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अयोध्या मामले पर पुनर्विचार याचिका से मंदिर निर्माण धीमा पड़ जाएगा?
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करने के मुस्लिम पक्ष के निर्णय से क्या राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया धीमी पड़ जाएगी?
राम जन्मभूमि न्यास के प्रमुख नृत्य गोपाल दास के हवाले से कहा गया है कि 'राम मंदिर के निर्माण की तैयारी हमने पूरी कर ली है. याचिका दाख़िल करने का एआईएमपीलीबी का फ़ैसला राम मंदिर निर्माण में देरी करवाने का एक और बहाना है.'
उन्होंने कहा कि सुनवाई के दौरान भी उन्होंने कई बार रुकावटें पैदा करने की कोशिश की थी. अब जब फ़ैसला आ गया है तो वो फिर से मंदिर निर्माण में रोड़े अटकाने की कोशिश कर रहे हैं.
मुस्लिम पक्ष ने पहले सुप्रीम कोर्ट से सुनवाई आम चुनावों तक न करने की गुज़ारिश की थी.
विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने एक ट्वीट में कहा है, "वो ऐसा क्यों कर रहे हैं? वो क्रियान्वयन को रोककर हिंदुओं को चिढ़ाना चाहते हैं, मुसलमानों को जिहाद के लिए भड़काकर देश में मौजूद सौहार्द्र के माहौल को बिगाड़ना चाहते हैं."
रविवार को लखनऊ में हुई मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की कार्यकारिणी की बैठक में तय हुआ है कि मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट के नौ नवंबर के फ़ैसले में पुनर्विचार याचिका दाख़िल करेगा.
बोर्ड के सदस्य और बाबरी मस्जिद पक्ष के वकील ज़फ़रयाब जिलानी ने कहा मुस्लिम पक्ष संविधान के भीतर दिए गए सारे क़दम उठाएगा.
मुस्लिम पक्ष का कहना है कि हालांकि देश की सबसे ऊंची अदालत ये माना कि मस्जिद को गिराया जाना आपराधिक था, कोर्ट ने 1949 में मस्जिद में मूर्ति रखे जाने को ग़लत बताया, उसने ये भी कहा कि भक्ति के आधार पर ज़मीन का मालिकाना हक़ तय नहीं हो सकता लेकिन फिर भी कोर्ट ने ज़मीन हिंदुओं को सौंप दी.
बाबरी पक्ष मस्जिद के बदले दूसरी जगह ज़मीन दिए जाने पर भी सवाल उठा रहा है और हैदराबाद के मुस्लिम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने तो इसे 'बिन मांगा ख़ैरात' क़रार दिया है.
हालांकि मुस्लिम बिरादरी में बोर्ड के फ़ैसले और मस्जिद के बदले दूसरी जगह ज़मीन लेने या लेने को लेकर राय बँटी हुई है.
ग़लती
मुस्लिम स्कॉलर सैयद उबैदुर रहमान तो इस मामले में मुस्लिम पर्सनल बोर्ड के रवैए को 'तीन तलाक़ मामले वाली ग़लती' से तुलना करते हैं, 'इस मामले को जारी रखकर वो मुसलमानों का भला नहीं कर रहे हैं बल्कि अपनी रोटी सेंकने की जो कोशिश है, उसको जारी रखने का उनका ये तार्किक क़दम है, क्योंकि अगर बाबरी मस्जिद का मामला ख़त्म हो गया तो उनकी लीडरशिप भी ख़त्म हो जाएगी.'
उबैदुर रहमान का मानना है कि मुसलमानों को पहले ही जाने-माने मुस्लिम विद्दान वहीदुद्दीन ख़ान की बात मान लेनी चाहिए थी जिसमें उन्होंने अयोध्या, मथुरा और काशी की विवादित मस्जिदों को हिंदुओं के हवाले करने की बात कही थी जिससे हिंदू और मुसलमानों के बीच की बढ़ती दूरी बहुत हद तक कम हो जाती.
मुसलमानों के एक तबक़े का मानना है कि तब तो कम से कम मुस्लिम वोट बैंक का भरम क़ायम था, बीजेपी के मज़बूत होने के बाद मुसलमानों के हाथ से वो भी जाता रहा.
समाज के कई दूसरे लोग भी ऐसी बातें करते सुने जा सकते हैं, सोशल मीडिया में भी डाले जा रहे पोस्ट में अलग-अलग राय है.
वरिष्ठ पत्रकार और मुस्लिम मामलों पर पैनी नज़र रखनेवाले शम्सुर रहमान अलवी ने भी पांच एकड़ ज़मीन से मना करने को ग़लत बताया था.
उत्तर प्रदेश सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने फ़ैसला आने के दिन ही यानी नौ नवंबर को ही कह दिया था कि वो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को चैलेंज नहीं करेगा.
अब तक सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड जो सालों तक बाबरी मस्जिद के पैरोकारों में से एक रहा है और पर्सनल लॉ बोर्ड के साथ रहा था उसने भी पुनर्विचार याचिका वाले फ़ैसले से ख़ुद को अलग कर लिया है.
दबाव
मस्जिद के पैरोकारों में से एक और इक़बाल अंसारी के हवाले से भी कहा जा रहा था कि वो सुप्रीम कोर्ट में फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील किए जाने के पक्ष में नहीं हैं लेकिन बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि 'वो भी कमेटी के सदस्य हैं और मस्जिद उनकी निजी जायदाद तो है नहीं.'
इस बीच ये बात होती रही है कि बिरादरी में नेता बताए जानेवाले कई लोगों पर हुकूमत की तरफ़ से दबाव है. बात ये भी हुई कि कुछ लोग हमेशा की तरह क़ौम के नाम पर सरकार से क़रीब होने की कोशिश कर रहे हैं.
शम्सुर रहमान अलवी कहते हैं कि उलमाओं और नेताओं पर डील की बातें तो होती ही रही है. इनमें से बहुत से कई तरह के संस्थान चलाते हैं और सरकार से सीधे तौर पर बैर नहीं ले सकते हैं.
ये बातें तब और खुली तौर पर हुईं जब फ़ैसले के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने समुदाय के लोगों को बारी-बारी से बुलाकर भेट की.
समाज में बंटी राय को लेकर ज़फ़रयाब जिलानी कहते हैं कि जिन लोगों की अलग राय की बात कर रहे हैं उनकी बिरादरी में कोई पैठ नहीं है और वो 1986 से यही राय देते रहे हैं और मुसलमान अगर अपनी मस्जिद की हिफ़ाज़त नहीं कर सकता है तो फिर किस चीज़ की करेगा?
ज़फ़रयाब जिलानी का कहना था कि वो कुछ न करके एक उदाहरण क़ायम नहीं करना चाहते हैं.
असर
ख़ालिक़ अहमद ख़ान, मस्जिद के पैरोकारों में से एक हैं. उनका कहना है कि चंद लोगों के अपील न करने के फ़ैसले का कोई क़ानूनी असर नहीं होगा.
ख़ालिक़ अहमद ख़ान कहते हैं कि जो पैरोकार हैं वो न भी जाएं तो मुसलमानों में से कोई भी एक चला जाएगा तो अपील हो सकती है.
मशहूर वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि सबरीमाला और समलैंगिकता मामला इसका उदाहरण है जिसमें नए पक्षकारों को रिव्यू की अनुमति दे दी गई थी.
लेकिन वो जनहित याचिकाएं थीं, यहां मामला दीवानी का है यानी ये एक सिविल केस है, जिसमे नए लोगों को 70 साल बाद पक्षकार बनाने पर कोर्ट इनकार कर सकती है.
वो कहते हैं कि पुनर्विचार याचिका दाख़िल होने के बाद, इस की स्वीकार्यता पर जज चैम्बर में ही तय कर देते हैं लेकिन कई बार इनकी सुनवाई खुली अदालत में हुई है.
क्या अपील दाख़िल होने पर पुराने फ़ैसले पर रोक लग जाएगी, इसके जवाब में विराग गुप्ता का कहना है कि रिव्यू पेंडिंग रहने पर पुराने फैसले पर रोक नहीं लगती.
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