बिहार: पुरुष में गर्भाशय का अनोखा मामला

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
"मरीज़ एकदम ठीक है. वो खाना पीना ठीक से खा रहा है, चल फिर रहा है. उसे किसी तरह की कोई दिक़्क़त नहीं है" - 65 साल के रामस्वरूप (बदला हुआ नाम) के एक रिश्तेदार ने बिहार के पूर्णियाँ स्थित अपने गांव से बीबीसी पर फ़ोन पर ये बात कही.
पूर्णियाँ शहर और आसपास के इलाक़े में रामस्वरूप आजकल चर्चा में हैं. इसकी वजह उनके शरीर में एक उन्नत गर्भाशय का होना है.
सामाजिक बंधनों से डरे रामस्वरूप मीडिया से खुलकर बात नहीं करना चाहते क्योंकि उन्हें अपनी बेटियों की शादी की चिंता है.
लेकिन 25 नवंबर को जब ये मामला स्थानीय मीडिया में आया तो उन्होंने पत्रकारों से कहा, "हमारे पांच बच्चे हैं. आज तक किसी तरह की कोई दिक़्क़त महसूस नहीं हुई थी. अब डॉक्टर साहब ने पेट से बच्चेदानी निकाली है. ये समझना मुश्किल है कि जनाना (औरत) अंग हमारे अंदर कैसे आ गया."
रामस्वरूप की कहानी
बिहार की राजधानी पटना से 300 किलोमीटर दूर है पूर्णियाँ शहर. पूर्णियाँ के रौटा थाना क्षेत्र के ग्रामीण रामस्वरूप को बीती 24 नवंबर को अचानक पेट में बहुत तेज़ दर्द हुआ.
उनका पेट फूला हुआ था और हार्निया फंसा होने के कारण मामला गंभीर था. रामस्वरूप के घरवाले उन्हें इलाज के लिए पूर्णियाँ शहर स्थित रेहाना नर्सिंग होम ले गए. लेकिन इसके आगे उन्हें जो मालूम चला, वो रामस्वरूप जैसे किसी आम ग्रामीण के जीवन में थोड़ी उथल-पुथल लाने के लिए काफ़ी था.
नर्सिंग होम में रामस्वरूप का इलाज करने वाले सर्जन डॉक्टर सोहेल अहमद बताते हैं, "हमने कुछ ज़रूरी टेस्ट कराए और हार्निया का ऑपरेशन कर दिया. लेकिन जब उनका पेट चीरा गया तो उसमें एक विकसित गर्भाशय था. जिसको हमने निकाल दिया और बॉयोप्सी के लिए भेजा है. मरीज़ अब ठीक है और उन्हें 26 नवंबर को छुट्टी दे दी गई. लेकिन ये रेयर केस है."

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डॉक्टर सोहेल ने गर्भाशय की तस्दीक करने के लिए इसे स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर सना अमरीन को भी दिखाया.
डॉक्टर अमरीन ने बताया, "जब मैंने गर्भाशय देखा तो ये एक विकसित गर्भाशय था और उसमें वो सब कुछ है जो एक महिला के गर्भाशय में होता है. सोशल टैबू के चलते इसको लेकर मरीज़ और उनके परिवार के लोग सहज नहीं थे."
क्या है ये बीमारी ?
इस बीमारी को पर्सिस्टेंट म्यूलेरियन डक्ट सिंड्रोम या पीएमडीएस कहा जाता है.
'इंटरनेशनल जनरल ऑफ सर्जरी केस रिपोर्ट्स' में साल 2014 में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़, इस तरह का पहला मामला 1939 में इंग्लैंड में पहली बार रिपोर्ट हुआ था. साल 2009 तक पूरी दुनिया में ऐसे 150 मामले देखे गए हैं.

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दरअसल पीएमडीएस यौन विकास का एक विकार है, जो पुरुषों को प्रभावित करता है. पीएमडीएस से पीड़ित पुरुष में सामान्य पुरुष प्रजनन अंग और सामान्य पुरुष बाहरी जननांग होते हैं. लेकिन उनके शरीर में गर्भाशय और फ़ैलोपियन ट्यूब (महिला प्रजनन अंग) भी होते हैं.
गर्भाशय और फ़ैलोपियन ट्यूब एक संरचना से विकसित होते हैं जिसे म्यूलेरियन डक्ट (वाहिनी) कहा जाता है. इस म्यूलेरियन डक्ट में महिला और पुरुष दोनों भ्रूणों में मौजूद होते हैं.
म्यूलेरियन इनहीबिटिंग सबस्टेंस यानी एमआईएस हार्मोन के कारण पुरुष में ये डक्ट टूट जाता है. लेकिन जब कभी ये एमआईएस पुरुष में मौजूद नहीं होता तो उसमें गर्भाशय विकसित हो जाता है. और वो पीएमडीएस से पीड़ित होता है.
पहले भी सामने आया था ऐसा मामला

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साल 2013 में पूर्णियाँ में ही एक ऐसा ही मामला सामने आया था. 17 फ़रवरी 2013 में अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़ उस समय पूर्णियाँ के रुपौली थाना क्षेत्र के 30 साल के युवक मणिकांत मंडल के शरीर में पूरी तरह से विकसित गर्भाशय मिला था.
पेट दर्द से परेशान मणिकांत मंडल का ऑपरेशन उस समय डॉक्टर जर्नादन प्रसाद यादव ने किया था. हालांकि रामस्वरूप के जहां पांच बच्चे हैं वहीं मणिकांत साल 2013 में पिता नहीं बन पाए थे.
अख़बार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़ उनकी शादी को 10 साल गुज़र चुके थे और बच्चे नहीं थे. मणिकांत इसके इलाज के लिए गांव के ही एक झोलाछाप डॉक्टर के पास गए.
इस डॉक्टर ने उन्हें कहा कि हार्निया के चलते वो पिता नहीं बन पा रहे है. जिसके बाद मणिकांत इलाज के लिए डॉ जर्नादन के पास गए जहां उनके पेट में विकसित गर्भाशय मिला.

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क्या ऐसे पुरुष बच्चे को जन्म दे सकते हैं?
जब मैंने ये सवाल डॉक्टर सोहेल से पूछा तो उन्होने कहा कि ऐसे पुरुषों के गर्भधारण करने की संभावना है.
उन्होने बताया, "गर्भाशय पूरी तरह से विकसित है. पुरुष में शुक्राणु हैं और अगर इसे स्त्री के अंडाणु से मिला दिया जाए तो ऐसे पुरुष के गर्भधारण की संभावना है."
"साल 2007 में अमरीका के थामस बीटे जो ट्रांसजेंडर मैन हैं वो पहले 'गर्भवती पिता' भी बने थे हालांकि उनके गर्भधारण करने से पीएमडीएस बीमारी से कोई वास्ता नहीं था."
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