कितने दिन तक चलेगी महाराष्ट्र की ठाकरे सरकार? नज़रिया

सोनिया गांधी, शरद पवार, उद्धव ठाकरे

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    • Author, सुहास पलशीकर
    • पदनाम, समाजशास्त्री, बीबीसी हिंदी के लिए

महाराष्ट्र में महीने भर लंबी राजनीतिक रस्साकशी के बाद आख़िरकार सरकार का गठन हो गया है.

नई सरकार के घटक दलों एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस ने विधानसभा में अपना बहुमत साबित कर दिया है.

ऐसे में ये कहा जा सकता है कि नई सरकार ने अपना काम करना शुरू कर दिया है.

लेकिन किसी भी गठबंधन सरकार को चलाना दो खंबों के बीच बंधी रस्सी पर चलने जैसा काम होता है.

ऐसा करना तब और ज़्यादा मुश्किल हो जाता है जब गठबंधन के घटक दलों के बीच किसी तरह की वैचारिक सहमति का अभाव हो.

ऐसे गठबंधन पर चलने वाली सरकार हमेशा ही एक तरह की अनिश्चितता की शिकार बनी रहती है.

महाराष्ट्र में वर्तमान राजनीतिक स्थिति के अनुसार बीजेपी किसी भी तरह के राजनीतिक हथकंडे अपनाने के लिए स्वतंत्र है.

लेकिन अगर गठबंधन के घटक दलों ख़ासकर कांग्रेस की ओर से इस तरह का कोई क़दम उठाया जाएगा तो कुछ लोग सिद्धांतों की बात करेंगे.

ऐसे में नई महाराष्ट्र सरकार के काम-काज पर पर पैनी नज़र रखी जाएगी.

सरकार के अंदर और बाहर, सहयोगियों और विरोधियों समेत सभी पक्ष सरकार में किसी भी तरह के मतभेदों पर निगाह रखेंगे.

उद्धव ठाकरे

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कब तक चलेगी ये सरकार?

महाविकास अघाड़ी सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल सरकार की स्थिरता को लेकर होगा.

कांग्रेस और एनसीपी बीते कई सालों से शिवसेना से लड़ती आ रही हैं.

साल 1995 में शिवसेना ने कांग्रेस की हार में बड़ी भूमिका अदा की थी.

ऐसे में इस पृष्ठभूमि के साथ ये तीनों पार्टियां अपने गठबंधन को कब तक बचाने में कामयाब होंगी, ये एक बड़ा सवाल है.

इसके साथ ही एक सवाल ये भी है कि इन तीनों पार्टियों का आधार भी कमोवेश एक जैसा ही है.

और इनके बीच नई सरकार में ज़्यादा से ज़्यादा शक्ति हासिल करने को लेकर संघर्ष की ख़बरें आती रहेंगी.

ऐसे में राजनीतिक हल्क़ों में ये चर्चा चल रही है कि ये सरकार आंतरिक कलह के दबाव में आएगी या नहीं?

सरकार के अंदर जारी सत्ता संघर्ष की जो ख़बरें आ रही हैं, उनसे ये पता चलता है कि उन्हें ये पता नहीं है कि वे कितनी नाज़ुक स्थिति में हैं.

जब इस तरह के गठबंधनों में पार्टी नेता इस ग़लतफ़हमी में रहते हैं कि उन्हें सिर्फ अपनी व्यक्तिगत और दलीय महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करनी है तो इस तरह के प्रयोग बुरी तरह फेल होते हैं.

अजित पवार

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एनसीपी नेता अजित पवार ने अपनी सरकार बनाने से पहले इस तरह की सोच का प्रदर्शन किया था.

अगर मुख्यमंत्री बनने की चाहत रखने वाला कोई व्यक्ति सत्ता से आगे कुछ नहीं देख पाता है तब आप एक आम पार्टी वर्कर से क्या उम्मीद लगा सकते हैं.

महाराष्ट्र में जब ये साफ़ हो गया कि शिवसेना और बीजेपी के बीच पटरी नहीं खा रही है. ऐसी स्थिति में अगर कोई व्यक्ति नई सरकार की संरचना और उसके भविष्य को लेकर सोचने की जगह सिर्फ़ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के बारे में सोचे तो इस तरह की राजनीति को मौक़े तलाशने की राजनीति कहना चाहिए.

अब चिंता की बात बस ये है कि इन्हीं अजित पवार को नई सरकार में उप मुख्यमंत्री का पद कब मिलेगा.

अगर एक नेता इतनी स्वार्थ भरी राजनीति करेगा तो उसके समर्थक भी इस सरकार को चंद दिनों की चांदी की तरह देखेंगे.

जब तक पार्टी के बड़े नेता इस सरकार की दिशा और दशा को ध्यान में रखकर राजनीतिक सामंजस्यता करने के लिए इच्छुक नज़र नहीं आएंगे तब तक दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेता राजनीतिक सामंजस्य नहीं बिठाएंगे.

कितनी स्थिर होगी ठाकरे सरकार?

ऐसे में सवाल ये है कि क्या उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में बनी ये सरकार चल पाएगी.

अगर हाँ तो क्या ये एक स्थिर सरकार के रूप में काम कर पाएगी.

उद्धव ठाकरे

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अगर ये सरकार अगले एक या दो साल में गिर गई तो इससे तीनों पार्टियों की साख पर बट्टा लग जाएगा.

शिवसेना इस सरकार का नेतृत्व कर रही है. वे बाला साहेब ठाकरे को याद करते हुए कुछ दिन गुज़ार सकते हैं.

लेकिन उन्हें ये याद रखना चाहिए कि उन्हें संख्याबल के बिना सत्ता मिली है.

ये पहला मौक़ा है कि जब शिवसेना को एक पार्टी के रूप में खड़ा होने का मौक़ा मिला है.

अगर वे अपने इस प्रयोग में सफल नहीं होते हैं तो इससे उनकी राजनीतिक हैसियत पर प्रश्चचिह्न लग जाएगा.

इसके साथ ही वे अपने राजनीतिक रसूख़ से भी हाथ धो सकते हैं.

सोनिया गांधी

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वहीं, दूसरी ओर कांग्रेस को ये याद रखना चाहिए कि वह इस गठबंधन में क्यों शामिल हुई है.

ये सब कुछ राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में बीजेपी को अलग-थलग करने के मकसद से किया गया है.

महाराष्ट्र में कांग्रेस के नेताओं को अपने पार्टी वर्कर्स को भी ये बात याद दिलाने की ज़रूरत है.

इसके साथ ही कांग्रेस नेताओं को अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं ये बताने की भी ज़रूरत है कि आगे की राजनीति इसी प्रयोग से होकर निकलेगी.

ये तीन पार्टियां एक साथ काम कर सकती हैं. लेकिन हर दल अपने प्रभाव को बढ़ाना चाहता है.

ऐसे में सत्ता के बंटवारे से लेकर और स्थानीय स्तर पर लोगों के साथ जुड़ाव बढ़ाने जैसे विषयों पर तीनों पार्टियों के बीच प्रतिस्पृधा देखने को मिलेगी.

इस तरह की स्थिति में ये बहुत मुश्किल नहीं होगा कि ठाकरे सरकार एक ट्राइपॉड पर रखे हुए कैमरे की माफ़िक लगे.

शरद पवार

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मैंने अपने पिछले लेखों में लिखा है कि अगर इस सरकार का गठन होता है तो इस सरकार को चलाना तीन पैरों से की जाने वाली रेस करने जैसा होगा.

अब बीते दस दिनों में अजित पवार के बागी तेवर देखने के बाद कोई भी ये कह सकता है कि ये सरकार कुछ समय तक चलेगी लेकिन एक तरह की मजबूरी के साथ.

न्यूनतम साझा कार्यक्रम क्या सिर्फ़ एक औपचारिकता?

इस वजह से इस सरकार की नीतियों, कार्यक्रमों और उनका क्रियान्वन बेहद अहम हो जाता है.

ये बात तो तय है कि सरकार में अंतर्कलह सामने आएंगे.

लेकिन अगर ये सरकार अपनी पहचान आंतरिक कलह वाली सरकार के रूप में नहीं चाहती है तो इसे नीतियों और उनके क्रियान्वन पर ध्यान देना होगा.

बहुत छोटे समय में ही हमने ये देखा है कि विधानसभा में बहुमत साबित करने के बाद नई सरकार की ओर से रटे-रटाए ऐलान किये गए हैं.

उद्धव ठाकरे

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सरकार के समर्थक ये कहेंगे कि किसी भी सरकार के प्रदर्शन को जांचने का ये बहुत छोटा समय है और सरकार की दशा और दिशा आने वाले दिनों में सोच-समझकर तय की जाएगी.

लेकिन इतना कहा जा सकता है कि इस सरकार की शुरुआत निराश करने वाली है.

इस निराशा का पहला चरण बीती 28 नवंबर को न्यूनतम साझा कार्यक्रम जारी होने के साथ ही शुरू हुआ.

ऐसा लगता है कि ये कार्यक्रम बेहद जल्दबाजी में बनाया गया होगा क्योंकि इसमें ताकत का बंटवारा एक बड़ा मुद्दा है.

इस न्यूनतम साझा कार्यक्रम में ऐसी कोई बात नहीं है जिसे देखकर ये कहा जा सके कि नई सरकार के पास एक नई सोच है.

जब महाराष्ट्र में कृषि और अर्थव्यवस्था की हालत ख़राब है तब इस कार्यक्रम में इन मुद्दों को लेकर मामूली सुधार किए जाने की बात की गई है.

इसमें कोई ग़लत बात नहीं है कि सरकार वर्तमान स्थिति में सुधार के लिए तत्काल कड़े कदम उठाने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साफ करे.

उद्धव ठाकरे

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लेकिन अगर आप पांच साल तक पूरे आत्मविश्वास के साथ सरकार चलाने की स्थिति में हैं तो न्यूनतम साझा कार्यक्रम में दीर्घकालिक नीतियों की झलक मिलनी चाहिए थी.

इस कार्यक्रम में ये बात साफ होनी चाहिए थी कि नई सरकार किस दिशा में काम करेगी और पिछली सरकार इन मुद्दों के प्रति किस तरह असंवेदनशील थी.

लेकिन न्यूनतम साझा कार्यक्रम एक संकुचित नज़रिए के साथ कर्जमाफी जैसी योजनाओं पर निपट जाता है.

क्या इन पार्टियों को लगता है कि ये काफ़ी है.

नीतियों का अभाव

न्यूनतम साझा कार्यक्रम और चुनावी घोषणापत्र में अंतर होता है.

चुनावी घोषणापत्र कुछ चर्चित मुद्दों के आसपास बुना जाता है ताकि मतदाताओं का समर्थन हासिल किया जा सके.

अब जबकि सरकार का गठन हो गया है तो इसके बाद सरकार की ओर से नीतियों के ऐलान की अपेक्षा किया जाना लाज़मी है.

महिलाओं, स्वास्थ्य या शिक्षा...ऐसे मुद्दों पर इस न्यूनतम साझा कार्यक्रम में क्या दिया गया है?

ये एक निबंध की तरह है जिसे एक टेंप्लेट पर लिखा गया है जिसमें कुछ रिक्त स्थानों को भरकर न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार हो जाता है.

इस कार्यक्रम को लेकर सवाल उठाना उचित है क्योंकि ये तीनों पार्टियां पहली बार सत्ता में साथ आई हैं.

बाला साहेब ठाकरे

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ऐसे में न्यूनतम साझा कार्यक्रम ही वो चीज़ है जो आने वाले दिनों में इस सरकार की दिशा और दशा को लेकर कुछ बता सकती है. लेकिन इस कार्यक्रम में ऐसी कोई बात नहीं है.

ऐसे में ये भी हो सकता है कि ये लोग आने वाले दिनों में किसी भी बात पर झगड़ सकते हैं या फिर हाथ पर हाथ रखकर बैठ सकते हैं.

लोकलुभावन वादे

अब जबकि सरकार बन चुकी है तब इसने कुछ ऐलान करने शुरू किए हैं.

राज्यपाल के भाषण से अगर कोई इस सरकार के भविष्य का अंदाजा लगाने की कोशिश करे तो ये पता चलेगा कि ये अकल्पनीय स्थिति से लोकलुभावनवाद की ओर यात्रा करने जैसा है.

न्यूनतम साझा कार्यक्रम में रोजगार को लेकर तीन बातें कही गई हैं.

इसमें बेरोजगार युवाओं को फेलोशिप, सरकारी नियुक्तियां और 80 फीसदी नौकरियां स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित करने की बात है. ये कार्यक्रम काफ़ी पॉपुलर होगें.

लेकिन इन कार्यक्रमों से जुड़ी विस्तिृत जानकारी कहां हैं. इन्हें अमल में कैसे लाया जाएगा और ये विकास की गाड़ी को आगे कैसे बढ़ाएंगे. इन पर कोई जानकारी नहीं है.

ये घोषणाएं लोकप्रियता को ध्यान में रखकर की गई होंगी.

अजित पवार

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लेकिन अगर कोई लंबे समय के लिए अपनी छाप छोड़ना चाहता है तो उसे त्वरित लोकप्रियता से आगे बढ़कर समस्याओं के समाधान के लिए ख़ास उपायों की कल्पना करनी होती है.

ये सही है कि रोजगार और कृषि दोनों ही अहम मुद्दे हैं. लेकिन इन सेक्टरों के सुधार के लिए उठाए जाने वाले इस तरह के मामूली कदमों से कोई मदद नहीं मिलेगी.

उदाहरण के लिए, अगर फ़ेलोशिप स्कीम पिछली सरकार जैसी मुख्यमंत्री फ़ेलोशिप स्कीम है तो ये प्रयोग काफ़ी ख़तरनाक हो सकता है.

क्योंकि वो स्कीम पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों के लिए रोजगार गारंटी योजना की तरह थी.

सरकार इसकी जगह छोटे शहरों में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना को लागू करके इसके अमलीकरण में निजी क्षेत्र की मदद ले सकती है.

इससे कौशल विकास योजना के लाभार्थियों को काम करने का मौका भी मिल सकता था.

इसके साथ ही सरकार के सामने ये चुनौती होगी कि वह किस तरह सरकार पर नौकरियां देने का दबाव कम करके स्वरोजगार को बढ़ावा दे सके.

लेकिन 80 फीसदी आरक्षण की बात कहा जाना एक बेहद गंभीर मसला है. देखा जाए तो कांग्रेस को ये तरीका बहुत पसंद है.

उद्धव ठाकरे

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लेकिन अगर अमलीकरण की बात हटा भी दी जाए तो ये सामाजिक विविधता की सोच के ख़िलाफ़ जाता है. ये बस कुछ उदाहरण हैं.

इस न्यूनतम साझा कार्यक्रम की सबसे ख़राब बात ये है कि इसमें सरकार का आत्मविश्वास नहीं झलकता है कि ये पांच साल तक चलने के लिए है.

इसकी जगह ऐसा लगता है कि इसका मकसद लोगों की सोच को अल्पकाल के लिए सकारात्मक रखने के लिए है.

कल्पना की ज़रूरत

हम ये मान सकते हैं कि ये सरकार कुछ समय बीतने के बाद अहम मुद्दों पर काम करके दिखाएगी.

उदाहरण के लिए कृषि के केंद्रीय मुद्दे को छोड़ भी दिया जाए तो शहरों और रोज़गार को जोडे़ जाने की ज़रूरत हैं.

राज्य वित्त आयोग के सुझावों को मानकर शहर निगमों और ज़िला परिषदों को पर्याप्त कोष देकर ऐसी योजनाओं को बनाने की ज़रूरत है जो कि बेमतलब के कोष बनाने से आगे जाकर राज्य के अलग-अलग हिस्सों में संतुलित विकास ला सके.

इसके साथ ही बड़े शहरों के तेजी से होते फैलाव पर रोक लगाने की योजना के साथ योजना परिषदों को मजबूत किए जाने की ज़रूरत है ताकि विकास को एक दिशा मिल सके.

अगर ये सरकार इन मुद्दों पर तेजी से कदम उठाने में सक्षम हो पाएगी तो ये अपनी छाप छोड़ने में सक्षम होगी.

अगर ये ऐसा करने में सफल नहीं होगी तो ये भी दूसरी तमाम सरकारों जैसी ही साबित होगी और जनता से बहुत दूर होगी.

और अगर इसकी मौजूदगी बेअसर साबित होगी तो ये अपनी वैधता भी खो देगी .

इन तीनों पार्टियों को राज्य हित के साथ साथ अपने हितों को ध्यान में रखते हुए दूरदर्शिता और कल्पनाशक्ति के साथ काम करना होगा.

ये संभव है कि ये पार्टियां इस बारे में भूल जाएं, इसलिए ये हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम इन्हें याद दिलाते रहें.

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