अयोध्या से शिवसेना का नारा, 'पहले मंदिर बाद में इंडिया-पाकिस्तान मैच'

उद्धव ठाकरे

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    • Author, नीलेश धोत्रे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अयोध्या से

चार पांच ढोल वाले ढोल बजाते हुए आ रहे हैं. उनके साथ 20-25 शिवसैनिक हैं. और उन्हीं के साथ शिवसेना के कुछ सांसद दिखाई दे रहे हैं.

ये तस्वीर है अयोध्या की जहां रामजन्म भूमि स्थल है. जिस समय ये ढोल की आवाज़ शुरू होती है, मीडिया वाले उसी समय हरकत में आ जाते हैं.

पुलिस भी अपनी पोजिशन ले लेती है. उसी में उद्धव ठाकरे का दूसरा अयोध्या दौरा शुरू होता है. हालांकि इसका पैमाना कम और उद्धव कुछ ही घंटों के लिए अयोध्या रुकते हैं.

लगभग 100-150 पुलिसवाले, उतने ही मीडिया कर्मी और उतने ही लोग उद्धव ठाकरे को देखने आए हैं. कुल मिलाकर उद्धव ठाकरे की अयोध्या यात्रा का यही समां रहा.

कोई भी बड़ी होर्डिंग नहीं, कोई बड़ा स्टेज नहीं, रैली नहीं और इस तरह का कोई कार्यक्रम भी नहीं.

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लखनऊ से अयोध्या के रास्ते...

उद्धव ठाकरे अपने 18 सांसदों के साथ रामलला के दर्शन के लिए. महज 20 मिनट वहां रुके लेकिन उन 20 मिनटों में वहां क्या हुआ, इसकी जानकारी सामने नहीं आ पाई.

क्योंकि मीडिया को वहां जाने की इजाजत नहीं दी गई थी.

राम लला के दर्शन के लिए अंदर आने-जाने में ही लोगों को 20 मिनट लग जाते हैं, तो ऐसे में ये माना जा सकता है कि उद्धव और उनके सांसद केवल दर्शन करके वापस आ गए होंगे.

पिछली बार जब उद्धव ठाकरे का अयोध्या दौरा शुरू हुआ था तो लखनऊ से अयोध्या के रास्ते में सड़क किनारे शिवसेना के बड़े-बड़े होर्डिंग दिख रहे थे.

महाराष्ट्र से बड़ी तादाद में शिवसेना के कार्यकर्ता आए थे और सुरक्षा व्यवस्था भी चाक-चौबंद लग रही थी.

भीड़ पर काबू रखने के लिए पुलिस का घुड़सवार दस्ता भी ड्यूटी पर तैनात किया गया था लेकिन इस बार लोग कम थे तो जाहिर है कि पुलिस को इसकी ज़रूरत नहीं पड़ी होगी.

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इंडिया-पाकिस्तान मैच

महज चार घंटों में उद्धव ठाकरे का ये दौरा खत्म हो गया. वे साढ़े आठ बजे अयोध्या पहुंचे और साढ़े 12 बजे मुंबई के लिए रवाना हो गए.

जाते-जाते उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे ने मीडिया कर्मियों से कहा कि पहले मंदिर बाद में इंडिया-पाकिस्तान मैच.

हालांकि जिस इस दौरे के लिए जो तारीख तय की गई थी, वो ख़बरों में आने के लिहाज से बहुत माकूल नहीं था.

रविवार को देवेंद्र फडणवीस को अपनी कैबिनेट का विस्तार करना था और मैनचेस्टर में भारत और पाकिस्तान का बड़ा मैच तय था.

जिस समय महाराष्ट्र की मीडिया में फडणवीस कैबिनेट के विस्तार की ख़बर छाई हुई थी, उद्धव ठाकरे ने अयोध्या में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के लिए वही समय चुना.

टीवी वाले कन्फ्यूज़ थे कि किस ख़बर को तवज्जो दें, उन्होंने डबल स्क्रीन से चीज़ें मैनेज की. उद्धव ठाकरे का प्रेस कॉन्फ्रेंस और फडणवीस कैबिनेट का विस्तार लगभग एक ही साथ खत्म हुआ.

उद्धव ठाकरे

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क्या चाहती है शिवसेना?

सियासी हलकों में ये सवाल पूछा जा रहा है कि उद्धव ठाकरे को इस टाइमिंग हासिल क्या हुआ या फिर उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस का समय चुनने में चूक कर दी.

और वहीं, उद्धव ठाकरे ने अयोध्या में अपना प्रेस कॉन्फ्रेंस हिंदी में संबोधित किया और जवाब के लिए सवाल भी नेशनल मीडिया के प्रतिनिधियों के लिए.

अयोध्या में मराठी मीडिया के प्रतिनिधि भी पहुंचे थे लेकिन उद्धव ने उन्हें ज़्यादा तवज्जो नहीं दी.

इस पर हद तो तब हो गई जब उद्धव के जाने के बाद शिवसेना के सांसदों ने मराठी मीडिया से भारत-पाकिस्तान के मैच पर बात करने लगे.

पिछली बार अयोध्या में भव्य उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब हुए उद्धव ठाकरे इस बार राम लला के शहर में फीके रहे.

हालांकि उद्धव ठाकरे के अयोध्या दौरे की तारीख फडणवीस कैबिनेट के विस्तार की तारीख से पहले तय हुई थी लेकिन आपसी रजामंदी से दोनों में से किसी एक कार्यक्रम को आगे-पीछे खिसकाया जा सकता था.

अयोध्या

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शिवसेना की मजबूरी

रविवार को भारत-पाकिस्तान का मैच था और ये बात शिवसेना को मालूम रही होगी. ऐसे में अयोध्या दौरे की इस तारीख को लेकर सवाल उठने लगे हैं.

उद्धव ठाकरे और शिवसेना की ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि वे इस फीके कार्यक्रम के लिए भी तैयार हो गए.

इस सवाल का जवाब आने वाले विधानसभा चुनाव और हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव के नतीजे में है.

इस बार भारतीय जनता पार्टी को भी ये अंदाजा नहीं था कि उनके 303 सांसद चुन कर आएंगे. ऊपर से शिवसेना ने पहले से भाजपा को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

उद्धव ठाकरे ने अमित शाह को मातोश्री आने पर मजबूर कर दिया था.

लेकिन अब स्थिति पूरी तरह से अलग है. महाराष्ट्र में बीजेपी शिवसेना पर पहले की तरह निर्भर नहीं है.

केंद्र में शिवसेना को मिला विभाग हो या फिर लोकसभा के उपाध्यक्ष पर जताई गई दावेदारी हो, भाजपा ने शिवसेना को नज़रअंदाज़ ही किया है.

उद्धव ठाकरे

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केशव प्रसाद मौर्या का अयोध्या कार्यक्रम

बीजेपी ने शिवसेना को उनकी जगह दिखाना शुरू कर दिया है. इसी बीच उद्धव ठाकरे ने जिस समय अयोध्या दौरे की घोषणी की और लगभग इसी समय विश्व हिंदू परिषद ने शनिवार को अयोध्या में संतों के सम्मेलन का आयोजन कर दिया.

पिछली बार भी वीएचपी ने उद्धव के अयोध्या दौरे के दिन ही अयोध्या में संत सम्मेलन का कार्यक्रम रख दिया था. हालांकि इस बार दोनों के ही कार्यक्रमों का पैमाना छोटा था.

शनिवार को अयोध्या में हुए वीएचपी के कार्यक्रम में शामिल हुए उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या ने ये बात बहुत जोर देकर कही थी कि राम मंदिर का मुद्दा भाजपा का है. उन्होंने कहा कि सरकार बातचीत के जरिए मंदिर निर्माण की संभावना तलाश रही है. अगर कोई रास्ता नहीं निकला तो अध्यादेश का विकल्प भी खुला हुआ है.

एक तरफ़ उद्धव ठाकरे अयोध्या में जो कुछ कह सकते थे, एक दिन पहले केशव मौर्या ने वो बातें कह दी थीं.

रविवार को उद्धव जब अयोध्या पहुंचे होंगे तो स्थानीय अख़बारों की सुर्खियां केशव मौर्या के हवाले से यही बता रही थीं कि मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश का विकल्प खुला हुआ है.

एक तरह से भाजपा की उत्तर प्रदेश इकाई ने उद्धव के अयोध्या दौरे की हवा निकालने का पूरा इंतज़ाम कर लिया था.

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शिवसेना भाजपा का गठबंधन

जिस तरह से उद्धव ठाकरे ने अयोध्या यात्रा के दौरान राम मंदिर के मुद्दे को लेकर अपना लहजा नर्म रखा था, उससे ये जाहिर हो रहा था कि शिवसेना को भाजपा के साथ की ज़्यादा ज़रूरत है.

वरिष्ठ पत्रकार सुजाता आनंदन का कहना है कि पिछली बार शिवसेना अकेले लड़ी थी, फिर भी उसे अच्छे वोट और सीटें मिली थीं. लेकिन तब शिवसेना विपक्ष में थी और अब सत्ता में है.

"इस समय शिवसेना के सामने प्रकाश आंबेडकर की पार्टी सबसे बड़ी चुनौती है. इसलिए शिवसेना को गठबंधन ज़रूरी लगता है."

सुजाता आंनद की राय में अब हालात पहले जैसा नहीं है और शिवसेना भाजपा का गठबंधन पहले की तरह सहज नहीं रहने वाला है.

"जिस तरह से उद्धव ठाकरे और शिवसेना बीजेपी को लेकर अतीत में तल्ख रही है, अमित शाह की भाजपा उसे भूलने वाली नहीं है. शिवसेना को भी ये बात मालूम है."

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'ये दबावतंत्र का हिस्सा है'

लोकमत के वरिष्ठ सहायक संपादक संदीप प्रधान का कहना है कि आने वाले दिनों में भी राम मंदिर के मुद्दे पर शिवसेना आक्रामक भूमिका में नज़र आएगी.

उन्होंने कहा, "उद्धव ठाकरे का दूसरा अयोध्या दौरा भी उसी दबावतंत्र का हिस्सा है. शिवसेना अब सरकार में है. लेकिन मनचाहा मंत्रिपद ना मिलने से शिवसेना में नाराज़गी है. बीजेपी को जो प्रचंड बहुमत मिला है, उसे देखते हुए शिवसेना अब अपना विरोध और नाराज़गी बोलकर नहीं दिखाएगी."

उन्होंने ये भी बताया, "बीजेपी की पहले जैसे 'चौकीदार चोर है' जैसी आलोचना नहीं होगी. लेकिन शिवसेना कुछ ना कुछ करके दबाव बनाने की कोशिश करेगी. उसके लिए वो हिंदुत्व का मुद्दा और राम मंदिर का इस्तेमाल करेंगे."

संदीप प्रधान ने कहा, "मोदी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के बाद कुछ दिनों में ही सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा था कि राम का काम करना है, राम का काम होकर ही रहेगा. इसलिए आरएसएस राम मंदिर के मुद्दे पर आक्रामक होगा. वो दिखाना चाहते हैं कि हम भी इस रेस में पीछे नहीं है."

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संदीप प्रधान कहते हैं कि महाराष्ट्र में होने वाले चुनाव को देखते हुए भी शिवसेना के लिए राम मंदिर का मुद्दा अहम है. "लोक सभा चुनाव में राष्ट्रप्रेम, हिंदुत्व जैसे मुद्दे अहम रहे थे. विधान सभा चुनाव में इनका थोड़ा महत्व रहेगा ही."

वो कहते हैं, " ऐसे में जो मतदाता ये भावना रखता है कि राम मंदिर का निर्माण हो जाए, उसको अपनी तरफ खींचने के लिए शिवसेना अयोध्या दौरे का इस्तेमाल करेगा. मतदाता अपनी भूमिका पर ज़्यादा से ज़्यादा विश्वास रखें, इसलिए शिवसेना दिखाने की कोशिश कर रही है कि राम मंदिर उनके लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है."

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