शाहीन बाग़ के विरोध प्रदर्शन को कहां से मिल रही 'ताक़त'? - ब्लॉग

    • Author, चिंकी सिन्हा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

एक सर्द रात को हम विरोध प्रदर्शन वाली गली में पहुंच गए. पहले से मुझे नहीं मालूम था कि दिल्ली में किस जगह ये प्रदर्शन हो रहा है, वही दिल्ली जो कैफ़े, आर्ट गैलरी और शॉपिंग मॉल्स से पटी हुई है.

मैंने तो सुना है कि दिल्ली में कम से कम नौ शहर हैं और यहां की अधिकांश आबादी दूसरी जगहों से आकर बसी है. लोगों ने बताया था कि बहादुर महिलाएं दिन-रात प्रदर्शन के लिए बैठी हैं, वे प्रतिरोध की कविताएं गा रही हैं, क्रांति के गीत सुन रही हैं.

साथ ही इस कंपकंपाने वाली ठंड में अपने नवजात बच्चों के लिए लोरी भी गा रही हैं, उन्हें वे इस ठंड में भी अपने साथ लेकर आई हैं. क्योंकि प्रदर्शन करने वाली ज़्यादातर महिलाएं ग़रीब हैं, अपने बच्चों के लिए नैनी नहीं रख सकती.

जो लोग ये कह रहे हैं कि बच्चों को जोखिम में डाला जा रहा है, उनके लिए इन महिलाओं का जवाब है कि वे अपने बच्चों को दुनिया या असहमति की आवाज़ से विमुख नहीं कर रही हैं. इन लोगों का कहना है कि वे सब संविधान बचाने के लिए प्रदर्शन करने को निकली हैं.

ये अनिश्चित समय है. हर कोई 'लापता' हो सकता है. सब इसे जानती हैं लेकिन इन लोगों ने हाइवे नहीं छोड़ा है. आसमान के साथ छतों पर भी तारे नज़र आ रहे हैं, मैं पहली बार क्रिसमस की शाम को शाहीन बाग़ गई थी.

सरकार की गारंटी

ब्लू तारपोलिन के नीचे बैठी महिलाएं इस बात के लिए प्रतिबद्ध थीं कि जब तक सरकार उन्हें इस बात की गारंटी नहीं देती कि वे कभी बेघर नहीं होंगी, तब तक वे अपने घरों में नहीं लौटेंगी. मुझे फ़लस्तीनी कवि महमूद दरवेश की एक कविता की पंक्ति याद आ गई थी, "मेरी मातृभूमि एक सूटकेस नहीं है और मैं एक यात्री नहीं हूं."

25 जनवरी को गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि दिल्ली के लोगों को शाहीन बाग़ नहीं होने देने के लिए वोट देना चाहिए. हर सुबह मैं जब अपना फ़ोन देखती हूं तो शाहीन बाग़ में मिली एक महिला का संदेश मुझे मिलता है. हर सुबह एक ही संदेश होता है- 'हम लोग अभी भी यहां मौजूद हैं.'

मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में विरोध प्रदर्शनों को नज़दीक से देखा है. मैं 1980-90 के दशक में बिहार में पली-बढ़ी थी, उस दौर में सामाजिक-राजनीतिक विरोध प्रदर्शन के लिए चक्का जाम होता था, जिसमें सड़कों पर परिवहन ठप हो जाता था.

इसके बाद जब लालकृष्ण आडवाणी को पहली बार गिरफ़्तार किया गया तब मैंने पहली बार कर्फ़्यू देखा और विरोध प्रदर्शन भी. हमने संविधान की प्रस्तावना को दिल से याद किया था. परीक्षा के दिनों में, हम सरकार की नीतियों के निर्देशात्मक सिद्धांत और मूलभूत अधिकारों के बारे में लिखते थे.

शाहीन का मतलब

मैंने पहली बार कैंडल लाइट मार्च तब देखा था जब हमारी स्कूल की एक सीनियर की क्रूरता से बलात्कार करने के बाद हत्या कर दी गई थी. तब मैं कॉलेज में थी. वो मामला आज तक नहीं सुलझा.

नागरिकता संशोधन क़ानून, 2019 के विरोध में देशभर में चल रहे प्रदर्शनों में शाहीन बाग़ का प्रदर्शन सबसे लंबे समय से चल रहा है. अब इसकी देखा-देखी देश के दूसरे हिस्सों में भी प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं, हर जगह इसे शाहीन बाग़ ही कहा जा रहा है. सरकार इन विरोध प्रदर्शनों को दबाने की कोशिश करती रही लेकिन यह तेज़ होता गया.

एक रात, मैंने एक छोटा पत्थर उठा लिया, जिसे बुक शेल्फ़ में रखा है, एक याद के तौर पर. यहां हर अन्याय के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हो रहा है और लोग अपना विरोध गीत, कविता, नारे और शांति से प्रदर्शित कर रहे हैं.

मैं इस छोटी सी कॉलोनी में अपनी इच्छा से घूमकर यह समझने की कोशिश करती हूं कि वे क्यों विरोध प्रदर्शन कर रही हैं. वे ख़ुद को पक्षी कह रहे हैं, ऐसे पक्षी जिन्होंने अपने पंख खोल लिए हैं. विकिपीडिया के मुताबिक़ शाहीन का मतलब भी ग़ैर प्रवासी बाज़ होता है.

विरोध प्रदर्शन की जगह

शाम की गोधूलि बेला में शाहीन बाग़ के संकेत और दृश्यों को समझने के लिए मैं वहां मौजूद रही. किसने सोचा होगा कि तारों के उलझे जालों वाली इस कॉलोनी का नक्शा देखना होगा. ज़्यादातर शामों को, मैं एक कोने में खड़ी होकर प्रदर्शन देखती रही.

एक रोज़ विरोध प्रदर्शन वाली जगह पर वे एक कप चाय देते हैं, जिसे मैं कृतज्ञता के भाव के साथ ले लेती हूं. विरोध प्रदर्शन की जगह, हाइवे का हिस्सा है, जिसे महिलाओं ने कई दिनों से बंद कर रखा है.

आप यहां आकर इस विरोध प्रदर्शन को देखते हैं, सुनते हैं, समझने की कोशिश करते हैं और आपके फेफड़ों में उम्मीद से भरी हवा भर जाती है. हालांकि दिल्ली में ज़्यादातर समय, हवा की क्वालिटी बेहद ख़तरनाक ही होती है.

मैं यहां बैठती हूं, घूमती हूं. नोटबुक पर क़लम से कुछ नोट्स लेती रहती हूं. टी-स्टॉल्स पर ठहरती हूं. कम बोलती हूं और ज़्यादा सुनती हूं. मैं सालों से विरोध प्रदर्शन देख रही हूं. इसलिए भी सिर दर्द और ठंड के बावजूद मैं यहां कई दिनों तक आती रही.

विरोध प्रदर्शन करने वाली महिलाएं

मैं एक रिपोर्टर हूं, तो मुझे हमेशा ख़याल रखना होता है कि तथ्यों में बातें हों. लेकिन मैं एक स्टोरी टेलर भी हूं. मैं यह देखती हूं कि महिलाएं दिन-रात धरने पर बैठी हैं और यह समझती हूं कि मैं एक बदलाव को होते हुए देख रही हूं.

मैं इन सबको ज़्यादा से ज़्यादा याद रखना चाहती हूं, इसलिए फोटो लेती हूं, वे जिन कविताओं को गा रही हैं, उनकी पंक्तियां लिखती हीं. आसपास के माहौल का विवरण भी लिखती हूं. इन कोशिशों में, मैं इस भीड़ में कहीं गहरे उतरने लगती हूं. मैं कई पंक्तियों में कई बार जाती हूं.

75 साल की बूढ़ी महिला, मुझे इन जगहों पर ले जाती हैं और बताती हैं कि वे विरोध प्रदर्शन क्यों कर रही हैं. विरोध प्रदर्शन करने वाली महिलाएं देखती हैं तो मुस्कुराती हैं. वे खाना ऑफर करती हैं, अपनी कहानियां सुनाती हैं. जो भी मिलता है, मैं उसे स्वीकार कर लेती हूं.

नूरुननिशा एक कमज़ोर सी दिखने वाली औरत हैं जो उत्तर प्रदेश से कई साल पहले शाहीन बाग़ आ गई थीं, अपने बेटों के साथ रहने के लिए. इस सीज़न की कड़कड़ाती ठंड से भी उन पर कोई असर नहीं हुआ है.

शाहीन बाग़ के बाद

इस बीच मेरी मां का मैसेज आता है कि कहां हो? मैं बताती हूं कि शाहीन बाग़. वो कहती हैं कपड़ों से ढककर रखना ख़ुद को. वो घर वापस लौटने के लिए नहीं कहतीं. एक महीने से ज़्यादा का वक़्त हो चुका है. शाहीन बाग़ के बाद पटना, प्रयागराज और अन्य शहरों में इसी तरह महिलाएं विरोध प्रदर्शन कर रही हैं.

शाहीन बाग़ की मेरी पहली यात्रा के बाद ऐसी जगहों की संख्या बढ़ रही है. कई लोगों ने अमरीका में हुए साल 2011 के ऑक्यूपाई मूवमेंट को ख़ारिज किया था. यह मूवमेंट आर्थिक असमानता के नाम पर शुरू हुआ था.

ऑक्यूपाई मूवमेंट के ऑकलैंड में हुए प्रदर्शन के कैंप के प्रवेश द्वार पर दो बोर्ड लगे थे, एक में लिखा था कि 'आप घर छोड़ चुके हैं' और दूसरे में लिखा था 'वेलकम टू लाइफ़'.

यहां घर छोड़ने का मतलब उन लोगों के लिए था जो कैंपों में रह रहे थे, इसके अलावा यह उन लोगों को भी संबोधित था जो अपने आराम और सुरक्षा को छोड़कर प्रदर्शनों में हिस्सा ले रहे थे. जैसे कि शाहीन बाग़ में प्रदर्शन करने वाली महिलाएं हैं, जो अपने जीवन में पहली बार किसी विरोध प्रदर्शन में हिस्सा ले रही हैं.

सामाजिक आंदोलन का चेहरा

एक तरह से ऑक्यूपाई एक्टिविज़्म लोगों को राजनीति में सीधे सक्रिय होने का एहसास कराने वाला था और जो लोग इसमें शामिल हो रहे थे वे एक नये उत्साह से तरोताज़ा हो रहे थे. 2012 में मैं फ़िलाडेल्फ़िया में थी, मैं वहां एक मूवमेंट में हिस्सा लेने गई थी.

ऑक्यूपाई द हुड, का प्रदर्शन दो एक्टिविस्ट दोस्तों ने शुरू किया था- क्वींस, न्यूयार्क के 39 साल के मलिक रायसान और डेट्रायट, मिशिगन की 35 साल की इफ़े जोहरी उहुरू.

ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट के प्रतिभागियों में गोरों की संख्या ज़्यादा थी और कुछ कट्टरपंथी काले कार्यकर्ताओं का मानना था कि काले या कामकाजी लोगों के सामाजिक आंदोलन का चेहरा गोरे नहीं हो सकते.

यह रोष मैंने फ़िलाडेल्फ़िया के अंदरूनी हिस्सों में साल 2012 में हर जगह देखा, जहां युवा कहीं खोए हुए थे और बूढ़ी मांओं में मौत का ख़ौफ़ नहीं दिखा रहा था. ऐसा ही रोष इन दिनों मैं देख रही हूं. विरोध प्रदर्शन लोगों का अधिकार है.

प्रदर्शन और प्रतिरोध

ऑक्यूपाई मूवमेंट से विविधता का दौर शुरू हुआ था. इसके बाद जब हम लोग ऑक्यूपाई द हुड मीटिंग में शामिल हुए तो यह समझने की कोशिश शुरू हुई कि किन वजहों से काले लोग मुख्यधारा से बाहर हैं. शहर के अंदर ये ये बात उभरी कि ड्रग्स और हिंसा इसकी वजह है.

हालांकि दूसरी तरफ़ लोगों का यह भी मानना था कि इच्छाशक्ति की कमी, सक्रिय हिस्सेदारी की कमी, कम जागरूकता, सहानुभूति का अभाव और ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी भी इसकी बड़ी वजहें हैं. अब, ऑक्यूपाई गेटवे इन बांबे, से उस आंदोलन की वापसी दिख रही है.

उस वक़्त अराजक लोगों के शुरू किए प्रदर्शन से विरोध प्रदर्शन और प्रतिरोध को लेकर लोगों में उम्मीद पैदा हुई है. पिछले कुछ सालों में मैंने शहरों, देशों और लोगों के दिलों में विरोध प्रदर्शन को उमड़ते हुए देखा है. रिपोर्टर होने के अपने फ़ायदे हैं- मैं इन विरोध प्रदर्शनों में जाती हूं, लोगों को सुनती हूं और सवाल पूछती हूं.

और हां, उसके अनुरूप नहीं होती हूं. यहां दो शहर मौजूद हैं. एक ओर, बहुमंज़िली इमारतें हैं जिससे फ़िलाडेल्फ़िया की ऊंची-ऊंची इमारतों की झलक मिलती है. दूसरी ओर, बंद पड़ी फ़ैक्ट्रियां हैं, जिनकी चिमनियों से धुआं नहीं निकलता.

सीएए ने विरोध प्रदर्शन को दिया जीवन

अब इन फैक्ट्रियों को छोड़ दिया गया है, उस समय की याद दिलाने के लिए कभी ग़रीबों के पास नौकरियां होती थीं. यही पूरी दुनिया की स्थिति है. एकदम अलग. ऐसे ही हमारे शहर हैं, हमारे देश हैं. लेकिन इसके बचे हुए हिस्से में अस्तित्व और प्रतिरोध की कहानियां हैं.

यह ऑक्यूपाई मूवमेंट की तरह है, ऐसे विरोध प्रदर्शन को नागरिकता संशोधन क़ानून ने एक नया जीवन दे दिया है. इसका भारतीय राजनीति और संस्कृति पर लंबे समय तक असर रहेगा. एक तरह से यह सरकार के विपक्ष की भूमिका भी निभा रहा है.

मैंने ऑक्यूपाई मूवमेंट को देखा था, तब मैंने यह महसूस किया था कि यह कई सिर वाले सांप की तरह है. विरोधी एक सिर को काटते या फिर हिरासत में ले लेते हैं तो दूसरा सिर उसकी जगह लेने के लिए तैयार है. इसका नेतृत्व करने वाला कोई चेहरा नहीं है, कोई प्रवक्ता भी नहीं है.

इसके चलते भी कॉरपोरेट मीडिया सहित अन्य लोग हताश हैं क्योंकि उन्हें ऐसे विरोध प्रदर्शन के उदाहरणों की समझ नहीं है जिसे अराजकता से ही ताक़त मिलती है.

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