मोदी सरकार आर्थिक संकट मानने को तैयार क्यों नहीं है?- नज़रिया

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- Author, विवेक कौल
- पदनाम, अर्थशास्त्री
सरकार की ओर से हर साल पेश होने वाले बजट को लेकर भारत के लोगों में जिस तरह का उत्साह होता है, वैसा दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता.
जब वित्त मंत्री हर साल बजट पेश करते हैं, देश के नागरिक कुछ वही पुराने सवाल पूछना शुरू कर देते हैं. जैसे, इस बजट का मुझ पर क्या असर होगा? क्या महंगा हुआ, क्या सस्ता हुआ? टैक्स की बचत होगी या ज़्यादा टैक्स देना होगा?
इस साल के बजट, जो शनिवार को संसद में पेश किया, को लेकर ज़्यादा ही दिलचस्पी थी क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था सुस्ती के दौर से गुज़र रही है.
भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) मौजूदा वित्त वर्ष में 5.7 प्रतिशत की दर से बढ़ने की उम्मीद है. 2012-13 के बाद से यह सबसे कम दर है. उस समय जीडीपी बढ़ोतरी की दर 5.5 प्रतिशत थी.
इसकी मुख्य वजह है- निजी खपत में आई सुस्ती. 2019-20 के शुरुआती छह महीनों में निजी खपत मात्र 4.1 की दर से बढ़ी. यानी लोग पैसे को उस तरह से खर्च नहीं कर रहे जैसे वे पहले कर रहे थे.
इन हालात में, यह माना जा रहा था कि लोगों को खर्च करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए उनके हाथ में और पैसा दिया जाएगा.
क्या किया सरकार ने?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने निजी आयकर दरों में कटौती की और एक वैकल्पिक टैक्स सिस्टम भी पेश किया. मौजूदा सिस्टम में करदाताओं को उनकी बचत और क़र्ज़ पर रियायत मिलती है. मगर जो लोग नया सिस्टम चुनेंगे, उन्हें इन रियायतों को छोड़ना होगा.
इसलिए करदाताओं के पास या तो पुराने सिस्टम को अपनाने का विकल्प होगा, जहां वे अधिक टैक्स दे सकते हैं और फिर कटौतियों और रियायतों को क्लेम कर सकते हैं. या फिर उनके पास नया सिस्टम होगा जहां उन्हें कम आयकर देना होगा मगर वे रियायतों को क्लेम नहीं कर पाएंगे.
समस्या यह है कि इन दोनों में से कौन का सिस्टम चुनना है, यह फ़ैसला लेने के लिए भारत के पेचीदा आयकर नियम क़ानूनों की समझ होनी चाहिए.
साथ ही, बजट ने उन बुनियादी सवालों का भी जवाब नहीं दिया जो हर आयकरदाता के मन में है- क्या मेरी आमदनी बढ़ी है?
आर्थिक सुस्ती के बीच यह सवाल काफ़ी अहम है. अगर वित्त मंत्री ने आयकर प्रणाली को और पेचीदा करने की बजाय सीधे टैक्स कम कर दिया होता तो करदाता इस बात को लेकर आश्वस्त होते की उनकी आय वाक़ई में बढ़ी है. इससे भी उन्हें अधिक खर्च करने को बढ़ावा मिलता और अर्थव्यवस्था में तेजी आती.

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क्या होना चाहिए था
आर्थिक सुस्ती के दौरान राजनेता और सरकारें ब्रितानी अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स की सलाहों पर अमल शुरू कर देते हैं.
कीन्स ने कहा था कि आर्थिक संकट के दौर में पैसा खर्च करके हालात सुधारने पड़ें तो सरकार को इस मामले में सबसे आख़िर में खर्च करना चाहिए.
उन्होंने यहां तक सुझाया था, बल्कि बार-बार सुझाया था कि सरकार को लोगों से गड्ढे खुदवाकर भरवाने चाहिए ताकि इससे मिले पैसे को लोग खर्च करें और अर्थव्यवस्था को उबरने में मदद मिले.
'गड्ढे खोदो और भरो' से मेल खाती भारतीय योजना है महात्मा गांधी नेशनल रूरल इंपलॉयमेंट गारंटी स्कीम यानी मनरेगा.
यह योजना भारत के हर उस वयस्क ग्रामीण को कम से कम 100 दिन का रोज़गार देने की गारंटी देती है जो अकुशल श्रमिक के तौर पर काम करना चाहता है.

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मगर इस साल इस योजना के लिए आवंटित राशि 71,001 करोड़ रुपये से घटाकर 61,500 करोड़ रुपये कर दी गई है.
इस योजना के माध्यम से ग़रीब से ग़रीब आदमी के हाथ में तुरंत पैसा दिया जा सकता है. उन लोगों तक पैसा पहुंचाया जा सकता है जो सुस्ती की मार झेल रहे हैं. मगर वित्त मंत्री ने इस योजना के लिए बजट करने करने का फ़ैसला कर दिया.
इससे ऐसा प्रतीता होता है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने यह स्वीकार करने से ही इनकार कर दिया है कि देश आर्थिक सुस्ती से जूझ रहा है.
अति आशावादी लक्ष्य
किसी भी बजट के केंद्र में होता है टैक्स से मिलने वाला राजस्व जिससे कि सरकार खर्च करने के लिए पैसा जुटाती है.
2020-21 में सरकार ने 241 खरब रुपए अर्जित करने का लक्ष्य रखा है जो इस साल के मुक़ाबले 12 प्रतिशत अधिक है.
यह बहुत ही आशावादी लक्ष्य है क्योंकि 2019-20 में टैक्स रेवेन्यू मात्र चार प्रतिशत बढ़ा है.
सरकार विनिवेश से मिलने वाले पैसे यानी की सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचकर मिलने वाले राजस्व में भारी बढ़ोतरी की उम्मीद लगाए बैठी है.
2020-21 में इसने विनिवेश के माध्यम से 1,497 अरब रुपए कमाने की उम्मीद रखी है. यह 2019-20 में इसी तरीक़े से अर्जित पैसे से 223 प्रतिशत अधिक है.

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विनिवेश को लेकर बड़ी ख़बर यह है कि सरकार भारत की सबसे बड़ी इंश्योरेंस कंपनी लाइफ़ इंश्योरेंस ऑफ़ इंडिया (एलआईसी) में हिस्सेदारी बेचने की योजना बना रही है.
कुछ स्तर पर देखें तो यह अच्छी ख़बर है क्योंकि इससे सरकारी स्वामित्व वाली एलआईसी में पारदर्शिता बढ़ेगी जो कि अभी तक स्पष्ट नहीं है.
दूसरी तरफ़, इससे राजनीतिक विरोध भी होगा जिससे सरकार को निपटना होगा. साथ ही, अब तक एलआईसी सरकार के लिए आंतरिक निवेशक रही है और कई बार सरकार की मदद कर चुकी है. इसलिए, यह देखना रोचक होगा कि भविष्य में ये समीकरण बदलेंगे या नहीं.
कुल मिलाकर बात यह है कि इस बजट में और प्रयास होने चाहिए था. ख़ासकर यह देखते हुए कि भारत अभी छह प्रतिशत से भी कम की रफ़्तार से आगे बढ़ रहा है जबकि कई सालों से 10 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर हासिल करने के सपने बेचे जाते रहे हैं.
विवेक कौल अर्थशास्त्री हैं और 'ईज़ी मनी ट्रायॉलजी' के लेखक हैं.

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