महाराष्ट्र चुनावः शरद पवार की मांद में कैसे घुसी बीजेपी

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- Author, अभिजीत कांबले
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
पश्चिम महाराष्ट्र और विदर्भ के बाद सबसे ज़्यादा सीटें मराठवाड़ा के इलाक़े में है. यहां के आठ ज़िलों में विधानसभा की 46 सीटें हैं और यही वजह है कि विधानसभा चुनाव में इस इलाक़े की राजनीतिक अहमियत बढ़ गई है.
साल 2014 से मराठवाड़ा पर शिवसेना और बीजेपी ने अपनी पकड़ मजबूत की है. पिछले चुनाव में शिव सेना और बीजेपी ने अलग-अलग लड़कर भी इस मराठवाड़ा की 46 में से 26 सीटें जीत ली थीं.
केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार फिर से चुनकर आई है. इसी वजह से गठबंधन का आत्मविश्वास बढ़ा हुआ है. वहीं हार के बाद कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के गठबंधन के लिए अपनी ताक़त आज़माने का ये मौक़ा है.
एनसीपी के बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ने के बाद मराठवाड़ा की राजनीतिक तस्वीर बदल गई है. उस्मानाबाद ज़िले के दिग्गज़ नेता और शरद पवार के लंबे समय से सहयोगी रहे पद्मसिंह पाटिल और उनके बेटे राणा जगजीत सिंह पाटिल ने एनसीपी छोड़ दी है.
राणा जगजीत सिंह को तुलजापुर विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी ने टिकट दिया है.
एनसीपी के बड़े नेता जयदत्त क्षीरसागर ने शिव सेना का हाथ थाम लिया है. इसी वजह से मराठवाड़ा में एनसीपी की अड़चनें बढ़ सकती हैं.

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मराठवाड़ा ने पवार का दिया था साथ
आज़ादी के समय मराठवाड़ा हैदराबाद रियासत का हिस्सा हुआ करता था. यहां की राजनीति पश्चिम महाराष्ट्र और विदर्भ से अलग रही है. यहां के मुद्दे और यहां के समीकरण भी राज्य के बाक़ी हिस्सों से अलग हैं.
मराठवाड़ा मुक्ति संग्राम के समय कांग्रेस के योगदान की वजह से यहां की राजनीति पर कांग्रेस की पकड़ हुआ करती थी.
सत्तर और अस्सी के दशक में पूर्व मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण, भूतपूर्व सांसद केशरकाकू क्षीरसागर और अंकुशराव टोपे, पूर्व मुख्यमंत्री शिवाजीराव पाटिल निलंगेकर मराठवाड़ा के महत्वपूर्ण नेता हुआ करते थे.
शरद पवार को मानने वाला एक बड़ा वर्ग मराठवाड़ा में हुआ करता था. शरद पवार ने 1978 में कांग्रेस छोड़कर समाजवादी कांग्रेस नाम से एक पार्टी बनाई थी जिसे मराठवाड़ा के इलाक़े में अच्छा समर्थन मिला था. उसी दौर में शिव सेना अस्तित्व में आई थी.

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साल 1986 में जब शरद पवार ने राजीव गांधी की उपस्थिति में अपनी समाजवादी कांग्रेस का कांग्रेस में विलय कर दिया था. इसके बाद से ही मराठवाड़ा में शिवसेना की ज़मीन मजबूत होने लगी थी.
साल 1990 के बाद शिव सेना का तेज़ी से जनाधार बढ़ा था. 1999 में शरद पवार ने कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नाम से एक बार फिर नई राजनीतिक पार्टी बनाई. उस समय भी मराठवाड़ा ने पवार का साथ दिया था.
बीड़, परभनी, जालना, उस्मानाबाद, इन ज़िलों में एनसीपी को समर्थन मिलता रहा है.
कांग्रेस की तरफ़ से नांदेड़ में अशोक चव्हाण, लातूर में विलासराव देशमुख ने अपनी पकड़ जमाकर रखी थी.
साल 2014 में कांग्रेस और एनसीपी के वर्चस्व को बड़ा धक्का लगा और शिवसेना-बीजेपी ने अपना जनाधार स्थापित कर लिया.
हालिया लोकसभा चुनावों में मराठवाड़ा में कांग्रेस की बची हुई दो सीटें भी शिवसेना-बीजेपी गठबंधन ने छीन लीं.
दूसरी तरफ़, एमआईएम ने औरंगाबाद लोकसभा सीट जीतकर अपनी ताक़त दिखा दी है.
इसी के चलते विधानसभा के चुनाव कांग्रेस और एनसीपी के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं.

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मराठवाड़ा के रोचक मुक़ाबले
मराठवाड़ा में सबसे रोचक लड़ाई बीड़ ज़िले में हैं. परली विधानसभा क्षेत्र में भी दिलचस्प मुक़ाबला होने जा रहा है.
परली विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी की पंकजा मुंडे और एनसीपी के धनंजय मुंडे (गोपीनाथ मुंडे के भतीजे), इन भाई-बहनों में मुक़ाबला है.
महाराष्ट्र विधानसभा के परिसीमन के बाद से परली सीट पंकजा मुंडे लगातार जीतती आ रही हैं.
हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में बीड़ लोकसभा क्षेत्र से पंकजा मुंडे अपनी बहन प्रीतम मुंडे को जीत दिलाने में कामयाब रही थी.
हालांकि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि धनंजय मुंडे परली के मुक़ाबले से बाहर हैं क्योंकि इस इलाके में वो भी ठीक-ठाक दखल रखते हैं. इसलिए परली पर राजनीतिक पंडितों की नज़र है.
एक ओर जहां परली में भाई-बहन के बीच टक्कर है तो बीड़ में चाचा-भतीजे के बीच कड़ा मुक़ाबला है.

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बीड़ विधानसभा क्षेत्र में शरद पवार का साथ निभाने वाले जयदत्त क्षीरसागर ने एनसीपी का साथ छोड़ दिया है. उनके सामने उनका भतीजा संदीप एनसीपी की तरफ़ से खड़ा है.
इसी वजह से शिव सैनिक क्षीरसागर का साथ देंगे या नहीं? ये सवाल इन दिनों बीड़ पर नज़र रखने वाले पर्यवेक्षक यही सवाल पूछ रहे हैं.
जयदत्त क्षीरसागर साल 2009 और साल 2014 में विधानसभा चुनाव में चुनकर आए थे.
साल 2016 के निकाय चुनावों में संदीप क्षीरसागर के गुट ने जयदत्त क्षीरसागर के गुट को शिकस्त दी थी.
पद्मसिंह पाटिल के पुत्र राणा जगजीत सिंह पाटिल को बीजेपी ने तुलजापुर क्षेत्र से टिकट दिया है.
उनका सामना कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मधुकर राव चव्हाण से होगा. इसलिए तुलजापुर की लड़ाई भी अहम मानी जा रही है.
मधुकर चव्हाण 1999 से चार बार यहां से चुने जा चुके हैं. साल 1984 में मधुकर चव्हाण ने उस्मानाबाद क्षेत्र से पद्मसिंह पाटिल के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा था जिसमें वे हार गए थे.

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विलासराव देशमुख के गढ़ लातूर का क्या होगा?
विलासराव देशमुख के दौर में लातूर में कांग्रेस का वर्चस्व हुआ करता था पर साल 2014 और 2019 के चुनाव में बीजेपी ने यहां से कांग्रेस को बेदख़ल कर दिया. यही नहीं बल्कि स्थानीय निकायों में भी यहां बीजेपी ही वर्चस्व में है.
इसलिए कांग्रेस की ताक़त लातूर ग्रामीण, लातूर सिटी और औसा विधानसभा सीट में सिमटकर रह गई है.
लोकसभा चुनाव में लातूर सिटी, लातूर ग्रामीण, औसा, निलंगा, उदगीर और अहमदपुर, इन विधानसभा क्षेत्रों से बीजेपी को बढ़त मिली थी.
इसीलिए कांग्रेस के सामने अपने प्रभाव वाली इन तीन सीटों पर अच्छा प्रदर्शन दोहराने की है.
अमित देशमुख लातूर सिटी से चुनाव लड़ रहे हैं और लातूर ग्रामीण से विलासराव देशमुख के दूसरे बेटे धीरज चुनाव लड़ रहे हैं.

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अशोक चव्हाण के लिए अस्तित्व की लड़ाई
लोकसभा चुनाव में नांदेड़ सीट से अशोक चव्हाण की हार हो गई थी. इसीलिए विधानसभा चुनाव उनके लिए अस्तित्व की लड़ाई बन गया है.
अशोक चव्हाण भोकर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. चव्हाण की लड़ाई एनसीपी से बीजेपी में आए बापू साहेब गोरठेकर से है.
नांदेड़ की हार के बाद चव्हाण के लिए ये चुनाव अपने वर्चस्व को बनाए रखने का एक और मौका है.

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एमआईएम फ़ैक्टर
साल 2014 के विधानसभा चुनाव में मध्य औरंगाबाद की सीट जीतकर ओवैसी की पार्टी एमआईएम ने अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज करा दी थी.
उसके बाद लोकसभा चुनाव में औरंगाबाद की सीट एमआईएम ने जीतकर अपना वर्चस्व एक बार फिर से साबित कर दिया.
लोकसभा चुनाव में एमआईएम वंचित बहुजन आघाडी के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी.
मराठवाड़ा में मुस्लिम दलित मतदाताओं की संख्या बड़ी तादाद में है. ये दोनों समुदाय पहले कांग्रेस-एनसीपी को समर्थन देते आए थे.
लोकसभा चुनाव में उनको एमआईएम और वंचित बहुजन आघाड़ी का विकल्प मिला और उन्होंने इसे मौका भी दिया.
एमआईएम और वंचित बहुजन आघाड़ी के साझा उम्मीदवारों ने मराठवाड़ा की कई सीटों पर कांग्रेस-एनसीपी उम्मीदवार को नुक़सान पहुंचाया.
एमआईएम और वंचित बहुजन आघाड़ी इस बार एक दूसरे से अलग होकर चुनाव लड़ रहे हैं.
इसलिए इस बार उनका कितना असर पड़ने वाला है. ये पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता.

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मराठवाड़ा के राजनीतिक समीकरण
राज्य की राजनीति में जातीय समीकरण अहम होते जा रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर विवेक घोटाले कहते हैं, "विदर्भ और कोंकण की तुलना में पश्चिम महाराष्ट्र और मराठवाड़ा में मराठा समाज की आबादी ज़्यादा है."
जानकारों की राय के अनुसार मराठवाड़ा में मराठा समाज की आबादी 40 फ़ीसदी है. उनके बाद वंजारी, धनगर, बंजारा जैसी पिछड़ी जातियां संख्या के लिहाज से अहम हैं.
प्रोफ़ेसर विवेक घोटाले कहते हैं, "मराठा समाज पहले कांग्रेस के साथ हुआ करता था. साल 1990 के बाद ये समाज शिव सेना की तरफ़ झुकने लगा. हाल के दिनों में मराठा समाज का झुकाव बीजेपी की तरफ़ महसूस किया जा सकता है. बीड़ ज़िले में वंजारा समाज बड़े पैमाने पर है. लातूर, नांदेड़, परभनी और हिंगोली ज़िलों मराठा समाज की आबादी कम है."
वे कहते हैं, "ये समाज पहले कांग्रेस के साथ था लेकिन गोपीनाथ मुंडे की वजह से ये बीजेपी की तरफ़ आ गया. धनगर समाज की आबादी लातूर और नांदेड़ में अच्छी-खासी है. परभनी और हिंगोली ज़िले में बंजारा समाज का झुकाव भी हाल के सालों में शिवसेना-बीजेपी गठबंधन की तरफ़ देखा गया है."
घोटाले कहते हैं, "लातूर में लिंगायत समाज की आबादी भी ठीक-ठाक है. ये लोग 1999 तक कांग्रेस के समर्थन में थे. पर अब इन लोगों का झुकाव भी सरकार की तरफ़ है."

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मराठवाड़ा के मुद्दे
महाराष्ट्र में मराठवाड़ा सबसे ज़्यादा सूखा प्रभावित इलाका माना जाता है. इसी के चलते यहां बेरोज़गारी है. मराठवाड़ा का औद्योगिकरण केवल औरंगाबाद तक सीमित है.
यहां बुनियादी ढांचे का अभाव है और पश्चिमी महाराष्ट्र की तुलना में ये काफी पिछड़ा हुआ है.
अब ये मुद्दे महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कितने असरदार होंगे, इसका फ़ैसला विधानसभा चुनाव के नतीजे ही करेंगे.
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