एमनेस्टी रिपोर्ट: विदेशी ट्रिब्यूनलों के काम से असंतुष्ट

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवददाता

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भारतीय अधिकारियों और अदालतों पर असम में विदेशी ट्रिब्यूनल की अदालतों के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाये हैं. इसके अनुसार असम में विदेशी ट्रिब्यूनल की वजह से लोगों में दहशत फैली हुई है. 

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने बुधवार को एक अपनी एक रिपोर्ट में कहा, "विदेशी ट्रिब्यूनलों को अदालतों, भारत सरकार और असम सरकार द्वारा जवाबदेह नहीं ठहराया गया है."

एजेंसी के अध्यक्ष आकार पटेल के अनुसार पिछले 15 वर्षों से विदेशी ट्रिब्यूनलों ने असम में लोगों को अपनी नागरिकता से वंचित रखने के मामले में कहर बरपाया है.

विदेशी ट्रिब्यूनलों पर टिप्पणी करते हुए आकार पटेल ने कहा, "देखिये विदेशी ट्रिब्यूनल अदालत नहीं है. ये सिविलियन लोग हैं जो तय करते हैं कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं है.''

उनके अनुसार ट्रिब्यूनल के लोगों को सरकार ये टारगेट देती है कि वो कितने लोगों को भारतीय नागरिक ना घोषित करे और अगर उनका टारगेट पूरा नहीं होता है तो उन्हें हटा दिया जाता है. 

राज्य में 19 लाख लोगों को नागरिक सूची से बाहर कर दिया गया था जो इस फै़सले को विदेशी ट्रिब्यूनल में चैलेंज करते हैं.

आकार पटेल कहते हैं कि जिन लोगों को नागरिक सूची से बाहर किया गया है उनमे हिन्दू, मुस्लिम, सिख और दलित सभी संप्रदायों के लोग शामिल हैं लेकिन आकार पटेल के अनुसार नागरिक संशोधन बिल के पारित होने के बाद निशाने पर केवल मुस्लिम समुदाय होगा.

इस बिल में इस बात का प्रावधान है कि अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आकर बस गए हिंदुओं, सिखों और ईसाईयों को नागरिकता दे दी जाएगी लेकिन मुसलमानों को नहीं.

उन्होंने कहा, "जो मुसलमान नहीं हैं उन्हें अवैध शहरियों के नामों की लिस्ट से निकाला जाएगा".

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रिपोर्ट में सैंकड़ों लोगों का ज़िक्र

एक अंदाज़े के मुताबिक़ असम में 19 लाख घोषित ग़ैर नागरिकों में से पांच लाख आबादी मुसलमानों की है जिसका मतलब ये हुआ कि बिल पारित होने के बाद इनमें से 14 लाख नागरिकों के नाम इस लिस्ट से निकाल लिए जाएंगे.

लेकिन गृह मंत्री अमित शाह ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि इस बिल के पारित होने के बाद किसी ख़ास समुदाय को निशाना नहीं बनाया जाएगा. उन्होंने ये आश्वासन दिया है कि ये मुस्लिम-विरोधी बिल नहीं है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय नागरिकों को उनके नाम में छोटी-मोटी गलतियों के कारण विदेशी घोषित किया गया है.

बीबीसी से बात करते हुए आकार पटेल ने कहा कि उनकी टीम ने असम में सैकड़ों ऐसे नागरिकों से बातें की है जिनको विदेशी घोषित कर दिया गया है.

इनमें से एक रिपोर्ट में समीना बीबी का ज़िक्र भी है जिन्हें विदेशी ट्रिब्यूनल द्वारा विदेशी घोषित किया गया था और ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए कारणों में से एक यह था कि वह उस निर्वाचन क्षेत्र को याद नहीं कर सकीं जहाँ उनके दादा ने 1966 में अपना वोट डाला था.

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इसी तरह रिपोर्ट में एक अबू बकर सिद्दीक़ी से इंटरव्यू किया गया है जिन्हें इस वजह से विदेशी घोषित किया गया था क्योंकि उनके दादा का नाम एक दस्तावेज में एपर अली और दूसरे में एफर अली था.

रिपोर्ट में कहा गया है, "विदेशियों के न्यायाधिकरणों के सामने आने वाले लोगों को निष्पक्ष परीक्षण सुरक्षा और मानवाधिकारों की गारंटी नहीं दी जाती है, जो कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 से प्रभावित होते हैं, जो नागरिकों और विदेशियों दोनों पर लागू होते हैं."भारतीय जनता पार्टी के एक प्रवक्ता के अनुसार वो इस रिपोर्ट पर औपचारिक रूप से टिप्पणी नहीं करेंगे लेकिन उनकी व्यक्तिगत राय थी कि एमनेस्टी की रिपोर्ट पर भरोसा करना मूर्खता होगी क्यूंकि उन्हेंने अपनी पड़ताल में कितने लोगों से बातें कीं और क्या बातें कीं इसका ज़िक्र नहीं किया है.

प्रवक्ता के अनुसार विदेशी ट्रिब्यूनल बहुत तेज़ी से काम कर रहे हैं. उन्हें अपने काम की ट्रेनिंग भी दी गयी है.

भारत सरकार की एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने हाल में बेंगलुरु स्थित एमनेस्टी के कार्यालय पर छापेमारी की थी. मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाली संस्थाओं ने इसकी कड़ी निंदा की थी.

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