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शाहीन बाग़: जब आधी रात को शाहीन बाग दो हिस्सों में बंट गया
- Author, विकास त्रिवेदी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
30 जनवरी. सुबह 10: 43 बजे. दिल्ली का जामिया इलाक़ा. CAA का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों की भीड़ दिख रही है.
तभी काले रंग की ब्लैक जैकेट पहना एक लड़का अपने फोन से फ़ेसबुक पर स्टेट्स डालता है- कृपा सभी भाई मुझे SEE FIRST कर लें.
इस लड़के के ख़ुद के प्रमुखता से दिखने की गुज़ारिश तीन घंटे में पूरी हो गई. जामिया इलाक़े में हवा में पिस्तौल लहराकर गोली चलाने वाला लड़का न्यूज़ चैनलों और सोशल मीडिया पर प्रमुखता से देखे जाने लगे.
प्रमुखता से देखी गई उसकी वो आख़िरी पोस्ट भी, जिसमें लिखा था- शाहीन भाग...खेल ख़त्म.
लेकिन शाहीन बाग़ का ये 'खेल' इतनी आसानी से ख़त्म नहीं हो सकता. ऐसा यक़ीन रखने वाली औरतें जामिया के इस घटनास्थल से महज़ दो किलीमीटर की दूरी पर बीती 48 रातों की ही तरह 30-31 जनवरी को भी बैठी रहीं.
कोई कहीं नहीं भागा तो कयास कहां से लगा?
पिस्तौल लहराने के बाद जब उसे गिरफ़्तार किया गया, इसके कुछ घंटे बाद वॉट्सऐप ग्रुप्स में एक मैसेज शेयर किया जाने लगा.
ये मैसेज था कि रात 11 बजे शाहीन बाग़ में प्रेस कॉन्फ्रेंस होनी है. कयास लगाए गए कि शायद शाहीन बाग़ की महिलाएं धरने को आंशिक रूप से ख़त्म कर दें.
पुलिस बैरिकेडिंग को पार करते हुए जब मैं धरनास्थल के क़रीब जा रहा था, तब रास्ते में एक कश्मीरी लड़का मिला. कहने लगा, ''सीधा कश्मीर से आ रहा हूं आज ही. पता चला कि प्रेस कॉन्फ्रेंस होनी है. मेरा एक दोस्त है इधर. शायद नोएडा की तरफ़ जाने वाला रास्ता खोलेंगे.''
आगे चलते हुए जैसे-जैसे आज़ादी आज़ादी के नारों की आवाज़ें बढ़ीं, वो कश्मीरी लड़का प्रदर्शनकारियों की भीड़ में कहीं गायब हो गया.
रात के 11 बज रहे हैं. शाहीन बाग़ धरनास्थल के स्टेज के पास मीडियाकर्मियों, वॉलेंटियर्स की भीड़ है. पॉल्यूशन मास्क लगाए एक वॉलेंटियर ने कहा कि कुछ देर में मंच पर दादियां आएंगी और बात करेंगी.
लेकिन इसके कुछ मिनट बाद ही मंच के पास महिलाएं, स्थानीय नेता आशु ख़ान और कुछ वॉलेंटियर्स के बीच तेज़ बहस होने लगती है.
वॉलेंटियर्स ये सफ़ल कोशिश करते हैं कि इस वाकये का कोई वीडियो न बना पाए. मीडिया के लोगों से बाहर जाने को कहा जाता है.
मतभेद की शुरुआत
स्टेज के पास खड़े लोगों की भीड़ अब ज़ोर-ज़ोर से लड़ रही है.
स्थानीय नेता आशू ख़ान अपनी छाती पीटते हुए औरतों के समूह से कहते हैं, ''अगर धरना ख़त्म किया तो ये लोग जामिया की ही तरह यहां भी गोली चलवा देंगे. धरना ख़त्म नहीं होना चाहिए. आने दो इन्हें. अगर कोई जेल जाएगा तो मैं जाऊंगा. आशू ख़ान जाएगा. लेकिन धरने से उठो मत.''
कुछ औरतें और वॉलेंटियर्स आशु को काबू में करने की कोशिश करते हैं. कुछ स्टूडेंट्स ये कहना शुरू करते हैं कि औरतों का प्रोटेस्ट है, औरतें ही तय करेंगी. आदमी यहां से फौरन हट जाएं.
अगले कुछ मिनटों में ऐसी आवाज़ें और बढ़ती हैं. तभी कुछ महिलाएं आकर कहती हैं कि धरना ख़त्म नहीं होगा, रोड चालू नहीं होगा.
मैं एक महिला से लड़ाई की वजह पूछता हूं तो वो कहती हैं, ''औरतों की लड़ाई है ये, मर्द जहां घुसेंगे...वहां औरतें अपना माथा फोड़ेंगी ही.''
कुछ औरतें ये कहती हैं कि रोड खुलेगा. कुछ औरतें कहती हैं कि रोड नहीं खुलेगा.
मतभेद की इन सुनाई देती आवाज़ों से ध्यान हटाने के लिए एक वॉलेंटियर माइक पर चिल्लाता है- इंकलाब ज़िंदाबाद! आवाज़ दो, हम एक हैं.
मंच के नीचे सैकड़ों की संख्या में बैठी महिलाएं सुर मिलाती हैं- हम एक हैं.
हालांकि मंच से पुकारा गया ये नारा तब मंच से ही ग़ायब नज़र आता है.
असली ख़ौफ़ किसका?
जब धरने को आंशिक रूप से ख़त्म करने पर बहस हो रही थी, तब भी कुछ लोग ये कहते नज़र आए, ''लड़ो मत. यहां मीडिया है. कल सुबह कुछ-कुछ करके दिखाएंगे ये लोग.''
इसी शामियाने के ठीक पीछे जाने पर कुछ लोग आपस में बात कर रहे हैं.
हम इन लोगों से जाकर पूछते हैं कि प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं हो रही?
ये पूछते ही एक लड़का हमारा आई-डी कार्ड मांगता है. वजह पूछने पर जवाब मिलता है, ''एजेंडा वाले लोग भी आ रहे हैं इधर. सावधान रहना बनता है.''
शाहीन बाग़ में बिताई अपनी दो रातों के अनुभव से एक बात साफ़ होती है. यहां मौजूद लोगों को किसी सरकार या पुलिस से उतना ख़ौफ़ या सतर्क रहने की ज़रूरत महसूस नहीं होती, जितनी मीडिया से होती है. शाहीन बाग़ किसी तरह की चूक करता नहीं दिखना चाहता.
कुछ मिनट बाद लौटने पर मंच के पास की भीड़ हट चुकी है.
मंच के पास खड़ा एक वॉलेंटियर हमें बताता है, ''अब देखो... इस धरने की कोई एक ऑर्गेनाइजर कमेटी तो है नहीं. जितने लोग, उतनी बातें. औरतें चाह रही हैं कि एक तरफ़ का रास्ता खुल जाए. मर्द ऐसा नहीं चाह रहे.''
मैं पूछता हूं कि ये महिलाओं का प्रदर्शन है, महिलाओं की क्यों नहीं सुनी जा रही? वो जवाब देता है- अब पैट्रियार्की (पितृसत्ता) को तो आप जानते ही हो.
मंच शांत है और कुछ महिलाएं अब कैमरे पर बात करने को तैयार होती हैं. रात के क़रीब एक बजने को है.
क्या इस वजह से नहीं हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस?
शाहीन बाग़ में जिस सड़क पर धरना हो रहा है, उसकी एक तरफ़ नोएडा वाला रास्ता है. बताया जा रहा है कि औरतें इस तरफ़ का रास्ता खोलने और बैरिकेडिंग को पीछे करके प्रदर्शन क्षेत्र का विस्तार कम करने के पक्ष में थीं.
धरने पर बैठी एक महिला ने कहा, ''प्रेस कॉन्फ्रेंस की बात चल रही थी. क्योंकि पुलिस इससे नाजायज़ फ़ायदा उठा रही है. ये बदनाम करना चाह रहे हैं कि रोड हमने बंद किया हुआ है. रोड दरअसल पुलिस ने बंद किया है.''
मैं जब कहता हूं कि बैरिकेडिंग इसलिए लगाई गई होगी, क्योंकि यहां प्रदर्शन चल रहा है.
वो जवाब देती हैं, ''पुलिस की ज़िम्मेदारी बैरिकेडिंग बंद करने की नहीं है, प्रोटेक्शन देने की है. प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर थोड़ा कंफ्यूज़ हो गए थे. घर में चार बर्तन होते हैं तो खटकते हैं. कुछ लोग शुरू से हैं और कुछ लोग बाद में आए. कुछ लोगों को लगा कि हम नोएडा वाला नहीं, जसोला वाला रास्ता खोलने की बात कह रहे हैं. तो बस वही था. जब मत बन जाएगा, तब प्रेस कॉन्फ्रेंस होगी और आप लोगों को पता चलेगा.''
ये कहने वाली महिला से ठीक बगल में खड़ी इकरा अलग ही बात कहती हैं, ''प्रेस कॉन्फ्रेंस का कोई ऐलान नहीं हुआ है. ये सब अफवाहें हैं. हुआ ये था कि माइक ख़राब हो गया था. इसलिए भीड़ हो गई थी और लोगों को लगा कि लड़ाई हो रही है. हमें किसी से डर नहीं है. हमें सिर्फ़ अल्लाह से डर है. चाहे हमें कोई गोली मार ले. डंडे मार ले.''
मंच के बिलकुल क़रीब बैठी महिलाएं कैमरे के सामने बहस की बातें छिपाने की कोशिश करती हुई दिखती हैं. कभी निजी बातों का हवाला दिया जाता है तो कभी बहस को 'बच्चों की नोकझोंक' कहकर मुस्कुरा दिया जाता है.
बदलता शाहीन बाग़?
बैकग्राउंड में रह-रहकर आज़ादी, आज़ादी के नारे गूंज रहे हैं.
धरनास्थल के पास बच्चे के लिए बनाई लाइब्रेरी के बाहर करीब 12 साल का मसदुल गुब्बारे बेच रहा है. मैं उससे पूछता हूं कि आज़ादी का मतलब समझते हो?
वो फौरन बोला- NRC. मैंने कहा कि आज़ादी होती क्या है? जवाब मिला- आज़ादी समझ नहीं आया.
सब अपने-अपने हिस्से की आज़ादी कभी न कभी खोज लेते हैं. किसी गुब्बारे को हवा में उड़ता देख मसदुल भी शायद एक दिन आज़ादी समझेगा.
26 जनवरी को शाहीन बाग़ में इंडिया गेट बना हुआ था, 30-31 जनवरी की रात इंडिया गेट वहां से गायब है.
यमुना किनारे के इस इलाक़े में जैसे-जैसे रात गहरी हो रही है, लोग दिखने कम होते जाते हैं.
शाहीन बाग़ से मैं जामिया की उस सड़क की ओर बढ़ता हूं, जहां 30 जनवरी को गोली एक लड़के ने गोली चलाई और उससे पहले फेसबुक लाइव भी किया.
जामिया वाली सड़क पर स्टूडेंट्स की भीड़ है. आज़ादी के नारे और कविताएं गाई जा रही हैं.
शाहीन बाग़ से लौटते हुए पुलिस बैरिकेडिंग के पास तापने के लिए आग जली हुई है. थोड़ी दूरी पर पुलिस सो रही है.
जामिया स्टूडेंट्स की गाई एक लाइन याद आ गई.
'इस आग को राख से बुझाइए
इस दौर-ए-सियासत का अंधेरा मिटाइए'
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