आंध्र प्रदेश के इस गांव में दलितों ने जीती हक़ की लड़ाई

- Author, हृदय विहारी बंडी
- पदनाम, कर्नूल से, बीबीसी के लिए
आंध्र प्रदेश के कर्नूल ज़िले में होसुर गांव के कुछ पढ़े-लिखे युवाओं का समानता पाने के लिए चलाया गया आंदोलन आख़िरकार रंग लाया.
इन युवाओं ने सार्वजनिक जगहों पर सबके साथ खाना खाने, एक ही स्कूल में पढ़ने और गांव के मंदिर में जाने के समान अधिकार के लिए आंदोलन किया था.
14 दिसंबर, 2019 को स्थानीय मंदिर में प्रवेश मिलने के साथ ये आंदोलन सफल हो गया .
एक दलित युवक सुरेंद्र कहते हैं, ''हमें अब आज़ादी मिली है. हम अपनी ज़िंदगी में पहली बार किसी मंदिर के अंदर गए हैं. हमने अभी तक ये नहीं देखा था कि मंदिर के अंदर भगवान दिखते कैसे हैं. हम मंदिर के अंदर जाकर बहुत ख़ुश हैं. अब हम भी रीति-रिवाज कर सकते हैं.''
होसुर गांव के दलितों को गांव के एक बहुत पुराने मंदिर में जाने की अनुमति मिल गई है.
लेकिन, उनके लिए ये सफर आसान नहीं था. गांवों के लोगों ने कई सालों तक इसके लिए याचिकाएं दायर की, विरोध प्रदर्शन किए और फिर आख़िरकार पुलिस को दलितों और ख़ुद को ऊंची जाति का बताने वाले गांव के बुजुर्गों के बीच सुलह करने के लिए दख़ल देना पड़ा.
होसुर गांव में 7000 से ज़्यादा जनसंख्या है जिनमें से क़रीब 400 परिवार दलित हैं.

एक लंबी लड़ाई
बेंगलुरू में एक निजी कॉलेज में लेक्चरर रंगास्वामी ने बीबीसी को बताया कि इस आंदोलन की शुरुआत 10 सितंबर, 2019 को मुहर्रम से पहले हो गई थी.
रंगास्वामी पूछते हैं, ''कितने दिनों तक हमें अस्पृश्यता के नाम पर अलग-थलग रखा जा सकता है? हम लंबे समय से गांव के बुजुर्गों से बोल रहे थे कि हमें भी मोहर्रम में हिस्सा लेने दें लेकिन वो कभी इसके लिए तैयार नहीं हुए. उनके इसी इनकार ने हमें विरोध प्रदर्शन करने के लिए मजबूर कर दिया.''
रंगास्वामी ने बताया कि गांव के दलितों ने कर्नूल के अपर पुलिस अधीक्षक को भी पत्र लिखकर 19 अगस्त, 2019 की मोहर्रम में शामिल होने देने का अनुरोध किया.
पुलिस उपाधीक्षक नरसिम्हा रेड्डी ने बताया कि मोहर्रम में गांव के मुसलमान और ग़ैर-मुस्लिम समुदाय के लोग भी हिस्सा लेते हैं. हालांकि, दलितों को इसमें हिस्सा लेने की अनुमति नहीं है.
''गांव के दलित पिछले एक साल से गांव के बुजुर्गों से मोहर्रम में शामिल होने देने के लिए कह रहे थे लेकिन उन्हें कभी इसकी इजाज़त नहीं दी गई. यहां तक कि हमने भी कहा कि उन्हें इसमें शामिल होने देने चाहिए वरना हम किसी को इसमें हिस्सा नहीं लेने देंगे. लेकिन, उन्होंने हमारे निर्देशों का उल्लंघन किया और मोहर्रम से पहले के रिवाजों में कुछ ही युवाओं ने हिस्सा लिया.''
नरसिम्हा रेड्डी ने बताया, ''जब पुलिस वहां पहुंची तो ग़ैर-दलितों ने पुलिस पर हमला कर दिया जिसमें पुलिस को भी चोटें आईं. पुलिस की कुछ गाड़ियों को भी नुक़सान पहुंचा. हमने पुलिस पर हमला करने वालों के ख़िलाफ़ मामले दर्ज किए हैं.''
''पुलिस पर हुए हमले और फिर गिरफ़्तारी ने गांव का माहौल ही बदल दिया. पुलिस और गांव के कुछ लोगों ने दलितों का पक्ष लिया और उस वक़्त गांव के बुजुर्गों को दलितों के मंदिर जाने पर अपनी सहमति देनी पड़ी.''
''उसी दौरान हमें दलितों पर लगे दूसरे प्रतिबंधों का भी पता चला. जैसे दो गिलासों का सिस्टम (एक प्लास्टिक और एक स्टील का गिलास), होटल में अलग-अलग जगह और किसी के साथ ऑटो शेयर करने की मनाही का पता चला.''
नरसिम्हा रेड्डी ने कहा, ''हमने गांव वालों से बात की और इस भेदभाव को ख़त्म करने की कोशिश की. इसके बाद 14 दिसंबर को गांव के दलितों ने मंदिर में प्रवेश किया और गांव में माहौल शांत हो गया.''

युवाओं ने छोड़ी नौकरी
रंगास्वामी ने आंदोलन को आगे ले जाने के लिए अपनी लेक्चरर की नौकरी छोड़ दी. कुछ और लोग भी उनसे जुड़ गए और कुछ लोगों ने अपनी नौकरी भी छोड़ दी. इनमें से कोई भी हाई प्रोफाइल नौकरी में नहीं था.
रंगास्वामी ने बताया, ''अप्रैल में मेरी शादी हुई थी और मैं 25 हज़ार रुपए महीना कमाता था. मुझे सामाजिक भेदभाव के ख़िलाफ़ आंदोलन चलाने के लिए अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी. मुझे नौकरी छोड़ने के लिए मेरी पत्नी और ससुराल वालों से भी विरोध झेलना पड़ा. मेरे माता-पिता दैनिक मज़दूर हैं.''
''अब मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी है और मैं लोगों के साथ काम कर रहा हूं. मुझे उम्मीद है कि मेरा परिवार किसी दिन मेरा मक़सद समझेगा.''
रंगास्वामी कहते हैं, ''अगर हम जैसे पढ़े-लिखे लोग क़दम नहीं उठाएंगे और हमारे अधिकारों के लिए नहीं लड़ेंगे तो आंदोलन बीच में ही मर जाएगा.''

जब मंदिर में पूछी जाति
गांव वालों ने मंदिर में जाने के अनुभवों के बारे में हमें बताया.
होसुर की दलित कॉलोनी में रहने वाले रमेश ने बताया, ''हमें मंदिर जाने से डर लगता था. हमें ये भी नहीं पता था कि भगवान कैसे दिखते हैं. हमसे कहा जाता था कि तुम अनुसूचित जाति से हो, तुम मंदिर के अंदर क्यों आए?''
''अब हालात बदल गए हैं. हम मंदिर के अंदर जा सकते हैं. ऐसा भी हो पाएगा ये मैंने कभी सोचा भी नहीं था. जो मैं नहीं कर सका वो गांव के कुछ शिक्षित युवाओं ने करके दिखा दिया.''
मुंबई में पली-बढ़ी रमेश की पत्नी रानी ने बताया कि जब उन्हें दलितों के मंदिर जाने पर लगी पाबंदी के बारे में पता चला तो उन्हें शुरुआत में बहुत अलग-थलग महसूस होता था.
रानी बताती हैं, ''मुझे यहां के रीति-रिवाजों की जानकारी नहीं थी. मंदिर के अंदर एक औरत ने मेरी जाति के बारे में पूछा. ये सवाल मेरे लिए अजीब था. मुंबई में किसी ने मेरी जाति के बारे में नहीं पूछा था. मुझे ये सवाल सुनकर बहुत हैरानी हुई और मैं वापस आ गई. मुझे ख़ुशी है कि अब हम मंदिर में जा सकते हैं.''

क्या कहता है दूसरा पक्ष
बीबीसी ने गांव के उन लोगों से भी बात करने की कोशिश की जो इस मामले में गांव के प्रमुख होने का दावा करते हैं. लेकिन, उन्होंने मीडिया से बात करने से इनकार कर दिया.
फिर भी कुछ लोगों ने फोन पर बात करने के लिए हामी भर दी.
होसुर में गांव के एक सेवानिवृत्त राजस्व अधिकारी सुरेंद्र नाथ रेड्डी ने बताया कि गांव वालों को दलितों के मंदिर जाने से कोई समस्या नहीं है.
हालांकि, उन्होंने निराशा ज़ाहिर करते हुए कहा, ''हमें अच्छा नहीं लगा कि दलित हमसे बात करने की बजाए पुलिस के पास चले गए. आख़िर में हम लोगों को साथ में ही रहना है.''
उन्होंने दोहराया कि उन्होंने कभी भी जातिगत भेदभाव नहीं किया.
होसुर गांव के पूर्व सरपंच श्रीनिवासुलु ने बताया, ''हमनें दलितों को मोहर्रम में हिस्सा लेने से मना किया क्योंकि हमें दोनों समूहों में टकराव होने की आशंका थी.''
''पुलिस ने बिना किसी कारण के लोगों पर लाठी चार्ज किया और 17 गांव वालों को गिरफ़्तार कर लिया. वो लोग 45 दिनों तक जेल में रहे और फिर उन्हें ज़मानत पर रिहा किया गया.''
वहीं, दलित युवकों की शिकायत थी कि गांव के बुजुर्गों से बार-बार मोहर्रम में शामिल होने और मंदिर में प्रवेश करने देने की इजाज़त मांगने के बावजूद भी उनकी बात नहीं मानी गई. इसके चलते उन्हें पुलिस का सहारा लेना पड़ा.
सुरेंद्र नाम के एक और दलित युवा ने बताया, ''हर कोई नहीं समझ सकता कि हमने क्या पाया है. जब हम होटल में खाना खाने जाते थे तो हमें अलग बैठना पड़ता था. अब हम दूसरों के साथ बैठ सकते हैं. अगर हमारे परिवार से कोई मर जाता था तो उसे दफ़नाने में भी भेदभाव होता था.''
''हमें निजी स्कूलों में एडमिशन नहीं मिलता था और एक बार स्कूल मैनेजमेंट ने बताया कि अगर वो हमारे बच्चों को स्कूल में भर्ती करेंगे तो दूसरे बच्चे वहां पढ़ने के लिए नहीं आएंगे.''
''अब वो ख़ुद दलित कॉलोनियों में आए और बच्चों का एडमिशन कराने के लिए कहा. हमारा मानना है कि हमने सबके साथ काम करने की समानता हासिल कर ली है.''

वाकई भेदभाव ख़त्म हुआ?
पुलिस का कहना है कि होसुर गांव में माहौल शांत हो गया है. हालांकि, गांव वालों का कहना है कि गांव में एक डरावना सन्नाटा है.
मंदिर में प्रवेश वाले दिन को याद करते हुए दलित समुदाय के लोग कहते हैं कि उस दिन पूजा करने के लिए कोई पुजारी मंदिर में नहीं था और उसके बाद रखे गए खाने में भी कोई नहीं आया.
गांव वालों ने बताया कि उन्होंने पुलिस से अनुरोध किया है कि दलितों और ग़ैर-दलितों के बीच एक समझौता कराया जाए ताकि बाद में उन पर हमला न हो. तभी वो कह पाएंगे कि वाकई शांति क़ायम हो गई है.
गांव में अब भी मौजूद भेदभावों पर नज़र रखने वाले मानवाधिकार मंच के राम कुमार कहते हैं कि आज भी कई ग्रामीण समाजों में भेदभाव किया जाता है. कुछ समुदायों के लोगों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है.
राम कुमार का कहना है कि राजनीतिक दल इन लोगों को एक वोट बैंक की तरह देखते हैं और चुनाव के दौरान उन्हें पैसे, शराब का लालच देकर समाज के निचले पायदान पर ही रखने की कोशिश की जाती है.
वह कहते हैं कि शिक्षा ही एकमात्र ऐसा रास्ता है जो उनकी ज़िंदगी में बदलाव ला सकता है और भेदभाव मिटाने में मदद कर सकता है.
राज्य के कुछ हिस्सों में लैंगिकता और रिवाजों के रूप में भेदभाव मौजूद है. अनंतपुर ज़िले के एक गांव में माहवारी के दौरान और बच्चा पैदा करने बाद महिलाओं को कुछ समय के लिए गांव से बाहर रखा जाता है.
तमिलनाडु में वनाम्बादी शहर के पास नारायणपुरम के अडी द्रविदर आवास के गांव वालों का अगस्त 2019 में एक वीडियो वायरल हुआ था. इस वीडियो में दिख रहा था कि कुछ गांव वालों को श्मशान जाने वाली सड़क से जाने की इजाज़त न होने के चलते एक मृत शरीर को रस्सी से लटकाकर पुल से नीचे उतारना पड़ रहा है.
हालांकि, कुछ जगहें ऐसी भी हैं जो समानता का उदाहरण बनकर सामने आई हैं. आंध्र प्रदेश के एक गांव उप्पूलुरु में एक मंदिर में सदियों से दलित पुजारी है. यहां गांव के सभी समुदायों के लोग आते हैं और पूजा करते हैं.
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