महाराष्ट्र चुनाव: क्या बीजेपी-शिवसेना दोहरा पाएंगी 2014 का इतिहास?

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- Author, मयूरेश कोन्नूर
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के लिए तारीख़ों का एलान हो चुका है. 288 सीटों वाले महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में मत 21 अक्तूबर को डाले जाएंगे, जबकि मतों की गिनती 24 अक्तूबर को होगी.
लेकिन सवाल यह है कि क्या कांग्रेस और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जैसे विपक्षी दल बीजेपी और शिवसेना को चुनौती देंगे या फिर पांच महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव परिणामों की तरह ही महाराष्ट्र विधानसभा के भी नतीजे देखने को मिलेंगे.
क्या बीजेपी और शिवसेना अपना प्रदर्शन दोहरा पाएंगी या सालों से महाराष्ट्र की सत्ता में रही कांग्रेस-एनसीपी इस बार चूकेंगी नहीं.
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2014 के चुनावों में महाराष्ट्र में क्या हुआ था?
साल 2014 में दिल्ली में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली 'एनडीए' की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद वही प्रभाव छह महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिला था. महाराष्ट्र में बीजेपी के नेतृत्व में सरकार बनी और देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बने.
हालांकि बीजेपी को अपने दम पर पूर्ण बहुमत तो नहीं मिला लेकिन उसने शिवसेना के साथ गठबंधन करके सरकार तो बना ही ली. वैसे चुनावों से पहले ही सीटों के बंटवारे को चलते 25 साल पुराना शिवसेना-बीजेपी का गठबंधन टूट चुका था.
दोनों पार्टियों ने स्वतंत्र तौर पर चुनाव लड़ा था. लेकिन चुनाव के बाद तीन महीनों में ही शिवसेना ने, जिसके 63 विधायक चुन कर आए थे बीजेपी से समझौता कर लिया और वह सरकार में शामिल हो गई. इससे पहले सिर्फ़ 1995 में शिवसेना-बीजेपी की सरकार महाराष्ट्र में बन सकी थी, जो राज्य की पहली ग़ैर-कांग्रेसी सरकार थी.
इससे पहले महाराष्ट्र में साल 1999 से 2014 तक, यानी 15 साल तक कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की ही सरकार रही. लेकिन 2014 में बीजेपी के मुकाबले वो पीछे रह गईं.

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बीते पांच सालों में क्या हुआ?
शिवसेना-बीजेपी के गठबंधन से महाराष्ट्र में सरकार तो बनी लेकिन ये दोनों दल हमेशा आपसी झगड़ों की वजह से सुर्खियों में रहे. शिवसेना सत्ता में शामिल रही मगर बीजेपी की राजनैतिक और आर्थिक नीतियों के ख़िलाफ़ हमेशा आक्रामक रही, जितना शायद विपक्षी दल भी नहीं हैं. चाहे वह नोटबंदी का फ़ैसला हो या फिर मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन लाने का निर्णय या फिर मुंबई मेट्रो के आरे कारशेड का विरोध, शिवसेना कई बार बीजेपी के विरोध में दिखाई दी.
पिछले पांच सालों में राज्य में हुए लगभग सभी चुनावों में बीजेपी और शिवसेना ने जीत हासिल की. पंचायत के चुनाव हों, या फिर नगरपालिका और महानगरपालिका के चुनाव, शिवसेना-बीजेपी ने स्वतंत्र तौर पर चुनाव लड़े. लेकिन विपक्षी दलों को मौका नहीं मिला.
मुंबई महानगपालिका में दोनों का कड़ा मुक़ाबला हुआ. ऐसा लगा कि सालों से सत्ता में रही शिवसेना की मुंबई की सत्ता चली जाएगी. मगर शिवसेना के 2 पार्षद ज़्यादा चुन कर आ गए और मुंबई उन्हीं के हाथों में रह गयी. हालांकि, इन झगड़ों के बावजूद शिवसेना सरकार में बनी रही.
सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे और उससे राजनीतिक उथल-पुथल भी मची. सरकार में नंबर दो रहे और राज्य में बीजेपी के वरिष्ठ नेता एकनाथ खडसे को ज़मीन घोटाले के आरोपों के बाद इस्तीफ़ा देना पड़ा. पंकजा मुंडे, विनोद तावडे़ जैसे मंत्रियों पर भी विपक्षी दलों ने आरोप लगाए, मगर उनकी कुर्सी बनी रही.

मराठा आरक्षण आंदोलन, किसान आंदोलन और भीमा कोरेगांव
महाराष्ट्र की बीजेपी-शिवसेना सरकार की असली परीक्षा तब हुई जब इन पांच सालों में मराठा आरक्षण के मुद्दे को लेकर जनआंदोलन हुए. महाराष्ट्र की आबादी में मराठाओं की संख्या सबसे अधिक है. मराठा लंबे समय से ओबीसी आरक्षण की मांग कर रहे हैं. लाखों लोग सड़कों पर उतरे, कुछ जगह हिंसा भी भड़की और आत्महत्या भी हुई.
आखिरकार सरकार को आरक्षण की मांग मंजूर करनी पड़ी. सरकार ने मराठाओं को आर्थिक और शैक्षणिक स्तर पर पिछड़ा घोषित करते हुए 18 फ़ीसदी आरक्षण दिया. उच्च न्यायालय ने भी यह आरक्षण बरकरार रखा.
इस सरकार के कार्यकाल में बडे़ किसान आंदोलन भी हुए. दबाव में आकर राज्य सरकार को किसानों के कर्ज़ माफ़ी की घोषणा करनी पडी. हालांकि आरोप है कि योजना किसानों तक पहुंच नहीं रही.
राज्य सरकार पर सबसे अधिक दबाव तब बना जब 1 जनवरी 2018 को पुणे के नजदीक भीमा-कोरेगांव में हज़ारों दलित कार्यकर्ता एकजुट हुए. ये एक ऐतिहासिक युद्ध के 200 साल पूरे होने का जश्न था. लेकिन वहां हिंसा भड़की. पत्थरबाजी और आगजनी में काफ़ी नुकसान हुआ.

आज क्या हैं हालात?
विधानसभा चुनाव की तारीख़ों का एलान होने के बाद अब सवाल उठता है कि क्या राज्य में शिवसेना और बीजेपी की जोड़ी बनी रहेगी या दोनों अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरेंगी?
लोकसभा चुनाव से पहले कुछ दिन जब बीजेपी और शिवसेना का गठबंधन हुआ तो ये तय हुआ था कि विधानसभा चुनावों में दोनों आधी-आधी सीटों पर चुनाव लड़ेंगी. लेकिन लोकसभा चुनाव में मिली ऐतिहासिक जीत के बाद अब बीजेपी शिवसेना को इतनी सीटें देने के लिए तैयार नहीं है.
बीजेपी के एक गुट का कहना है कि पार्टी अपने दम पर बहुमत ला सकती है. हालांकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे बार बार गठबंधन की बात दोहरा रहे हैं.

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कुछ दिन पहले एक कार्यक्रम 'मुंबई मेट्रो' में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसी मंच पर बैठे उद्धव ठाकरे को 'छोटा भाई' कहा था. महाराष्ट्र की राजनीति में इसका मतलब गठबंधन में जिसको कम जगह मिलती है उसे छोटा भाई कहते हैं.
दूसरी तरफ बीजेपी और शिवसेना जिस तरह प्रचार के मोड में हैं उसे देखते हुए ऐसा लग रहा है कि शायद वो अकेले चुनाव लड़ने की भी तैयारी कर रही हैं.
मुख्यमंत्री फडणवीस ने अगस्त में 'महाजनादेश यात्रा' प्रारंभ की लेकिन उस यात्रा का एलान होते ही शिवसेना नेता और उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे ने 'जनआशीर्वाद' यात्रा शुरू कर दी. शिवसेना की तरफ से आदित्य का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए लेना शुरू हो गया है. ठाकरे परिवार से कोई भी अब तक चुनाव नहीं लड़ा है. लेकिन अब आसार ऐसे हैं कि आदित्य मुंबई की किसी सीट से चुनाव लड़ सकते हैं.

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विपक्ष से 'पलायन'
कांग्रेस और एनसीपी से कई कद्दावर नेता बीजेपी और शिवसेना का रुख कर रहे हैं. इतनी तादाद में ऐसा 'पलायन' महाराष्ट्र मे कभी नहीं हुआ. क्या इसका मतलब यह मान लिया जाए कि हवा सिर्फ़ बीजेपी और शिवसेना की है, या फिर विपक्षी दल कमजोर हो चुके हैं.
इस पलायन का सबसे बड़ा झटका एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार को लगा है. उनके साथ बरसों से राजनीति में रहे और उनकी सरकार में मंत्री रहे नेता अब उन्हें छोड़ रहे हैं.
शरद पवार खु़द यह कह चुके हैं कि सत्तापक्ष की तरफ से विपक्ष के नेताओं को एजेंसियों से पूछताछ का डर दिखाया जा रहा है और उन्हें तोड़ा जा रहा है. महाराष्ट्र चुनाव अब शरद पवार बनाम सत्तापक्ष होता दिख रहा है.
कांग्रेस से भी कई बड़े नेता सत्ता पक्ष में जा चुके हैं. हालांकि कांग्रेस की हालत आज जैसी है उसके लिए पार्टी के अंदर बने अलग-अलग गुट ज़िम्मेदार हैं जिनकी वजह से पार्टी कमजोर हुई.
चुनाव से कुछ ही महीने पहले राज्य कांग्रेस को नया अध्यक्ष मिला. मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष का पद खाली है. लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी और सोनिया गांधी, दोनों ने ही महाराष्ट्र की तरफ ध्यान नहीं दिया.
कुल मिलाकर महाराष्ट्र में बिखरी हुई कांग्रेस विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही है.

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दलित और मुस्लिम वोटों का क्या होगा?
भीमा कोरेगांव की घटना के बाद दलित समुदाय में जो गुस्सा था उसे प्रकाश आंबेडकर ने आवाज़ दी और आगे बढ़ाया. उन्होंने एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवेसी से हाथ मिलाया और लोकसभा चुनाव से पहले 'वंचित बहुजन अगाड़ी' गठबंधन बनाया. दलित और मुस्लिम वोट एकजुट होने से लोकसभा चुनाव पर के परिणामों पर बड़ा असर दिखा.
विधानसभा चुनाव में भी इसका असर दिखेगा ऐसा अंदाज़ा लगाया जा रहा था लेकिन अब यह गठबंधन टूट चुका है. दोनों में सीटों के बंटवारे को लेकर झगडे़ हुए और गठबंधन ख़त्म हुआ.
महाराष्ट्र का एक हिस्सा, मराठवाड़ा, सूखे की चपेट में है और दूसरा हिस्सा पश्चिम महाराष्ट्र हाल में आई बाढ़ से उबर रहा है.
मुंबई, पुणे, नासिक, औरंगाबाद जैसे उद्योगक्षेत्र आर्थिक सुस्ती की मार झेल रहे हैं. ऐसी स्थिति में यह बुनियादी सवाल चुनाव पर असर डालेंगे या फिर राष्ट्रवाद और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दे माहौल गरमाएंगे.
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