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शरद पवार बाघ की तरह जाग तो गए, लेकिन क्या अब देर हो गई है?
- Author, नामदेव अंजना
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
एनसीपी के कई नेता विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी छोड़कर जा चुके हैं और अब शरद पवार को पूरे राज्य का दौरा करना पड़ रहा है. इसमें उन्हें युवाओं का समर्थन तो मिल रहा है लेकिन क्या अब बहुत देर हो चुकी है?
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) प्रमुख शरद पवार विधानसभा चुनाव से पहले पूरे राज्य का दौरा कर रहे हैं. इन दिनों उनकी पार्टी का अच्छा समय नहीं चल रहा है. पार्टी के कई बड़े नेताओं ने उसका साथ छोड़ दिया है. कुछ पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, कुछ की जाँच चल रही है और कुछ नेताओं पर नए केस दर्ज किए जा रहे हैं.
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भी महाराष्ट्र सहकारी बैंक घोटाला मामले में ख़ुद शरद पवार, उनके भतीजे और पूर्व उप-मुख्यमंत्री अजीत पवार के ख़िलाफ़ आपराधिक मामला दर्ज किया है.
बहुत से नेताओं ने शरद पवार का साथ छोड़ दिया. 80 साल की उम्र में उन्हें अब एक बार फिर पार्टी संभालने की सारी ज़िम्मेदारी उठानी पड़ रही है. इससे पहले भी दो बार ऐसा हुआ था उस वक़्त उन्होंने पूरे राज्य का दौरा करके कामयाबी पा ली थी लेकिन क्या इस बार भी ऐसा होगा? हमने इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश की है.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता उल्हास पवार ने बीबीसी मराठी से बातचीत में कहा, "जैसे एक शेर पूरी तैयारी के साथ दहाड़ता है वैसे ही अब शरद पवार भी बिना आत्मविश्वास खोए जग चुके हैं."
पिछले कुछ दिनों में एनसीपी के कुछ नेता बीजेपी में शामिल हुए जिसके बाद शरद पवार ने मराठवाड़ा और पश्चिमी महाराष्ट्र का दौरा किया. इन दौरों में उन्हें युवाओं का अच्छा समर्थन मिला.
शरद पवार ने ख़ुद अपनी उम्र के बारे में सतारा की जनसभा में खुलकर बात की. उन्होंने कहा, "कुछ लोग मुझे बूढ़ा कहते हैं पर ज़रूरत पड़े तो मैं 16 नहीं, 18 घंटे तक काम कर सकता हूं लेकिन मैं महाराष्ट्र को किसी ग़लत हाथ में नहीं जाने दूंगा."
वरिष्ठ पत्रकार प्रताप आसबे कहते हैं, "शरद पवार को लगता है कि उन्हें अपनी विचारधारा क़ायम रखनी चाहिए. वो कट्टरवादी विचारधारा के विरोध में हैं. इसके अलावा वो राजनीति में कई नई पीढ़ियों को लेकर आए हैं. नए लोगों को लाने के पीछे भी उनकी यही कोशिश दिखाई देती है.''
फिर भी शरद पवार की उम्र की वजह से जो सीमाएं रास्ते में आ रही हैं उनकी चर्चा भी राज्य में लगातार हो रही है.
'लेकिन पवार को देर हो गई है..'
वरिष्ठ पत्रकार भरत कुमार राऊत कहते हैं, "राष्ट्रवादी कांग्रेस अभी मुश्किल में है. एक तरफ़ लोग पार्टी छोड़कर जा रहे हैं और दूसरी तरफ़ जो हैं, उन पर अलग-अलग आरोप लग रहे हैं. इस स्थिति में पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए शरद पवार को आगे आना ज़रूरी था."
राऊत कहते हैं, "शरद पवार शुरू से ही आंदोलन करने वालों के नेता रहे हैं. वो सिर्फ़ पार्टी ऑफ़िस में बैठकर काम करने वाले नहीं बल्कि सड़क पर कार्यकर्ताओं के बीच उतरकर काम करने वाले नेता हैं. वो गांवों में जगह-जगह जाकर काम कर रहे हैं और उसका परिणाम निश्चित तौर पर पार्टी के पक्ष में होगा."
भारत कुमार राऊत कहते हैं, "लोकसभा चुनाव के बाद एनसीपी में आपातकाल जैसी परिस्थिति बन गई. लोकसभा चुनाव में हार के बाद से नेता पार्टी छोड़कर जाने लगे. यही वजह है कि शरद पवार को बाहर निकलने की ज़रूरत पड़ी. हालात की वजह से उन्हें देर तो हो गई है और पानी सिर से ऊपर जाने लगा है. यही कारण है कि पवार जैसे बड़े नेता को मैदान में उतरना पड़ा है."
वरिष्ठ पत्रकार रवींद्र आंबेकर कहते हैं, "शरद पवार ने चुनाव प्रचार की सारी ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली है. इस उम्र में हथियार रखने की जगह उन्होंने संघर्ष करने का निर्णय लिया है लेकिन इसके लिए भी देर हो चुकी है, यह तय है."
भरत कुमार राऊत का मानना है, "वो हालात सुधारने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन अगर चुनाव जीतना ही कामयाबी है तो ये कामयाबी उन्हें मिलेगी, ऐसा नहीं लगता. हां, अगर नुक़सान कम करने को कामयाबी माना जाए तो ये कामयाबी पवार को ज़रूर मिलेगी."
'इसलिए नेताओं ने एनसीपी छोड़ी..'
पार्टी के नेता पवार का साथ क्यों छोड़ते हैं? इसके जवाब में भारत कुमार राऊत ने कहा, "पवार ने हमेशा सत्ता पाने के लिए राजनीति की है और सत्ता के लोभी, सत्ता मिले बग़ैर रह नहीं सकते. इसीलिए सत्ता जाने के बाद कई नेताओं ने एनसीपी छोड़ दी. 1980 में भी पवार की समाजवादी कांग्रेस ने 54 विधायकों को जिताया लेकिन धीरे-धीरे वो पार्टी छोड़कर चले गए. उसके बाद सिर्फ़ छह-सात विधायक उनके साथ रहे. सत्ता की राजनीति का ऐसा नतीजा होना स्वाभाविक है.".
राऊत कहते हैं, "भाजपा, समाजवादी पार्टी और शेतकरी कामगार पार्टी जैसी पार्टियों ने विरोध की राजनीति अपनाई. इसी वजह से उन्हें विपक्ष में बैठने की आदत रही है लेकिन शरद पवार की पार्टी के नेताओं को सत्ता में बैठने की आदत थी न कि विपक्ष में बैठने की."
रवींद्र आंबेकर कहते हैं, "80 साल की उम्र में चुनाव प्रचार की ज़िम्मेदारी अपने सिर पर लेना असल में शरद पवार की हार है. पवार ने जब एनसीपी बनाई तब उन्हें राज्य के कई युवा नेताओं का समर्थन मिला था. उन्होंने कई युवा नेताओं का मार्गदर्शन किया. बाद में इन्हीं युवा नेताओं ने पार्टी पर क़ब्ज़ा कर लिया और सत्ता के सभी फ़ायदे उठाए."
आंबेकर कहते हैं, "इतना ही नहीं भ्रष्टाचार करने के मामले में भी एनसीपी के नेता आगे रहे. अगर इन पर उसी समय कार्रवाई होती तो अगली दूसरी या तीसरी पीढ़ी के नेताओं की ऐसी हिम्मत नहीं होती. और फिर आज इतने नेता पार्टी से बाहर नहीं जाते और न ही आज शरद पवार को इतनी एड़ियां घिसनी पड़तीं."
'मंत्री बने लेकिन पार्टी से दूर नहीं हुए'
वरिष्ठ पत्रकार प्रताब आसबे कहते हैं, "विपक्ष में जाने के बाद शरद ज़्यादा आक्रामक हो जाते हैं, ऐसा इतिहास बताता है. विपक्ष में जाकर वो हमेशा लोगों के संपर्क में रहते हैं. छोटे से छोटे गांव में घूमते हैं. उनका जनसंर्पक विशाल है. आजकल वो ज़्यादा दौरे करने लगे हैं लेकिन एक सच ये भी है कि वो दौरे करते ही हैं, भले ही सत्ता में रहें या न रहें."
कांग्रेस नेता उल्हास पवार के मुताबिक़, "60 के दशक में यशवंतराव चव्हाण बहुत लोकप्रिय हुआ करते थे. उनके सियासी वारिस माने जाने वाले शरद पवार को राजनीति करने का उत्साह यशवंतराव से ही मिला था. इसके बाद उन्होंने पार्टी को समझा और वर्कशॉप आयोजित किए. महाराष्ट्र में जाकर युवाओं को पार्टी से जोड़ा. पार्टी की नीति को समझकर उन्होंने पार्टी को बढ़ाया. युवा कांग्रेस और प्रदेश कांग्रेस दोनों को मज़बूत करने का उन्हें अच्छा-ख़ासा अनुभव है."
पवार को हाल में जो समर्थन मिल रहा है उसके बारे में उल्हास पवार कहते हैं, "मंत्री होने के बाद भी पवार अपनी पार्टी से दूर नहीं हुए हैं. यही वजह है कि लोग भी उनसे दूर नहीं हुए हैं."
महाराष्ट्र के वरिष्ठ सहायक संपादक विजय चोरमारे का मानना है कि शरद पवार ने पार्टी बढ़ाने के साथ-साथ 'स्पोर्ट्समैन स्पिरिट' का प्रदर्शन भी किया है.
चोरमारे कहते हैं, "आने वाले चुनाव बहुत मुश्किल हैं और ये पवार भी जानते हैं. लेकिन पूरी उम्र राजनीति करने वाले पवार को सिर्फ़ चुनाव में हिस्सा लेना भर ही मंज़ूर नहीं है.''
क्या पवार नयी पीढ़ी के हीरो बन रहें हैं?
उल्लास पवार कहते हैं, "जेनरेशन गैप की वजह से कुछ लोगों के बीच अंतर बढ़ जाता है लेकिन शरद पवार को यह दिक्क़त कभी भी महसूस नहीं हुई. इसका कारण यह है कि सत्ता और विपक्ष दोनों में रहकर काम करते समय उन्हें हमेशा ही नए युवाओं से मिलकर उनकी आशाओं और आकांशाओं को जानना ज़रूरी लगता था, नयी पीढ़ी को क्या चाहिए यह जानने की ताक़त पवार में हैं."
"जेनरेशन गैप न रखते हुए लगभग अस्सी की उम्र के पवार जिस तरह से घूम रहें हैं, जोश भरी बातें कर रहे हैं यह निश्चित तौर पर एक आकर्षित करने वाली बात है."
विजय चोरमारे कहते हैं, "कुछ महीनों पहले तक ऐसी छवि थी कि शरद पवार का नई पीढ़ी के साथ कोई जुड़ाव नहीं है. लेकिन सोलापुर में हुई सभा और मराठवाड़ा में जमा भीड़ देखकर लगता है कि पवार एक बार फिर नई पीढ़ी के हीरो बन रहे हैं. सत्ताधारी पार्टी के ख़िलाफ़ जो असंतोष है उसे संगठित कर पाने में पवार सफल हो रहे हैं.
पवार के प्रति युवाओं के आकर्षित होने का कारण बताते हुए उल्लास पवार कहते हैं, "व्यक्ति जब सरेआम कहता है कि मुझे कोई भी पद नहीं चाहिए उस वक्त लोग उन पर विश्वास रखते हैं. उन्होंने सभी महत्वपूर्ण पदों पर काम करने का अनुभव ले लिया है और इन सब के बाद अब बचा क्या ही है. उन्हें भी यह समझ में आता है अब और कुछ मिल गया तो वो बोनस ही होगा लेकिन जिन्होंने धोखा किया उन्हें सीख मिलनी ज़रूरी है. यह बात शरद अच्छे से जानते हैं."
उल्लास पवार कहते हैं, "मैं कांग्रेस पार्टी का होकर भी कहता हूं कि महाराष्ट्र में कांग्रेस के लिए कोई नेतृत्व नहीं है लेकिन एनसीपी की दूसरी पीढ़ी भी बिल्कुल प्रभावशाली नहीं है. इस सारी परिस्थितियों में शरद पवार बहुत ही ऊपर स्थान पर हैं. आक्रामक भाषा के साथ सौजन्यता, सभ्यता और प्रबलता ये सभी गुण पवार में दिखाई देते हैं. "
विपक्ष नेता के तौर पर काम करते हुए शरद पवार के काम के दो हिस्सों का विशेष उदाहरण महाराष्ट्र के राजनीतिक इतिहास में दिया जाता है. पहला हिस्सा है, 1980 में पुलोद की सरकार बर्खास्त होने के बाद लगातार पाँच साल शरद पवार का विपक्ष में होना और दूसरा 1999 में कांग्रेस से बाहर निकलने के बाद एनसीपी की स्थापना.
एक समय में पवार के पास था युवाओं का समर्थन
आपातकाल के बाद 1980 में केंद्र में इंदिरा गांधी की सरकार सत्ता में आयी जिन्होंने महाराष्ट्र में शरद पवार के नेतृत्व में चलने वाली पुलोद सरकार बर्खास्त कर दी. इसी पुलोद सरकार से शरद पवार 38 की उम्र में पहली बार मुख्यमंत्री बने थे.
1980 की विधानसभा चुनाव में शरद पवार की समाजवादी कांग्रेस से महाराष्ट्र में केवल 54 विधायक चुनकर पहुंचे थे. वहीं इंदिरा कांग्रेस के 187 विधायक जीते थे. नतीजन पवार की समाजवादी कांग्रेस विधानसभा में विपक्ष की भूमिका में आ गयी. 1967 में पहली बार विधायक बनने के बाद भी पवार विपक्ष की भूमिका में थे.
'लोक माझे सांगाती' (लोग मुझे बताते हैं) नाम की आत्मकथा लिखते हुए पवार ने इस बात का ज़िक्र किया है.
उस वक़्त के अनुभव बताते हुए पवार कहते हैं, "जब मेरे विधायकों ने पार्टी छोड़ी तब मैं लंदन में था. वहां से वापस आने के बाद मेरे हवाई अड्डे पर स्वागत के लिए बड़ी संख्या में युवा मौजूद थे. उसी वक़्त मुझे एहसास हुआ कि युवाओं को मुझ पर भरोसा है. विधायकों के पार्टी छोड़ने के बाद जो निराशा पैदा हुई थी उसे युवाओं से मिले समर्थन ने भर दिया और मुझे नई उम्मीद मिली. मैंने फिर से नई शुरुआत करने का फ़ैसला उसी दिन किया और दूसरे दिन से काम पर लग गया."
पवार के नेतृत्व में 1980 में हुई किसान रैली
आज जिस प्रकार शरद पवार पूरे राज्य में दौरे कर रहे हैं और उन पर चर्चा हो रही है ऐसे ही दौरे वह 1980-81 में किया करते थे.
इस पर शरद पवार ने लिखा है, "मैनें हफ्ते में पांच दिन राज्य में दौरे करना तय किया था. उस समय मैंने समाज के अलग-अलग लोगों से अनाधिकारिक बातें करने पर विशेष रूप से ध्यान दिया."
शरद पवार के नेतृत्व में 7 दिसंबर 1980 में जलगांव से नागपुर की ओर निकली किसान रैली की ख़ूब सराहना हुई थी. इस बारे में पवार ने लिखा है, "विपक्ष में रहने की वजह से मुझे काफ़ी समय मिला और मैं किसानों के मुद्दों को ढंग से समझ पाया."
1980 में बैरिस्टर अंतुले, 1982 में बाबासाहेब भोसले, उसके बाद वसंतदादा पाटील और फिर निलंगेकर, इस तरह से 1985 तक इन सभी लोगों ने मुख्यमंत्री का पद संभाला और इन सभी सालों में पवार विपक्ष में नेता रहे थे.
1980 से 1985 तक पवार ने विपक्ष के नेता के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसके बाद 1986 में शरद पवार राजीव गांधी के नेतृत्व में फिर से कांग्रेस में शामिल हुए. उस वक्त अपनी समाजवादी कांग्रेस उन्होंने कांग्रेस में मिला दी.
उल्लास पवार कहते हैं, "1980 से 85 के बीच में पवार विपक्ष के नेता के तौर पर जन आंदोलन रैलियां करते रहे थे. इस दौरान पवार ने जन आंदोलन रैलियों में सामजिक आंदोलनों को जोड़ा. 1978 में बाबा अढ़ाव के, एक गांव एक पानवठा आंदोलन का भी उन्होंने समर्थन किया."
एक दशक बाद, 1999 में एक बार फिर शरद पवार को महाराष्ट्र की जनता ने सड़कों पर आंदोलन करते देखा.
1999 में पवार को युवाओं का समर्थन नहीं मिला
एनसीपी की स्थापना होने के बाद कुछ ही महीनों के अंदर लोकसभा और विधानसभा चुनाव हुए थे. पवार की नयी पार्टी को प्रचार के लिए बहुत कम समय मिला और सामने शिवसेना-भाजपा गठबंधन और कांग्रेस जैसी पार्टियां भी थीं.
1999 में एनसीपी ने महराष्ट्र की कुल 288 विधानसभा सीटों में से 217 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें से 57 सीटें जीती भी थीं.
वरिष्ठ पत्रकार प्रताप आसबे कहते हैं कि 1999 में शरद पवार के साथ अन्य लोग थे पर युवा नहीं थे. इस बार उन्हें युवाओं का समर्थन ज़्यादा मिल रहा है.
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