हैदराबाद और उन्नाव: नेताओं की इस राजनीति से किसका भला होगा?

बलात्कार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

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    • Author, सिन्धुवासिनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दक्षिण भारत का हैदराबाद और उत्तर भारत का उन्नाव. ये दोनों इन दिनों देश की राजनीति का केंद्र बने हुए हैं.

हैदराबाद और उन्नाव, दोनों ही जगहों पर लड़कियों से पहले गैंगरेप हुआ और फिर उन्हें जलाकर मार डाला गया. दोनों पीड़िताएं अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी बातें हर कोई कर रहा है. फिर चाहे राजनीतिक दलों के नेता हों या आम लोग.

नेता लगातार ट्वीट कर रहे हैं. धरना दे रहे हैं. बयान दे रहे हैं.

कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने जहां उन्नाव पीड़िता के घर पहुंचकर उनके परिजनों से मुलाकात की वहीं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव विरोध जताने के लिए विधानसभा के बाहर धरने पर बैठ गए.

अखिलेश यादव ने कहा, "उन्नाव की बहन की हत्या में भाजपा सरकार की लापरवाही ज़िम्मेदार है. ये प्रदेश की हर नारी के गरिमामय जीवन व सुरक्षा का प्रश्न है. अगर भाजपा के मुख्यमंत्री में नारी के सम्मान के लिए अंश मात्र भी संवेदनशीलता व संवेदना है तो वो त्यागपत्र दें. ये प्रदेश की हर नारी और हमारी भी माँग है."

प्रियंका गांधी ने ट्वीट कर पूछा, "उन्नाव की पिछली घटना को ध्यान में रखते हुए सरकार को तत्काल पीड़िता को सुरक्षा क्यों नहीं दी गई? जिस अधिकारी ने उसका एफ़आईआर दर्ज करने से मना किया उस पर क्या कार्रवाई हुई? उत्तर प्रदेश में रोज़-रोज़ महिलाओं पर जो अत्याचार हो रहा है, उसको रोकने के लिए सरकार क्या कर रही है?"

बलात्कार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

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उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा प्रमुख मायावती ने इस सम्बन्ध में राज्यपाल से आनंदीबेन पटेल से मुलाकात की. इससे पहले उन्होंने हैदराबाद में गैंगरेप अभियुक्तों के कथित एनकाउंटर का स्वागत करते हुए उत्तर प्रदेश की पुलिस को हैदराबाद पुलिस से सीख लेने की नसीहत भी दे डाली थी.

अपना दल की अनुप्रिया पटेल ने सभी राजनीतिक दलों से आपसी मतभेद छोड़कर महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों के ख़िलाफ़ एकजुट होने को कहा. अनुप्रिया पटेल ने ये भी कहा कि महिला सुरक्षा किसी भी राज्य या केंद्र सरकार के लिए कभी प्राथमिकता नहीं रही है.

इससे पहले संसद में हुई बहस के दौरान कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी और बीजेपी नेता स्मृति ईरानी के बीच तीखे ज़ुबानी हमले हुए. अधीर रंजन चौधरी ने तंज़ करते हुए कहा कि 'एक ओर राम मंदिर बन रहा है और दूसरी ओर सीताएं जलाई जा रही हैं."

जवाब में स्मृति ईरानी ने मालदा का ज़िक्र किया और कहा कि जिन लोगों ने पंचायत चुनाव में रेप को राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया वो आज संसद में भाषण दे रहे हैं.

स्मृति ईरानी

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'बलात्कार का घोषणापत्र में आना दुखद होगा'

इन सारे आरोपों-प्रत्यारोपों और बयानबाजी के बीच क महत्वपूर्ण सवाल कहीं नेपथ्यमें रह जाते हैं. मसलन, क्या बलात्कार और यौन हिंसा के मुद्दों का राजनीतीकरण होता है? क्या राजनीतिक पार्टियां महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा और महिलाओं के बाकी मुद्दों को लेकर गंभीर हैं?

भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता और सुप्रीम कोर्ट में वकील नलिन कोहली कहते हैं कि महिलाओं के साथ होने वाले अपराध दिनोंदिन बढ़ते जा रहे हैं और ये बेहद गंभीर विषय है. यही वजह है कि नेताओं में भी आक्रोश है और वो आक्रोश अलग-अलग बयानों में सामने आ रहा है.

अगर राजनीतिक पार्टियां वाक़ई महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों को लेकर संजीदा हैं तो ये उनके घोषणापत्रों में क्यों नहीं दिखता है?

इसके जवाब में कोहली कहते हैं, "अगर घोषणापत्र में हमें रेप को मुद्दा बनाना पड़े तो यह अत्यधिक दुखद बात होगी. क्योंकि इसका अर्थ ये होगा कि रेप एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है. घोषणापत्र मूल रूप से विकास योजनाओं के लिए होता है कि देश आगे कैसे बढ़ाना है. महिलाओं की भागीदारी भी बराबरी की भागीदारी होती है. घोषणापत्र की हर योजना सबके लिए होती है. उसे महिला, पुरुष, वृद्ध या बच्चों के लिए अलग-अलग चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. महिलाओं से जुड़े मुद्दों को घोषणापत्र से ऊपर उठकर देखना पड़ेगा."

बलात्कार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

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'महिलाओं के मुद्दों को लेकर संजीदा नहीं हैं सरकारें'

कांग्रेस नेता सुष्मिता देव का मानना है कि आधी आबादी यानी महिलाओं के मुद्दों को राजनीतिक एजेंडे में जितनी अहमियत मिलनी चाहिए, उतनी नहीं मिलती है. वो ये भी कहती हैं कि सरकारों में महिलाओं के मुद्दों को लेकर पर्याप्त संजीदगी नहीं है.

भारत के राजनीतिक दल महिलाओं के मुद्दों को चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनाते? उनके मुद्दों को चुनावी घोषणापत्र में बाकी मुद्दों की तरह प्राथमिकता क्यों नहीं मिलती?

इसके जवाब में सुष्मिता कहती हैं, "ये स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है. इस बार मैं लोकसभा चुनाव की मेनिफ़ेस्टो कमेटी में थी और समिति में जितने भी सदस्य थे, जितने भी नेता था, उनका मानना था कि महिलाएं एक अलग वोट बैंक हैं. उनका एक 'कॉमन' और 'युनीक' इंट्रेस्ट होता है."

सुष्मिता देव कहती हैं कि ज़रूरत इस बात की है कि पार्टियां घोषणापत्र में शामिल किए गए महिलाओं से सम्बन्धित मुद्दों का पर्याप्त प्रचार करें. चुनावी रैलियों, भाषणों और बयानों में उनका ज़्यादा से ज़्यादा ज़िक्र करें.

साक्षी महाराज

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'संसद से बाहर रखे जाएं गंभीर आरोपों में घिरे लोग'

गंभीर अपराधों में घिरे उम्मीदवारों को टिकट देने, उनके विधानसभा और संसद में बैठने के सवाल पर नलिन कोहली कहते हैं कि बलात्कार की घटनाओं को इससे जोड़कर देखा जाना उचित नहीं है.

आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं और जन-प्रतिनिधियों के बारे में पूछने पर कोहली ने कहा कि 'सांसद और जन प्रतिनिधि भी तो हमारे समाज का ही हिस्सा हैं.'

हालांकि इस बारे में सुष्मिता देव की राय नलिन कोहली से ज़ुदा है. उन्होंने कहा, "हमारे क़ानून का नियम है कि जब तक किसी का अपराध साबित नहीं होता उसे निर्दोष ही माना जाता है. हालांकि मेरा मानना है कि बलात्कार, हत्या और यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर अपराधों के अभियुक्तों को संसद से बाहर रखा जाना चाहिए. ख़ासकर जिनके ख़िलाफ़ आरोपपत्र दायर हो चुका हो."

बलात्कार जैसे अपराध के बाद राजनीतिक पार्टियों और नेताओं की बयानबाजी से क्या हासिल होता है? क्या ये महज मुद्दे का राजनीतीकरण है?

इसके जवाब में सुष्मित देव कहती हैं, "जन प्रतिनिधि का ये काम होता है कि वो जनता के मूड को संसद तक पहुंचाए,उनकी आवाज़ बने. इसलिए अगर किसी भी मुद्दे पर सदन में बहस होती है, सवाल-जबाव होते हैं, प्रदर्शन होते हैं, तो उसे मैं राजनीतीकरण के तौर पर नहीं देखती. अगर जनता किसी घटना से नाराज़ है तो जन प्रतिनिधि आवाज़ उठाएगा ही. मगर मैं ये भी मानती हूं कि विरोध सिर्फ़ विरोध करने के लिए विरोध नहीं करना चाहिए."

वहीं, नलिन कोहली राजनीतीकरण के बारे में पूछे जाने पर कहते हैं कि इस बारे में कुछ भी कहना कठिन है. साथ ही वो ये कहते हैं कि समाज सुधार और अपराध जैसे विषयों का राजनीतीकरण नहीं होना चाहिए.

नरेंद्र मोदी

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2019 लोकसभा चुनाव में महिला सुरक्षा मुद्दा था?

सत्ताधारी बीजेपी के 'संकल्प पत्र' नाम के घोषणापत्र में 'महिला सशक्तीकरण' को चार बिंदुओं में निबटा दिया गया था और इसमें महिला सुरक्षा का कहीं ज़िक्र नहीं था.

वहीं, कांग्रेस के घोषणापत्र में महिला मुद्दों को 'स्वाभिमान' नाम के वर्ग में रखा गया था. इसमें 13 बिंदुओं में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के क़ानून की विस्तृत समीक्षा की बात कही गई थी.

इसके अलावा महिलाओं और बच्चों के साथ होने वाले जघन्य अपराधों की जांच के लिए एक अलग जांच एजेंसी की वकालत की गई थी.

बीबीसी की रियलिटी चेक टीम ने अपनी पड़ताल में पाया है कि साल 2012 के बाद से बलात्कार और यौन हमलों के मामले दर्ज होने की संख्या में तेज़ी से बढ़त हुई है लेकिन इन मामलों में 'कन्विक्शन रेट' यानी अपराध साबित होने की दर और तय वक़्त पर फ़ैसला आना अब भी बड़ी चुनौती है.

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