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भाजपा सिर्फ़ चुनाव के असल मुद्दों से ध्यान भटकाती है: शरद पवार
- Author, मयूरेश कोण्णूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
महाराष्ट्र चुनावों के मद्देनज़र राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के अध्यक्ष शरद पवार ने अनुच्छेद 370, राष्ट्रवाद और कांग्रेस के साथ संबंधों समेत कई मुद्दों पर अपनी बात रखी है.
बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि इस बार का चुनाव किसान आत्महत्या, बुनियादी ढांचे, औद्योगिक क्षेत्र का घाटा, बेरोज़गारी, शिक्षा की स्थिति जैसे ज़रूरी मुद्दों पर केंद्रित होगा.
उन्होंने इशारों इशारों में कहा कि कुश्ती के बारे में मुझे कोई न सिखाए क्योंकि मैं कुश्ती की संस्था का अध्यक्ष हूं.
पढ़िए उनकी पूरा इंटरव्यू-
क्या 370 पर सरकार का हालिया फ़ैसला आने वाले महाराष्ट्र चुनावों पर ख़ास असर डालेगा?
देखिये अभी स्थिति यह है कि 370 हट चुका है. 370 हटने के ख़िलाफ़ जम्मू-कश्मीर के कुछ लोगों की अलग भावना ज़रूर थी. लेकिन अधिकतर लोगों ने इसका कोई विरोध नहीं किया. कांग्रेस या अन्य लोगों ने सिर्फ़ यह बात कही थी कि कश्मीर के लोगों को विश्वास में लेकर इस क़दम को उठाइये.
370 तो अब हटाने का फ़ैसला ले लिया गया है इसका प्रभाव यह पड़ा है कि भारत के अन्य राज्यों के लोगों को वहां जो ज़मीन ख़रीदने की अनुमति नहीं थी वो मिल गयी है. लेकिन अगर आप महाराष्ट्र चुनाव की बात करें तो यहां किसानों की अलग समस्याएं हैं.
यहां सबसे बड़ी समस्या किसान आत्महत्या की है. यहां के औद्योगिक क्षेत्रों का भी हाल बुरा है. कई मज़दूरों की नौकरी जा रही है और बेरोज़गारी बढ़ रही है.
ऐसे में जो भी महाराष्ट्र में सरकार बनाएगा उसकी पहली ज़िम्मेदारी इन समस्याओं को हल करना है. 370 पर फ़ैसला आ चुका है. अब चुनाव इन मुद्दों पर होना चाहिए.
लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह अपनी सभाओं में आपको चुनौती दे रहें हैं कि आपको 370 पर अपनी भूमिका साफ़ करनी चाहिए?
मैं कहता हूं कि 370 हटाया अच्छी बात है लेकिन 371 भी हटाइये और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में जो प्रतिबंध है वो भी हटाने पर अब बात होनी चाहिए.
आपने नागपुर में एक सभा में कहा कि बालाकोट में जो एयर स्ट्राइक हुई थी उसमें सभी विपक्षी दलों ने इस बात का समर्थन किया था कि कार्रवाई होनी चाहिए तो क्या आपका ये कहना है कि जो क्रेडिट अकेले सरकार ले रही है असल में वो क्रेडिट विपक्षी पार्टी और आपका भी है?
नहीं हम क्रेडिट की बात नहीं मानते. लेकिन यह सच है कि विपक्षी पार्टियों को सरकार द्वारा उस समय सीमा पर हो रही गतिविधियों की ब्रीफिंग की गयी थी. उसके बाद बहस हो गयी जिसमें सभी पार्टियों ने एकमत होकर इस बात को कहा कि सेना जो भी क़दम उठाना चाहती है उठाए और सभी पार्टियां इस पर सरकार के साथ हैं.
हम देश की रक्षा के मुद्दे पर कोई राजनीति नहीं करना चाहते थे. इस पर सभी राजनितिक दल सरकार के निर्णय के साथ थे. इसका क्रेडिट सिर्फ़ हवाई दल को लेना चाहिए बाक़ी लोग अपनी छाती ठोकने लगे और 56 इंच की बात करने लगे. ये सब बिलकुल बचपना लगता है.
मुख्यमंत्री फडणवीस के साथ भी आपके बयानबाज़ी की चर्चा हो रही है, इसपर आप क्या कहेंगें?
उन्होंने कहा कि उनके पास पहलवान तैयार हैं लेकिन सामने कोई पहलवान नहीं है.
सच्चाई देखें तो महाराष्ट्र में जो कुश्ती की संस्था है उसका अध्यक्ष मैं हूं इसलिए मुझे कुश्ती के बारे में कोई न सिखाए. कुश्ती अपने बराबर के या आसपास के पहलवान से होती है.
तो आप उन्हें अपने आसपास का पहलवान नहीं मानते ?
मैं अब इस पर और कुछ नहीं कहूंगा. समझने वाले को इशारा काफ़ी होता है.
आप हर जगह प्रचार के लिए जा रहेहैं लेकिन यही चीज़ कांग्रेस के नेताओं में नहीं दिखती. राहुल गांधी भी कुछ ही जगह जा रहेहैं. क्या आप ऐसे में यह कहेंगे कि एनसीपी भरपूर लड़ रही है लेकिन कांग्रेस बहुत बिखरी-बिखरी है?
बिलकुल नहीं. कांग्रेस का कार्यकर्ता जगह-जगह लड़ रहा है. जहां हम लड़ रहें वहां कांग्रेस का साथी हमें सहयोग दे रहा है और वैसे ही हम उन्हें सहयोग दे रहें हैं. चुनाव प्रचार ऐसा ही होता है.
यह मेरा होम स्टेट है इसलिए मैं हर जगह जा रहा हूं. सोनिया गांधी और राहुल गांधी का नहीं हैं. उत्तर प्रदेश में चुनाव होते थे तो मैं हर जगह नहीं जाता था लेकिन वो लोग जाते थे.
मैं हरियाणा में प्रचार में बहुत ज़्यादा नहीं दिख रहा हूँ. यह सब हर पार्टी सभी नेताओं के लिए तय करती है.
राहुल गांधी के लिए अगर प्रचार का समय आख़िरी हफ्ता तय था तो वो उससे पहले अगर बैंगकॉक गए या कहीं और भी गए तो इस पर लोगों का ध्यान खींच कर भाजपा सिर्फ़ मुद्दों से ध्यान भटकाती है. ये चुनाव के लिए कोई असल मुद्दे नहीं हैं.
भाजपा के पास अब काम दिखाने के लिए नहीं है और लोग उससे नाराज़ हैं, इसीलिए वो कभी पुलवामा तो कभी राहुल गांधी जैसे मुद्दों पर ध्यान भटकाती रहती है.
क्या राष्ट्रवाद इस बार फिर चुनावी मुद्दा बनेगा ?
नहीं. महाराष्ट्र का चुनाव राष्ट्रवाद के मुद्दे पर नहीं बल्कि किसान आत्महत्या, बुनियादी ढांचे, औद्योगिक क्षेत्र का घाटा, बेरोज़गारी, शिक्षा की स्थिति जैसे ज़रूरी मुद्दों पर केंद्रित होगा. ये इस चुनाव के असल मुद्दें हैं. लेकिन मौजूदा सरकार के पास इस पर दिखाने के लिए कुछ भी नहीं है इसलिए इस तरह के मुद्दे उठा रही है जिससे लोगों का ध्यान भटके.
सोशल मीडिया पर इस बात पर बहुत चर्चा है कि 80 साल की उम्र में आपको सारी क़मान ख़ुद के हाथों में लेनी पड़ी.
नहीं ऐसा नहीं हैं. हमारी पार्टी में भी दूसरी पीढ़ी और तीसरी पीढ़ी को कई ज़रूरी ज़िम्मेदारियां दी गई हैं. मेरा नाम ज़्यादा आता है क्योंकि मैं अध्यक्ष हूं.
सबकी ज़िम्मेदारियां निर्धारित हैं. सब कायर्कर्ता काम में लगें हैं और इसका नतीजा चुनाव में देखने को मिलेगा.
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