऐसी एक भी विधानसभा सीट नहीं है, जिसमें केवल मुसलमान मतदाता हों."

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किस पार्टी को कितना वोट शेयर मिला
इस बार के चुनाव में आम आदमी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के वोट शेयर पिछली बार से बिलकुल उलट हैं. आम आदमी पार्टी का वोट शेयर 53.5 फीसदी रहा, जो पिछली बार के मुकाबले तकरीबन एक फीसदी कम है.
कांग्रेस के वोट प्रतिशत में तकरीबन 5 फीसदी की कमी आई है. चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक इस बार उनका वोट शेयर 4.26 फीसदी ही रहा है.
इस बार किसी का वोट शेयर बढ़ा है, तो वो है भारतीय जनता पार्टी का. उनका वोट शेयर 32 से बढ़कर 38.5 फीसदी हो गया है.

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कांग्रेस का वोट बैंक
दिल्ली में हमेशा से मुसलमानों को कांग्रेस का पारंपरिक वोटबैंक माना जाता रहा है, लेकिन इस बार 6 सीटों - ओखला, मटियाला, बल्लीमारान, मुस्तफ़ाबाद,सीलमपुर और मटिया महल पर कांग्रेस को 2 से 4 फीसदी ही वोट मिले. सबसे ज्यादा हारुन यूसुफ को 4.73 फीसदी वोट मिले.
इन विधानसभा सीटों पर कांग्रेस का घटता वोट शेयर देखते हुए यह साफ लग रहा है कि जो मुस्लिम मतदाता कांग्रेस के साथ हुआ करते थे, अब आम आदमी पार्टी के साथ नज़र आ रहे हैं.
लेकिन यह किस आधार पर कहा जा सकता है? इसके जवाब में संजय कुमार का कहना है, "इसके लिए हमें ओखला का उदाहरण देखना होगा. ओखला में कांग्रेस ने भी मुस्लिम उम्मीदवार उतारा था. अगर मुसलमान मतदाताओं ने कांग्रेस का साथ दिया होता, तो इसका फायदा बीजेपी को मिल सकता था. लेकिन वोट प्रतिशत और वोटों की संख्या दोनों बताते हैं कि ऐसा नहीं हुआ. ऐसे में यह कहना बिल्कुल ग़लत नहीं है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का मुस्लिम वोट बैंक छिटककर आम आदमी पार्टी के साथ होता हुआ साफ़ दिखा."
आंकड़ों की बात करें, तो संजय कुमार मुसलमान मतदाताओं में से तकरीबन 75-80 फीसदी के आम आदमी पार्टी के साथ होने की बात कहते हैं. यह आकलन सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ का है, जो हर साल चुनाव के नतीजों के बाद उसकी व्यापक समीक्षा करती है.

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कांग्रेस से मुसलमान क्यों नाराज़ हैं?
दिल्ली में कांग्रेस से मुसलमान नाराज़ हैं, इसका स्पष्ट प्रमाण है उनका गिरता वोट प्रतिशत. संजय कहते हैं, "अगर मुसलमान वोटर बंटता, तो नतीजों में उसका असर दिखता."
संजय समझाते हैं, "मुसलमानों की नाराज़गी के पीछे केवल शाहीन बाग़ ही मुद्दा नहीं है. मुस्लिम मतदाता कभी भी बीजेपी के वोटर नहीं रहे हैं. लेकिन सीएए, 370, तीन तलाक़ क़ानून पास होने के बाद एक दूसरी तरह का भय का माहौल मुसलमानों के अंदर है. उनके लिए जीने-मरने जैसी बात हो गई थी. मुस्लिम मतदाताओं को लगा कि अगर दिल्ली में बीजेपी की सरकार आ जाती, तो स्थिति और ख़राब हो सकती है".
संजय आगे कहते हैं, "दिल्ली के मुस्लिम मतदाताओं ने सोचा आखिर कौन सी पार्टी है, जो बीजेपी का मुकाबला कर सकती है. तो उनके लिए साफ़ जवाब था - आम आदमी पार्टी. निर्णय लेने में मतदाताओं को कोई दुविधा भी नहीं हुई होगी."
आपको याद होगा दिल्ली में नागरिकता बिल के खिलाफ़ शाहीन बाग़ में धरने पर बैठे लोगों में कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद, मणि शंकर अय्यर और शशि थरूर शामिल थे.
आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतउल्ला के अलावा पार्टी का कोई बड़ा नेता उनके साथ नहीं दिखा. फिर भी मुसलमान वोटरों का आम आदमी पार्टी को चुनना बताता है कि 'आप' पार्टी मुसलमानों तक 'सीक्रेट मैसेजिंग' करने में कामयाब रही है.
लेकिन सबसे दिलचस्प बात ये है कि आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल कभी शाहीन बाग़ नहीं गए और न ही इस मामले पर उन्होंने कुछ कहा, वे चुप्पी साधे रहे.
उन्हें अंदाज़ा हो गया था कि बीजेपी को हराने के लिए मुसलमान उन्हें वोट देंगे लेकिन अगर वे शाहीन बाग का समर्थन करेंगे तो बीजेपी उन्हें मुस्लिम परस्त साबित करेगी और उसके बारे में कोई प्रतिकूल टिप्पणी करेंगे तो मुसलमान वोट गवाएंगे, केजरीवाल ने चुप्पी का रास्ता चुना जो काम कर गया.
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