बलात्कार पीड़िताओं के लिए इंसाफ़ की लड़ाई इतनी लंबी क्यों?

- Author, नेहा दीक्षित
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
दिल्ली में रहने वाली बलात्कार पीड़ित शालिनी (बदला हुआ नाम) कहती हैं कि, 'इंसाफ़ मांगना इंसानियत का संकेत नहीं है. इंसाफ़ की लड़ाई लड़ रहे पीड़ित को हर क़दम पर सहयोग करना असल इंसानियत है.' शालिनी पिछले आठ बरस से अपने लिए इंसाफ़ की लड़ाई लड़ रही हैं.
दिसंबर 2012 में भारत में बलात्कार के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन के बाद भारत में बलात्कार से जुड़े क़ानूनों में कई बदलाव किए गए थे. उस घटना को गुज़रे हुए सात बरस हो चुके हैं. लेकिन, आज भी भारत महिलाओं के लिए दुनिया के सबसे ख़तरनाक देशों में से एक है.
इसी साल, 29 नवंबर को तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में जानवरों की एक डॉक्टर के साथ गैंगरेप के बाद उसे ज़िंदा जला दिया गया था. दिसंबर 2012 को गैंगरेप की शिकार हुई पीड़ित लड़की को जिस तरह उपनाम निर्भया दिया गया था, उसी तरह हैदराबाद में सामूहिक बलात्कार की शिकार इस लड़की को भी मीडिया ने 'दिशा' उपनाम दिया था.
इस घटना के ख़िलाफ़ देशभर में आवाज़ उठी थी. जिसके बाद पुलिस ने गैंगरेप के चार आरोपियों को गिरफ़्तार किया और इसके छह दिन बाद, यानी 6 दिसंबर को सभी आरोपियों को एक मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया.
ये 'फ़ौरी इंसाफ़', न्यायिक प्रक्रिया को लांघ कर दिया गया था और इसकी वजह थी, युवती से बलात्कार के ख़िलाफ़ देश भर में उठ रही आवाज़ें, जो तुरंत कार्रवाई की मांग कर रही थीं. हालांकि, पुलिस ने इसे एक सामान्य मुठभेड़ बताया था जिसकी अब जांच की जा रही है.
पुलिस की ये कार्रवाई संदिग्ध हालात में की गई और भारत के क़ानूनों का खुला उल्लंघन थी. फिर भी, देशभर में हैदराबाद पुलिस की इसलिए तारीफ़ हुई क्योंकि उसने गैंगरेप के चारों आरोपियों को मुठभेड़ में मार कर 'दिशा' को 'फ़ौरी इंसाफ़' दिलाया था.

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पीड़िता को ख़तरे
मुठभेड़ में आरोपियों के मारे जाने का जिस तरह से देशभर में जश्न मना, वो इस बात का संकेत है कि हमारे देश के लोग इंसाफ़ की 'कच्छप गति' से किस कदर हताश हो चुके हैं. न्याय प्रक्रिया से लोगों का भरोसा इसलिए भी उठ गया है क्योंकि यौन हिंसा के ज़्यादातर मामलों में आरोपी छूट जाते हैं.
यौन हिंसा की पीड़िताओं के लिए ये धीमी न्याय प्रक्रिया इतनी हताश करने वाली होती है कि वो उनकी ज़िंदगी को ही ख़तरे में डाल देती है.
शहरी इलाक़ों और मध्यम वर्ग की पीड़िताओं को तो जन समर्थन मिल भी जाता है लेकिन समाज के हाशिए पर पड़े तबकों से ताल्लुक़ रखने वाली बलात्कार पीड़िताओं को इंसाफ़ की लड़ाई अकेले ही लड़नी पड़ती है.
16 दिसंबर को, दिल्ली के निर्भया गैंगरेप की सातवीं बरसी पर बीजेपी के एक विधायक कुलदीप सेंगर को बलात्कार के एक मामले में पहले दोषी ठहराया गया, फिर उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई गई.
दो साल पहले जब पीड़ित लड़की ने केस दर्ज कराया था तब उसके पिता की न्यायिक हिरासत में मौत हो गई. उसकी दो मौसियों की एक संदिग्ध दुर्घटना में मौत हो गई और उसे समाज के हर तबक़े के लांछन का सामना करना पड़ा.
इस पीड़िता ने बीबीसी को बताया कि जब कुलदीप सेंगर को सज़ा सुनाई गई, तो उसके चाचा ने कहा, 'तुम्हें सबकी मौत की क़ीमत पर इंसाफ़ मिला है.'

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गुम हो जाती हैं कई आवाजें
तेलंगाना में बलात्कार के आरोपियों के एनकाउंटर के महज़ एक हफ़्ते बाद यानी 10 दिसंबर को एक और घटना हुई.
बलात्कार की एक पीड़ित कोर्ट में अपना बयान दर्ज कराने यूपी के रायबरेली जा रही थी. रास्ते में उसे आरोपियों ने आग लगा दी. 90 फ़ीसद जल चुकी इस युवती को पहले इलाज के लिए लखनऊ और फिर दिल्ली ले जाया गया. जहां अगले दिन उस की मौत हो गई.
वो उत्तर प्रदेश के एक छोटे से ज़िले उन्नाव की रहने वाली थी. वो लोहार समुदाय से ताल्लुक़ रखती थी, जो राज्य के अन्य पिछड़ा वर्ग में आता है. लोहारों का पारंपरिक काम लोहे के औज़ार बनाने का होता है. आज भी इस समुदाय के पास ज़्यादा ज़मीनें नहीं होती हैं.
इस लड़की के बलात्कारी ब्राह्मण समुदाय से ताल्लुक़ रखते थे. जो हिंदू जाति व्यवस्था की शीर्ष जाति है. जिस रोज़ उस लड़की के शव को दफ़नाया जा रहा था, तभी वहां मौजूद तमाम ग्रामीणों में से एक ने कहा, 'नीच जाति की लड़कियों को लुभाना आसान होता है. आप उन्हें खेत में बुलाइए तो वो आसानी से आ जाती हैं.'
त्वरित इंसाफ़ के लिए मचे शोर के बीच इस पीड़ित जैसी कितनी लड़कियां हैं, जिनके इंसाफ़ के लिए संघर्ष के क़िस्से हम कभी नहीं जान पाते. ऐसी बलात्कार पीड़िताओं को नीचा दिखाया जाता है. उनका चरित्र हनन होता है.
परिवार के लोगों को धमकियां मिलती हैं. इन बलात्कार पीड़िताओं को जानलेवा हमलों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

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पिछड़े वर्ग से आने वाली पीड़िताएं
हमारे सामंतवादी और पितृसत्तात्मक समाज में जाति की भूमिका बहुत अहम होती है. आरोपियों के पास ज़ोर ज़बरदस्ती के तमाम अवसर होते हैं. उनके पास संसाधनों की कमी नहीं होती. यही वजह है कि ऊंची जाति के लोगों का बर्ताव आम तौर पर ऐसा ही हो जाता है, जिसे हम सामान्य बर्ताव मान लेते हैं.
कई मामलों में चूंकि दबे-कुचले वर्ग के लोगों को ऊंची जाति के लोगों के यहां रोज़गार मिलता है इसलिए कोई घटना होने पर पूरी जाति को आर्थिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है. अगर वो केस वापस नहीं लेते, तो उन्हें तरह-तरह से परेशान किया जाता है. धमकियां दी जाती हैं.
उत्तर भारत के राज्य हरियाणा के सोनीपत की ही एक घटना लीजिए. यहां पर जब एक बलात्कार पीड़िता ने अपनी शिकायत वापस ले ली तो उसे अदालत की अवमानना के आरोप में जेल भेज दिया गया था. जबकि उस बलात्कार पीड़िता ने ज़मीन के मालिकाना हक़ रखने वाले जाट समुदाय द्वारा अपने समुदाय के बहिष्कार के बाद बलात्कार की शिकायत को वापस लिया था.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़, भारत में रोज़ाना चार से ज़्यादा दलित महिलाओं से बलात्कार होता है. एक स्वयंसेवी संस्था द नेशनल कैम्पेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स का कहना है कि क़रीब 23 फ़ीसदी दलित महिलाएं ही अपने साथ बलात्कार की शिकायत करती हैं. इनमें से कई के साथ तो बार-बार रेप किया गया.
भारत में बलात्कार पीड़ितों की मदद और उनके पुनर्वास के लिए संसाधनों और क़दमों की भारी कमी होती है. मसलन, उन्हें सही क़ानूनी सलाह नहीं मिलती, वित्तीय मदद का अभाव होता है. इसकी वजह से उन्हें दूर शहरों में चलने वाले मुक़दमों के लिए जाने में दिक़्क़त आती है.
इसी वजह से गरीब और पिछड़े परिवारों से ताल्लुक़ रखने वाले बलात्कार पीड़िताओं के लिए इंसाफ़ की लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाना बहुत मुश्किल होता है.

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लंबी और असंवेदनशील क़ानूनी लड़ाई
बलात्कार के मुक़दमे अक्सर पीड़िता के लिए थकाने वाले और मनोवैज्ञानिक रूप से तोड़ देने वाले ज़ुल्म की तरह होते हैं. ये उन्हें इंसाफ़ की लड़ाई लड़ने से हतोत्साहित करने के तरीक़े हैं. छह साल से इंसाफ़ की लड़ाई लड़ रही एक बलात्कार पीड़ित का कहना है कि पूरी प्रक्रिया ऐसी बनाई गई है कि पीड़िता को बार-बार ये एहसास हो कि काश उसने आवाज़ न उठाई होती.
वो बताती है कि रेप पीड़िताओं को सरकार की तरफ़ से ऐसे मनोवैज्ञानिकों की मदद नहीं मिलती, जो उनकी ज़हनी सेहत का ख़याल रख सकें. इस पीड़िता का कहना है कि इंसाफ़ की ये लड़ाई एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें रेप पीड़िता के सम्मान की हिफ़ाज़त आख़िरी प्राथमिकता है.
अब से कुछ महीने पहले इसी साल सितंबर में 23 साल की एक क़ानून की छात्रा को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था. उसे अदालत ने जेल इसलिए भेजा क्योंकि उसने केंद्र और उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी बीजेपी के एक पूर्व केंद्रीय मंत्री और नेता चिन्मयानंद पर बलात्कार का आरोप लगाया था.
चिन्मयानंद पर आरोप लगाने वाली लड़की निम्न मध्यम वर्ग से ताल्लुक़ रखती है. वो उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर ज़िले की रहने वाली है. उसके पिता का एक छोटा-सा कारोबार है. बलात्कार की पीड़िता पर आरोपी ने जबरन वसूली का आरोप लगाया था जिसके बाद उसे गिरफ़्तार कर लिया गया.
वहीं, बलात्कार के आरोपी नेता इस वक़्त ज़मानत पर हैं. इस पीड़िता के पिता ने बीबीसी से कहा, ''हम पर केस वापस लेने का भारी दबाव बनाया जा रहा है. हमारी तो ज़िंदगी ही ख़त्म हो गई.''
अगर बलात्कार के आरोपी क़ानून के शिकंजे में आ भी जाते हैं, तो भी पीड़िता की ज़िंदगी पर ख़तरे की तलवार लटकती रहती है. अप्रैल 2018 में बलात्कार के आरोप में धर्म गुरू आसाराम को सज़ा होने के एक साल बाद आज भी बलात्कार की पीड़ित लड़की डर के साये में ज़िंदगी बिता रही है. जबकि इंसाफ़ के लिए उसे पांच साल लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी थी.
मुक़दमे के दौरान, इस केस के तीन गवाहों की हत्या हो गई थी. इन मामलों की ख़बर देने वाले पत्रकारों पर भी जानलेवा हमले हुए थे. पीड़िता के अध्यापकों और परिवार के सदस्यों को भी जान से मारने की धमकियां मिलती थीं. पीड़िता के पिता के ऊपर भी फ़र्ज़ी केस दर्ज करा दिए गए थे.
पीड़िता के पिता कभी ट्रांसपोर्ट का सफल कारोबार करते थे. लेकिन, बेटी को इंसाफ़ दिलाने के लिए उन्हें अपनी जीवन भर की कमाई लगानी पड़ गई. पीड़िता ने बीबीसी से कहा, ''मैं अपनी जान से ज़्यादा अपने परिवार के सदस्यों की ज़िंदगी के लिए फ़िक्रमंद हूं.'' इस समय वो पत्राचार से अपनी पढ़ाई कर रही हैं, ताकि उसे रोज़ घर से बाहर न निकलना पड़े.

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पीड़िताओं पर दबाव
आज देश में बहुसंख्यक राजनीति का उन्मादी माहौल है. ऐसे सांप्रदायिक संघर्ष के माहौल में यौन हिंसा के केस और भी पेचीदा हो जाते हैं. 2012 में 16 दिसंबर को दिल्ली में हुए गैंगरेप की घटना के बाद वर्मा आयोग ने 2013 का क्रिमिनल अमेंडमेंट एक्ट तैयार किया था.
ये क़ानून फरवरी 2013 में लागू हुआ था. इस संशोधन के ज़रिए यौन हिंसा से जुड़े क़ानूनों में कई बदलाव किए गए थे. इस पर चर्चा के दौरान क़ानून बनाने वालों ने भारत में सांप्रदायिक दंगों के दौरान महिलाओं से संगठित तरीक़े से होने वाले अपराधों का भी संज्ञान लिया था.
इसका नतीजा ये हुआ था कि भारतीय अपराध संहिता में एक महत्वपूर्ण बदलाव करके इसकी धारा 376 में (2)(जी) नाम का संशोधन किया गया था. लेकिन, क़ानून में इस बदलाव के बाद इस प्रावधान के तहत दायर किए गए सात मामलों को जिन सात महिलाओं ने दर्ज कराया था, वो 2013 में यूपी के मुज़फ़्फ़रनगर दंगों में यौन हिंसा की शिकार हुई थीं.
इनमें से छह को धमकियों, ख़ुद पर और परिजनों पर जानलेवा हमलों के अलावा संसाधनों के अभाव में अपने केस वापस लेने पड़े थे. उनमें से एक पीड़िता ने बीबीसी को बताया था, ''हम खेतों में मजदूरी करते हैं. इसके अलावा जो आरोपी हैं वो ज़मीनों के मालिक हैं. उनके रिश्तेदार पुलिस में ऊंचे ओहदों पर हैं. या तो हम अपनी जान बचा लें या फिर मुक़दमा ही लड़ लें.''

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भारत के असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाएं जब यौन हिंसा की शिकार होती हैं, तो उन्हें इसी तरह के संघर्ष से दो-चार होना पड़ता है. उन्हें बहुत कम मज़दूरी मिलती है. उनके काम में सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होती.
बलात्कार की पीड़िताओं को केवल वक़ील मुहैया करा देने भर से सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं पूरी होती. सरकारी वक़ील ऐसे मुक़दमों को गंभीरता से नहीं लेते. निजी तौर पर वक़ील करने पर वो हर सुनवाई के 70 हज़ार रुपए तक फ़ीस मांगते हैं.
ऐसे हालात में बलात्कार पीड़ित महिलाओं के लिए इंसाफ़ पहुंच से दूर हो जाता है. काम छूट जाने का डर, कई बार घर बदलने की मजबूरी और वक़ीलों से बार-बार मशविरे करने की ज़रूरत और अदालतों के चक्कर लगाने में रोज़ का काम भी जाता है और ख़र्च भी होता है.
पीड़िता के लिए रोज़ी और आमदनी के सवाल ऐसे होते हैं, जो उसके सामने बड़ा प्रश्न खड़ा कर देते हैं कि वो इंसाफ़ की लड़ाई लड़े भी या नहीं.

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पुनर्वास की ज़रूरत
1993 में सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार व अन्य बनाम डेल्ही डोमेस्टिक वर्किंग वीमेन्स फ़ोरम के मुक़दमे में राष्ट्रीय महिला आयोग को आदेश दिया था कि वो ऐसी योजना पर काम करे जो बलात्कार पीड़िताओं के आंसू पोंछने का काम करे.
सर्वोच्च अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा था कि देश में क्रिमिनल इंजरीज़ कंपन्सेशन बोर्ड की स्थापना की ज़रूरत है जो बलात्कार की शिकार महिलाओं को होने वाले दर्द, तकलीफ़, सदमे और आमदनी के नुक़सान की भरपाई कर सके.
राष्ट्रीय महिला आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद योजना का ड्राफ़्ट बना कर 1995 में केंद्र सरकार को भेजा था. क़रीब एक दशक तक ठंडे बस्ते में पड़ा रहने के बाद महिला आयोग आख़िरकार बलात्कार पीड़िताओं के लिए राहत और पुनर्वास की योजना लेकर आया था.
इसमें प्रस्ताव दिया गया था कि गृह मंत्रालय राज्य सरकारों को ये निर्देश दे कि वो बलात्कार पीड़िताओं की मदद के लिए ज़रूरी क़दम उठाएं.
2012 में बलात्कार के ख़िलाफ़ हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद इस मुद्दे पर संघर्ष करने वालों ने मांग की थी कि महिला आयोग की इस योजना को अमल में लाया जाए.
लेकिन, न तो केंद्र ने और न ही किसी राज्य की सरकार ने इस योजना के लिए बजट में प्रावधान किया. यानी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बलात्कार पीड़िताओं के लिए बनी ये योजना अफ़सरशाही की शिकार हो गई. लोग बस एक-दूसरे पर इस योजना को लागू न करने के आरोप लगाते रह गए.
बलात्कार पीड़िता शालिनी कहती हैं, ''ग़ुस्सा होना बहुत आसान है. उसी ग़ुस्से को सही दिशा में ले जाकर इंसाफ़ पाने में मदद करना बेहद मुश्किल काम है. अगर आप ऐसा नहीं कर सकते हैं, तो आप अकेले ही इंसाफ़ की लड़ाई लड़ने के लिए महिलाओं पर दबाव बनाना बंद कीजिए.''
(इस लेख में दिए गए विचार लेखक के निजी हैं.)
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