झारखंड चुनाव: इस सरयू ने रघुबर दास को डुबो दिया

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिन्दी के लिए
तारीख़: 9 जुलाई, 2019. जगह- देवघर. झारखंड के निवर्तमान मुख्यमंत्री रघुबर दास अपने 10 मंत्रियों के साथ देवघर में थे. उनके 11 सदस्यों वाली मंत्रिपरिषद का सिर्फ़ एक मंत्री उनके साथ नहीं था. वे सरयू राय थे. तब देवघर में कैबिनेट की बैठक होनी थी. सरयू राय उस बैठक में शामिल नहीं हुए. वह 13वां मौक़ा था, जब उन्होंने ख़ुद को कैबिनेट मीटिंग से दूर रखा हो.
सरयू राय इसके बाद कैबिनेट की किसी बैठक में नहीं गए. वे रघुबर दास की कार्यप्रणाली से नाराज़ थे. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की थी. इसके बावजूद रघुबर दास ने न तो उनसे बातचीत की और न मंत्रिमंडल से ही हटाया.
किसी मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी के बीच ऐसी संवादहीनता की कहानी भारतीय सियासत में शायद ही कहीं लिखी-पढ़ी या सुनी गई हो. लेकिन, झारखंड ने इसकी गवाही दी. तब भाजपा में रहे दोनों नेताओं के रिश्ते बिगड़ते चले गए.
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अब यह सार्वजनिक तथ्य है कि रघुबर दास की ज़िद के कारण सरयू राय भाजपा के टिकट से बेटिकट कर दिए गए. उन्हें जमशेदपुर पश्चिमी की उस सीट से बीजेपी का टिकट नहीं मिला, जहां से सरयू राय लगातार चुनाव जीतते रहे थे. इससे नाराज़ सरयू ने रघुबर के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया. उन्होंने जमशेदपुर पूर्वी की उस सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा की, जहां से रघुबर दास कभी चुनाव नहीं हारे थे.
अब उस सीट के विधायक सरयू राय हैं. रघुबर दास उनसे कई हज़ार मतों के अंतर से हार चुके हैं.
बाग़ी रहे हैं सरयू राय

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सरयू राय बिहार विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं. झारखंड बनने के बाद बीजेपी ने उन्हें जमशेदपुर पश्चिमी सीट से चुनाव लड़ाया था.
वर्ष 2005 में वे इस सीट से पहली बार जीते. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मुखर रहने वाले सरयू राय को बिहार के बहुचर्चित पशुपालन घोटाला को उजागर कराने का श्रेय दिया जाता है. इस कारण बिहार के दो पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और जगन्नाथ मिश्र (अब स्वर्गीय) सजायाफ्ता हुए. इसके बावजूद सरयू राय ने एक बार कहा था कि लालू यादव के साथ झारखंड की जेल में अच्छा बर्ताव नहीं हो रहा है. उनका समुचित इलाज कराया जाना चाहिए.

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उन्होंने मधु कोड़ा की सरकार पर हज़ारों करोड़ के खनन घोटाले का आरोप लगाया. उस समय ये मामला काफ़ी उछला. तब सरयू राय ने दावा किया था कि उनके पास इस संबंध में कुछ अहम काग़ज़ात हैं, जिनमें खान अलॉटमेंट को लेकर आपत्तियाँ दर्ज की गई थीं.
इन काग़ज़ात के आधार पर अख़बारों में कई रिपोर्टें छपीं. बाद के दिनों में यह गड़बड़ी सीएजी की रिपोर्ट का हिस्सा बनी. विधानसभा में हंगामा हुआ. तब कांग्रेस के समर्थन पर चल रही मधु कोड़ा की सरकार के ख़िलाफ़ कांग्रेस के ही राज्य प्रभारी अजय मकान ने कई सार्वजनिक बयान दिए. भाजपा ने इस मुद्दे को उठाया और आख़िरकार मधु कोड़ा को इस्तीफ़ा देना पड़ा. आज भी इन मामलों की सुनवाई विभिन्न अदालतों में चल रही है.
सरयू राय के बारे में कहा जाता है कि बगैर किसी सबूत के वे कोई बात सार्वजनिक नही करते. दामोदर नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने को लेकर उनका अभियान चर्चा में रहा है. वे पिछले तीन साल से एक पत्रिका युगांतर प्रकृति निकालते हैं, जिसमें पर्यावरण संरक्षण से संबंधित लेख होते हैं.
भूख से मौते के मामले में घिरे थे सरयू राय

सरयू राय के खाद्य व आपूर्ति मंत्री रहते हुए सिमडेगा में संतोषी कुमारी की कथित तौर पर भूख से हुई मौत का मामला सुर्ख़ियाँ बना.
इसके बाद भी भूख से मौत के कई और मामले चर्चा में आए लेकिन सरकार ने किसी भी मौत का कारण भूख नहीं माना.
सरयू राय ने मंत्री रहते हुए भूख से मौत को परिभाषित करने के लिए प्रोटोकॉल बनवाया.
इसे बनाने के लिए बनी कमेटी में भोजन का अधिकार अभियान से जुड़े उन सोशल एक्टिविस्ट्स को भी शामिल कराया, जिन्होंने भूख से मौत के मामले उठाए थे.
साइंस कॉलेज से पढ़ाई

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वे पटना के नामी साइंस कॉलेज में फिजिक्स के छात्र रह चुके हैं. इस विषय से पोस्ट ग्रेजुएट सरयू राय पढ़ाई के दिनों से ही मेधावी रहे हैं.
उस ज़माने में छात्रों को पढ़ाई में लगातार अव्वल आने के बाद छात्रवृतियाँ देने का प्रावधान था. सरयू राय को मैट्रिक (दसवीं) की परीक्षा के बाद नेशनल मेरिट स्कॉलरशिप मिली थी. स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद बीएससी में उन्होंने साइंस कालेज में एडमिशन लिया. तब साइंस कॉलेज में एडमिशन होना ही इस बात की मुनादी थी कि आप पढ़ने में मेधावी हैं.
68 साल के सरयू राय बिहार के रहने वाले हैं. बक्सर ज़िले के इतरही प्रखंड में जन्मे सरयू राय के माता-पिता ने ख़ुद पढ़ाई नही की थी. इसलिए, अपने बेटे को शिक्षित कराना उनका सपना था.
सरयू राय पढ़ने में तेज़ थे. उन्हें कई छात्रवृतियां भी मिलीं. उनका परिवार आज भी उसी गांव में रहता है. उनके घर के लोग खेती-किसानी से जुड़े हैं.
उन्होंने पढ़ाई के दिनों में ही सियासत शुरू कर दी और जयप्रकाश नारायण के साल 1974 के आंदोलन मे बढ़-चढ़ कर हिस्स लिया. आपातकाल के दिनों में उन्हें जेल भी जाना पड़ा. तब वे विद्यार्थी परिषद से जुड़कर लोगों के मुद्दे उठाते थे.
इसके बाद बिहार खेतिहर मंच नामक संगठन बनाकर उन्होंने किसानों के लिए काम करना शुरू किया. तब सोन नदी के जल बंटवारे को लेकर उनकी पहल राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रही.
पत्रकार भी रहे सरयू राय

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सरयू राय ने 80 के दशक में पत्रकारिता भी की. उन्होंने पटना से कृषि बिहार नामक पत्रिका निकाली. उनके क़रीबी रहे वरिष्ठ पत्रकार आंनंद कुमार ने बीबीसी को बताया कि इसके बाद उन्होंने फ्रीलांसर के तौर पर कई लेख लिखे. तब दीनानाथ मिश्र नवभारत टाइम्स के संपादक थे.
नवभारत टाइम्स तब पटना का प्रतिष्ठित अख़बार था. वरिष्ठ पत्रकार मधुकर बताते हैं कि सरयू राय ने किसानों के मुद्दे पर कई लेख लिखे. इससे उनकी पहचान बनी. उन दिनों कृषि से संबंधित उनके लेख नवभारत टाइम्स में चर्चा का विषय बनते थे.
उनके तब के लेखों का संग्रह हाल ही में किताब के तौर पर आया है. इसका विमोचन हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया था.
दरअसल, 1974 का जेपी आंदोलन और पत्रकारिता ही उनकी सियासी एंट्री का माध्यम बनी. साल 1992 में वरिष्ठ पत्रकार दीनानाथ मिश्र ने लालकृष्ण आडवाणी से उनकी मुलाक़ात कराई. उन्होंने सरयू राय को बीजेपी मे आने का ऑफ़र दिया. इसके कुछ महीन बाद सरयू राय बीजेपी में शामिल हो गए. भाजपा में रहते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में उनकी मज़बूत पैठ रही. वे उस दौर के भाजपा नेता रहे हैं, जब बीजेपी में अटल-आडवाणी-जोशी युग हुआ करता था.
हालांकि, पिछले कुछ सालों में यह दौर भी आया, जब वे बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मिलने के लिए कई दिनों तक दिल्ली में जमे रहे लेकिन शाह से उनकी मुलाक़ात नहीं हो सकी.
एक सच यह भी है कि कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत संबंधों के कारण बीजेपी के बाग़ी उम्मीदवार होने के बावजूद कई लोग उनके लिए प्रचार करते नज़र आए और उन्हें रघुबर दास के ख़िलाफ़ समर्थन दिया. अब नतीजा सामने है. सरयू राय विजेता हैं. रघुबर दास हार चुके हैं.
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