वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के 'अर्थव्यवस्था में मंदी' पर दिए बयान की हक़ीक़त क्या है?- नज़रिया

निर्मला सीतारमण

इमेज स्रोत, Getty Images

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बुधवार को राज्यसभा में कहा कि देश की विकास दर में कमी ज़रूर आई है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि अर्थव्यवस्था में मंदी है.

निर्मला सीतारमण ने कहा कि 2009-2014 के अंत में भारत की वास्तविक GDP (सकल घरेलू उत्पाद) की वृद्धि दर 6.4 फ़ीसद थी, जबकि 2014 से 2019 के बीच यह 7.5 फीसदी रही.

उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था को देखें तो पता चलता है कि विकास दर में कमी है, लेकिन यह मंदी नहीं है.

वित्त मंत्री ने संसद में जो बातें कही हैं, उनमें कितनी सच्चाई है?

क्या देश की अर्थव्यवस्था बेहतर हाल में है और वाक़ई मंदी नहीं है? बीबीसी संवाददाता मानसी दाश नेअर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला से यही जानने की कोशिश की.

निर्मला सीतारमण

इमेज स्रोत, Getty Images

भरत झुनझुनवाला का नज़रिया, उन्हीं के शब्दों में...

तकनीकी तौर पर मंदी उसे कहते हैं, जब नेगेटिव ग्रोथ रेट दो तिमाही तक रहे. जैसे अभी ग्रोथ रेट चार से पाँच फ़ीसदी के क़रीब है. अगर ये माइनस एक हो जाए और दो तिमाही तक रहे तो इसे मंदी मानेंगे.

अगर ग्रोथ रेट सकरात्मक है यानी प्लस 1 या प्लस 2, तब तक तकनीकी तौर पर ये मंदी नहीं है.

लेकिन फ़िलहाल जो चर्चाएं हो रही हैं वो अर्थशास्त्र की दृष्टि से नहीं हो रही हैं. बल्कि चर्चा ये है कि देश की जो पुरानी ग्रोथ रेट थी वो अब गिरकर चार-पाँच फ़ीसदी तक आ गई है.

अगर आपकी गाड़ी रिवर्स में नहीं चल रही है लेकिन धीरे चल रही है तो आम लोगों की नज़र में ये मंदी ही कहलाएगी. अर्थशास्त्र की दृष्टि से फ़िलहाल मंदी नहीं है.

2009-2014 और 2014-2019 की जीडीपी के फ़र्क़ का ज़िक्र वित्त मंत्री ने तुलना बताने के लिए किया. लेकिन अगर आप याद करें तो दो साल पहले जब सरकार ने जीडीपी की गणना करने के तरीक़े बदले थे तो इसकी काफ़ी चर्चा हुई थी.

इस नए तरीक़े को अपनाने से यूपीए की ग्रोथ रेट कम हो गई थी और एनडीए की ग्रोथ रेट बढ़ गई थी. आप कैसे कैलकुलेशन कर रहे हैं इस पर काफ़ी कुछ निर्भर करता है.

अर्थव्यवस्था

इमेज स्रोत, Getty Images

ग्रोथ रेट तुलनात्मक तौर पर कम क्यों?

मूल बात ये है कि अगर मोदी सरकार की बात मानी भी जाए तो यूपीए के दौरान जो ग्रोथ रेट 6.4 थी, वो अब कम क्यों हो रही है.

एक तरफ़ आप कहते हैं कि यूपीए के दौरान भ्रष्टाचार काफ़ी था और आपकी सरकार बहुत प्रभावी है. ऐसे में यूपीए के दौरान ग्रोथ रेट 6.4 थी और आपके शासन में चार-पाँच फ़ीसदी तक आ रही है.

ऐसे में सरकार को जवाब तो देना पड़ेगा.

अभी भले ही ग्रोथ रेट चार पर नहीं पहुंची है लेकिन कई अनुमान हैं कि ग्रोथ रेट अगले क्वार्टर में 4.7 या 4.9 रह सकती है. सवाल ये है कि यूपीए की तुलना में जो ख़ुद को ईमानदार सरकार कहते हैं या काफ़ी लोग मानते हैं, उस सरकार में ग्रोथ रेट तुलनात्मक तौर पर कम क्यों है?

सामान्य दृष्टि से बात करें तो नोटबंदी और जीएसटी के बाद आर्थिक विकास दर में गिरावट आई है. अब इसे मंदी कहना है या नहीं कहना है, इसमें जाने से आप मूल विषय से भटकेंगे.

मुद्दा ये है कि आपके मुताबिक़, ईमानदारी लाने के लिए आप नोटबंदी, जीएसटी लाए, भ्रष्ट अधिकारियों को निकाल रहे हैं. इसके बावजूद आर्थिक विकास दर क्यों नहीं बढ़ रही है?

निर्मला सीतारमण

इमेज स्रोत, Getty Images

क्यों नहीं बढ़ रही है आर्थिक विकास दर?

ऐसा होने की दो वजहें हैं.

नोटबंदी, जीएसटी या जो दूसरी नीतियां रहीं, वो बड़े उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए हैं.

इसीलिए आप देख रहे हैं कि ग्रोथ रेट गिर रही है और दूसरी तरफ़ शेयर बाज़ार आए दिन नई ऊंचाइयां छू रहा है.

यानी पूरी अर्थव्यवस्था में जो छोटे उद्योग थे, उनका धंधा मंदा हो रहा है और फ़ायदा बड़े उद्योगों की तरफ़ ट्रांसफर हो रहा है. नतीजा- बड़े उद्योग फल फूल रहे हैं.

इसके अलावा देश की पूंजी बाहर जा रही है.

मेरा मानना है कि सरकार ने कालेधन को लेकर सख्ती तो की लेकिन ज़मीनी स्तर पर नौकरशाहों, सरकारी अधिकारियों और नेताओं के बीच भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ है.

पहले ये लोग अपनी दो नंबर की कमाई को देश में ही रखते थे. फिर चाहे शेयर बाज़ार में लगाना हो या प्रॉपर्टी में निवेश करना.

अब ये लोग ये पैसा बाहर भेज रहे हैं.

आरबीआई

इमेज स्रोत, Getty Images

अर्थव्यवस्था के हाल का आम लोगों पर असर?

ग़ुब्बारे से जैसे हवा निकलती है, ठीक वैसे ही अब अर्थव्यवस्था की हवा निकल रही है.

अर्थव्यवस्था के मौजूदा हाल का असर आम लोगों पर भी स्थायी है. मीडिल क्लास का बहुत आर्थिक विकास हो रहा है या उनकी सैलरी बढ़ रही है, ऐसा बिलकुल नहीं है.

अगर आप अर्थव्यवस्था को तीन हिस्सों लोअर, मिडिल और अपर में बाँटें तो लोअर का हाल बुरा है, मिडिल स्थायी है और अपर बढ़ रहा है.

लेकिन इस बात पर ध्यान दीजिए कि लोअर तबक़े की गिरावट मात्रा में ज़्यादा है. इसलिए अर्थव्यवस्था सिकुड़ रही है.

मेरा मानना है कि बीते पाँच सालों में अमीर अपनी पूंजी के साथ देश से पलायन कर रहे हैं. ये लोग दूसरे देशों की नागरिकता ले रहे हैं.

इन लोगों के बीच 'नौकरशाही का आतंक' है.

अर्थव्यवस्था की मौजूदा समस्या की बात करें तो सबसे ज़रूरी है कि सरकार को भारत को विकसित देश बनाने के मोह को छोड़ना होगा.

ग्रोथ रेट

इमेज स्रोत, Getty Images

'आम आदमी को पुलवामा, रईसों को अर्थव्यवस्था'

फ़िलहाल बड़े उद्योगों को सरंक्षण देकर छोटे उद्योगों को मारा जा रहा है. उदाहरण के लिए आप बनारस के नाविकों के लाइसेंस रद्द किए जाने के मामले को लीजिए. हालांकि विरोध के बाद इस फ़ैसले को वापस ले लिया गया.

लेकिन इससे सरकार की ये मंशा भी ज़ाहिर हुई कि बड़े क्रूज़ चलाए जाएं.

अब ये सोचिए कि ऐसा करने से छोटे नाविकों पर कितना असर होता? उनका बाज़ार में जो योगदान रहा करता होगा, वो तो ख़त्म हो जाएगा.

रेरा एक्ट के आने के बाद आप किसी भी छोटे बिल्डर से बात कीजिए. बड़े बिल्डर के मुक़ाबले उसकी हालत ख़राब है. जीएसटी में छोटे उद्योगों की हालत ख़राब हो गई.

बड़ी कंपनियों में चार्टेड अकाउंटेंट होते हैं जो चीज़ों को संभाल लेते हैं. छोटी कंपनियों में ऐसा नहीं होता है.

सरकार को ये समझना होगा कि देश की अर्थव्यवस्था अमरीका के मल्टी नेशनल से नहीं मज़बूत होगी. इस देश की अर्थव्यवस्था की जड़ इस देश का आम आदमी है.

इस सरकार को आम आदमी को पुलवामा परोसना है और अर्थव्यवस्था को बड़े आदमियों को हैंडओवर कर देना है. ऐसा करने से आप चुनाव तो जीत जाएंगे लेकिन अर्थव्यवस्था नहीं चलेगी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)