झारखंड: खूंटी का वो गांव जहां राजद्रोह के केस से डरे आदिवासी फ़रार हैं-ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, झारखंड के खूंटी से
वीरान सड़कें. लोग नदारद. यहाँ तक कि ज़िला अधिकारी और प्रखंड कार्यालय में भी लोग नज़र नहीं आ रहे हैं.
ये है झारखंड के खूंटी ज़िले का मुख्यालय. यहाँ विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं.
मगर पूरे इलाके में न कोई झंडा है ना ही पोस्टर. चुनाव का प्रचार भी नहीं हो रहा है. आख़िर क्यों? पता चला लोग डरे हुए हैं.
खूंटी की पुलिस पर आरोप है कि उसने बड़े पैमाने पर ग्रामीणों और आदिवासियों के पारंपरिक ग्राम प्रमुखों के ख़िलाफ़ 'राजद्रोह' के मामले दर्ज किए हैं.
ये मामले उस आंदोलन के मद्देनज़र किए गए हैं जिसमें आदिवासियों ने 'पत्थलगड़ी' जैसा आंदोलन चलाया था जो शुरू तो खूंटी से हुआ था मगर इसकी आग मध्य भारत के जंगलों तक फैल गई थी.
'पत्थलगड़ी' आंदोलन
इस आंदोलन के तहत आदिवासियों ने बड़े-बड़े पत्थरों पर संविधान की पांचवीं अनुसूची में आदिवासियों के लिए प्रदान किए गए अधिकारों को लिख-लिख कर जगह जगह ज़मीन के ऊपर लगा दिया.
ये आंदोलन काफ़ी हिंसक भी हुआ. इस दौरान पुलिस और आदिवासियों के बीच जमकर संघर्ष हुआ और आंदोलन की आग फैलती चली गई.
सरकार ने आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल लोगों पर आपराधिक मामले दर्ज किए.
और इन मामलों में भारतीय दंड विधान की धारा 121 A और 124 A के तहत कई नामज़द लोगों के ख़िलाफ़ केस दर्ज हुआ.
खूंटी पुलिस ने बयान जारी कर कहा है कि "पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े कुल 19 मामले दर्ज किए गए हैं जिसमें सिर्फ 172 लोगों को अभियुक्त बनाया गया है."
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'राजद्रोह' के मामले
मगर कुछ जन संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के मंच 'झारखंड जनाधिकार महासभा' का कहना है कि उनके एक दल ने इसी साल अगस्त महीने में पत्थलगड़ी आंदोलन से प्रभावित गांवों का दौरा किया और दर्ज किए गए मामलों की निष्पक्ष जांच की.
उनकी रिपोर्ट में कहा गया है कि लगभग हर प्राथमिकी यानी एफ़आईआर में नामज़द के अलावा 'अन्य' लिखा गया है जिसकी ज़द में गाँव का हर बाशिंदा आ रहा है.
महासभा की अलोका कुजूर कहती हैं कि इन प्राथमिकियों में आदिवासी गांवों के पारंपरिक प्रमुखों को भी नहीं छोड़ा गया है.
सिर्फ़ तीन गांवों की आबादी 15000 के आस-पास है. अगर प्राथमिकी में 20 लोग नामज़द हैं और 'अन्य' भी लिखे गए हैं उनमें पूरे के पूरे गाँव लपेटे में आ सकते हैं.
महासभा का आरोप है कि पुलिस इन्हीं प्राथमिकियों को आधार बनाकर आदिवासियों का दमन कर रही है.

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क्या कहती है पुलिस
पुलिस इन आरोपों को ख़ारिज करती है. खूंटी पुलिस ने अपने बयान में कहा है कि 'पत्थलगड़ी आंदोलन' दरअसल आदिवासियों को भड़काने के लिए किया गया है.
इस आंदोलन के तहत आदिवासियों को भारत के संविधान के कुछ प्रावधानों से आज़ादी मांगने के लिए बाहरी लोगों द्वारा उकसाया गया.
इस आंदोलन में शामिल लोग ना तो ज़िला अधिकारी के अधिकारों का सम्मान करते हैं और ना ही अदालत का.
पुलिस का ये भी कहना है कि आदिवासियों ने पूरे प्रशासनिक अमले को ठप्प करने की कोशिश की और सरकारी अधिकारियों को गांवों में प्रवेश तक नहीं करने दिया.
पुलिस के बयान में कहा गया है, "आंदोलन में शामिल लोगों ने अपनी खुद की करेंसी लागू की और भारतीय रिज़र्व बैंक को भी ख़ारिज किया. इस दौरान पुलिस के हथियार भी लूटे गए."
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संविधान की पांचवीं अनुसूची
ज़िला मुख्यालय से हमने अंदरूनी इलाकों में जाने की कोशिश की तो कई लोगों ने हमें ये कहते हुए ऐसा करने से मना किया कि आदिवासी हमला कर सकते हैं क्योंकि वो मीडिया में आ रही 'एकतरफ़ा रिपोर्टों' से काफ़ी आक्रोश में हैं.
मगर गाँव के इलाकों में भी सन्नाटा है. पूरे के पूरे गाँव खाली पड़े हैं. सिर्फ़ बुज़ुर्ग और महिलाएं और बच्चे नज़र आये.
मैंने जब कारण पूछा तो लोगों ने अपना और अपने गाँव का नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि 'ज़्यादातर लोग भाग गए हैं क्योंकि पुलिस किसी को भी पकड़ कर ले जा रही है.'
एक दूसरे सुदूर गाँव में हमें 'पत्थलगड़ी' के पत्थरों की श्रृंखला नज़र आई. इन पर लिखा हुआ था कि आदिवासियों के लिए सरकारी नियुक्तियों पर सौ फ़ीसदी आरक्षण सुनिश्चित किया जाए.
इसके अलावा पत्थरों पर भारत के संविधान की पांचवीं अनुसूची में आदिवासियों के लिए प्रदान किए गए अधिकारों को भी प्रमुखता से लिखा गया है.

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'पुलिस पकड़ सकती है'
इस तरह के पत्थर खूंटी के लगभग हर गाँव में देखने को मिलते हैं मगर लोग अब इसके बारे में चर्चा नहीं करना चाहते.
बहुत मुश्किल से कुछ लोग तैयार भी हुए लेकिन उन्होंने अपने चेहरे छिपा लिए.
एक ग्रामीण का कहना था कि जबसे पुलिस ने मामले दर्ज किए हैं, कोई भी युवक या अधेड़ उम्र वाला गाँव में नहीं रहता क्योंकि पुलिस किसी को भी उठा ले जा रही है.
वो कहते हैं, "मेरा नाम किसी प्राथमिकी में दर्ज नहीं है. मगर मुझे भी पुलिस पकड़ सकती है क्योंकि मेरे गाँव के कुछ लोग नामज़द है. उसी प्राथमिकी में 'अन्य' की श्रेणी में किसी को भी उठा कर ले जा रहे हैं."
एक ऐसे ही सुदूर गाँव में हमारी मुलाक़ात ग्रामीणों के एक समूह से हुई जो हमारी गाड़ी देखते ही सतर्क हो गए.
कुछ देर के बाद वो बोलने लगे कि किस तरह पिछले कई वर्षों से आदिवासियों के अधिकारों का हनन होता आया है.

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जनप्रतिनिधियों की चुप्पी
एक अधेड़ उम्र के ग्रामीण ने सवाल उठाया, "पांचवीं अनुसूची क्या है? ये तो राज्यपालों को भी पता नहीं क्योंकि उन्होंने कभी भी संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का इस्तेमाल कर आदिवासियों को बचाने की कोशिश भी नहीं की. इसलिए बाहरी लोगों ने आदिवासियों के ज़मीनों को लूटा, संकृति को लूटा और रोज़गार को ही लूटा."
आंदोलन से जुड़े लोगों ने अफ़सोस जताया कि इतना सबकुछ होने के बावजूद भी सरकार ने गांव वालों से कोई बातचीत नहीं की.
उनका ये भी आरोप है कि राजनितिक दलों के नेता और जनप्रतिनिधियों ने भी आंदोलन के दौरान चुप्पी साधे रखी.
यही कारण है कि किसी भी राजनीतिक दल के लोग वोट मांगने के लिए भी सुदूर इलाकों में नहीं जाते हैं.

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हालांकि पुलिस कहती है कि सिर्फ़ 96 लोगों के ख़िलाफ़ ही राजद्रोह के मामलों में सरकार से अभियोजन शुरू करने की अनुमति मांगी जबकि 48 लोगों के ख़िलाफ़ आरोप पत्र दायर किए गए हैं.
मगर झारखंड जनाधिकार महासभा का आरोप है कि खूंटी पुलिस ऐसे बयान देकर सबको 'गुमराह' करने की कोशिश कर रही है जबकि ज़मीनी हकीक़त कुछ और ही है.
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