झारखंड: पाँच साल में भूख से हुई 22 मौतें बनेंगी चुनावी मुद्दा?

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी के लिए
कोयली देवी आज भी फूस की उसी झोपड़ी में रहती हैं, जहां दो साल पहले उनकी बेटी संतोषी की मौत हुई थी. तब उन्हें कई दिनों से खाना नहीं मिला था.
उसे भात खाने का मन था लेकिन घर में चावल का एक भी दाना नहीं था. थोड़ी चायपत्ती थी. थोड़ा नमक और पानी.
बेटी के पेट मे कुछ तो जाए. यह सोचकर कोयली देवी ने पानी में नमक और चायपत्ती डालकर चाय बनायी. संतोषी वह चाय नहीं पी सकी. जब मरी, तो उसके मुंह में राम-राम के बजाय भात-भात के उच्चारण थे.
यह उस मौत का सर्टिफ़िकेट था, जो दरअसल खाना नहीं खाने के कारण हुई थी.
यह झारखंड में कथित तौर पर भूख से होने वाली पहली चर्चित मौत थी. इसे अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां मिलीं और मुख्यमंत्री रघुवर दास की सरकार को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. मामला सड़क से संसद और विधानसभा तक पहुँचा.
सरकार ने इसकी जाँच करायी और इस मौत की वजह बीमारी बता दी गई.
दावा किया गया कि राज्य में किसी की मौत भूख से नहीं होने दी जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. संतोषी के बाद भी 20 और लोगों की मौत का कारण भूख को बताया गया.

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भूख से मर गए 22 लोग
चर्चित सोशल एक्टिविस्ट रितिका खेड़ा के नेतृत्व में बनी एक फैक्ट फाईंडिंग टीम ने दावा किया कि पिछले पाँच साल के दौरान झारखंड में कम से कम 22 लोगों की मौत भूख से हुई है. इन्होंने बाज़ाप्ता इसकी सूची भी जारी की.
इनकी रिपोर्ट के मुताबिक़, 28 सितंबर 2017 को सिमडेगा ज़िले के कारीमाटी गांव में 11 साल की संतोषी की मौत से पहले हज़ारीबाग ज़िले के इंद्रदेव महली की मौत भी भूख से हुई थी. मुख्यमंत्री रघुवर दास की सरकार के कार्यकाल में भूख से होने वाली वह पहली मौत थी.
एक फैक्ट यह भी है कि भूख से मौत की सूची में शामिल अधिकतर लोग वंचित समुदायों के थे.
उस फैक्ट फाइंडिंग टीम में शामिल रहे सिराज दत्ता ने बीबीसी से कहा कि कुपोषण और भूखमरी झारखंड की प्रमुख समस्या है. इसके बावजूद राज्य में क़रीब 15 फीसदी योग्य लोग आज भी राशन से वंचित हैं.
झारखंड सरकार अभी तक साल-2011 की सामाजिक-आर्थिक जनगणना के डेटा का ही इस्तेमाल कर रही है. जबकि, पड़ोसी राज्यों की सरकारें अपने ख़र्च पर इसे अपडेट करा चुकी हैं. झारखंड सरकार इसके लिए केंद्र की पहल का इंतज़ार कर रही है.
ऐसे में यहां भूख से मौत की और घटनाएं नहीं होंगी, इसकी गारंटी कोई कैसे ले सकता है. यहां की अधिकतर आबादी ग़रीब है, जो एक रुपये प्रति किलो मिलने वाले राशन के चावल पर निर्भर है.
हालांकि, सरकार इन आरोपों से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखती.

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सरकार का इनकार
झारखंड के खाद्य व आपूर्ति मंत्री सरयू राय ने कहा कि हमने हर आरोप की जाँच करायी लेकिन हमें भूख से मौत का कोई उदाहरण नहीं मिला. झारखंड पहला राज्य है, जिसने भूख से मौत की परिभाषा तय करने के लिए कमेटी बनायी और इसका एक प्रोटोकॉल निर्धारित किया.
पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने कहा कि रघुवर दास की सरकार में भूखमरी बड़ी समस्या बनकर उभरी है. सरकार इस पर क़ाबू पाने की जगह इसे झुठलाने में लगी रही. यह ज्यादा दुखद बात है.
बक़ौल हेमंत, कई मौक़ों पर तो अधिकारियों ने आधी-आधी रात को चुपके से उन घरों में अनाज फेंका, जहां किसी की मौत भूख से हुई थी. यह हमारे लिए बड़ा मुद्दा है और अगर हमारी सरकार बनी, तो हम सबको भरपेट भोजन मिलना सुनिश्चित करेंगे.
प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष राजेश ठाकुर ने बीबीसी से कहा कि भूख से मौत के मामलों पर क़ाबू पाने में मौजूदा भाजपा सरकार पूरी तरह विफल साबित हुई है. सरकार अगर गंभीर होती, तो संतोषी के बाद भूख से मौत की और घटनाएं नहीं हुई होतीं.
यह दरअसल विपक्ष का नहीं बल्कि जनता का मुद्दा है और हम जनता के साथ खड़े हैं.

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भाजपा का तर्क
हालांकि, भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता दीनदयाल वर्णवाल ने कहा कि विपक्ष झूठे आरोप लगाता रहा है. राज्य में भूख से मौत का एक भी आरोप साबित नहीं किया जा सका है. हमारी सरकार खाद्य सुरक्षा क़ानून को लागू कराने और हर व्यक्ति को भरपेट भोजन उपलब्ध कराने के प्रति हमेशा से संवेदनशील रही है.
झारखंड की मौजूदा विधानसभा चुनाव के लिए अभी तक किसी भी पार्टी ने अपना घोषणापत्र जारी नहीं किया है. लेकिन, कुछ महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव के दौरान विभिन्न पार्टियों के घोषणापत्रों का तुलनात्मक अध्ययन करने वाले सिराज दत्ता ने बताया कि लालू यादव की पार्टी राजद ने झारखंड के लिए अलग से मेनिफेस्टो जारी किया था.
इसमें भूख से मौत रोकने का वादा प्रमुखता से शामिल था. झारखंड विकास मोर्चा, झारखंड मुक्ति मोर्चा, वाम दल और कांग्रेस के मेनिफेस्टो में भी यह बात किसी न किसी तौर पर शामिल थी. ऐसे में इस विधानसभा चुनाव के दौरान भी यह मुद्दा ज़ोर-शोर से उठने की उम्मीद की जानी चाहिए.
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