कश्मीर: 'एक आंख से दिखना बंद हो गया, अब बेबस हो गई हूं'

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत प्रशासित कश्मीर में सुरक्षा बल प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पैलेट गन यानी छर्रे वाली बंदूक़ का इस्तेमाल करते रहे हैं.
कहा जाता है पैलेट गन के छर्रों से आम तौर पर मौत तो नहीं होती लेकिन इसकी चोट से ऐसे नुक़सान हो सकते हैं, जिनकी भरपाई नहीं हो सकती.
कश्मीर घाटी में बीते कुछ साल में पैलेट गन के छर्रों की वजह से कई लोग आंखों की रोशनी खो चुके हैं.
पिछले महीने आठ अगस्त को श्रीनगर की राफ़िया भी पैलेट गन का निशाना बन गईं. उन्हें एक आंख से दिखाई देना बंद हो गया और ज़िंदगी मुश्किलों से भर गई.
राफ़िया का कहना है कि भारतीय सेना ने इलाज के लिए उन्हें चेन्नई भी भेजा. राफ़िया से बात की हमारे सहयोगी माजिद जहांगीर ने.
पढ़िए राफ़िया की कहानी उन्हीं के शब्दों में-

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पीठ पर सभी पैलेट गोलियां...
आठ अगस्त को मैं और मेरे पति सब्ज़ी लेने के लिए बाहर जा रहे थे. हम गेट से बाहर ही निकल रहे थे कि बहुत सारे लड़के हमारी तरफ़ भाग कर आए.
मेरे पति मुझसे थोड़ा पहले निकल गए थे तो मैंने देखा कि वो भी लड़कों के साथ दौड़कर वापस आ रहे हैं. उनके साथ कोई सुरक्षाकर्मी भी था.
उन्होंने मेरी तरफ़ लगातार पैलेट गन चलाईं. मैंने हाथ के इशारे से उन्हें रुकने के लिए कहा लेकिन इसके बाद भी वे नहीं रुके.
मेरे पति ने मुझे कवर किया और उनकी पीठ पर सभी पैलेट गोलियां लग गई. उसमें से जो मिस हो गईं वो मेरी बाईं आंख, सिर, नाक में और हाथ में लगीं.

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कुछ दिख नहीं रहा है...
उसके बाद मेरे पति दौड़कर मुझे कमरे में ले गए. मैंने अपनी जेठानी को दिखाया कि मेरी आंख में भी पैलेट लगी है. मुझे कुछ दिख नहीं रहा है. तब घरवाले जल्दी से मुझे एक मेडिकल शॉप में लेकर गए.
शॉप वाले ने पूछा कि कुछ दिख रहा है तो मैंने बताया कि कुछ दिखाई नहीं दे रहा. उन्होंने कहा कि आप जल्दी से इलाज के लिए रैनावारी चले जाओ. लेकिन, वहां से भी डॉक्टर ने कहा कि जल्द से जल्द हेडवना में जाओ.
वहां पर डॉक्टर ने मेरे सब टेस्ट करवाए और फिर रात को ऑपरेशन किया. उन्होंने सुबह बताया कि पैलेट नहीं निकला. उसके बाद मुझे डिस्चार्ज किया गया और कहा गया कि ईद के बाद मेरी दूसरी सर्जरी होगी और फिर वो देखेंगे.
लेकिन, मेरी हालत ख़राब थी तो हम और इंतज़ार नहीं कर सकते थे. तब मेरे पति ने मुझे प्राइवेट डॉक्टर को दिखाया. डॉक्टर ने कहा कि यहां पर पैसे बर्बाद मत करो और जितना जल्दी हो सके बाहर जाओ.

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क्या कहता है प्रशासन
इससे पहले भी कश्मीर के कुछ लोगों ने सेना पर उत्पीड़न के आरोप लगाए थे. इसपर बीबीसी ने एक रिपोर्ट भी प्रकाशित की थी. जब सेना से संपर्क किया गया तो उन्होंने इस तरह के आरोपों से इनकार किया था.
बीबीसी को भेजे जवाब में भारतीय सेना ने इन आरोपों पर कहा था, "हमने किसी भी नागरिक के साथ मारपीट नहीं की थी. इस क़िस्म के कोई विशेष आरोप हमारे संज्ञान में नहीं लाए गए हैं. संभव है कि ये आरोप विरोधी तत्वों की ओर से प्रेरित हों."
वहीं जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने भी एक प्रेस कॉन्फ्रेस की थी.
जिसमें उन्होंने कहा, "हमने पंचायत के चुनाव में, लोक सभा के चुनाव में और अब भी इतना स्थिति को नियंत्रण में रखा है कि कोई जान-माल का नुकसान नहीं होने दिया. थोड़ा बहुत जो लोग उपद्रव करके घायल हैं, वो भी सब कमर के नीचे हैं. सेना का ज़रूर एक-आध जगह जान-माल का नुक़सान हुआ है. लेकिन हमने नागरिकों का कोई जान-माल का नुक़सान नहीं होने दिया और हम इसको एक बड़ी उपलब्धि मानते हैं."

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सेना इलाज के लिए चेन्नई लेकर गई...
ये सुनकर हमारी तो उम्मीद ही टूट गई क्योंकि बाहर जाने का ख़र्चा हम नहीं उठा सकते थे.
दिनभर हम यहीं बैठे रहे. फिर एक सेना का जवान आया और उन्होंने मेरी हालत देखकर कहा कि वो हमारी मदद करेंगे.
उन्होंने कहा कि वो हमें चेन्नई के अस्पताल में लेकर जाएँगे.
वे ही मुझे चेन्नई लेकर गए. वहां की हवाई टिकट और अस्पताल का ख़र्चा भी उन लोगों ने उठाया. बाक़ी रहने और खाने-पीने का ख़र्चा हमने दिया था.
पैलेट लगने के बाद से हमारा बुरा हाल है. मेरे पति भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं.
उन्हें रोज़ कहीं न कहीं दर्द होता है और इलाज के लिए कभी रैनावारी तो कभी सौरा जाना पड़ता है.

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'सब ख़त्म हो गया'
मैं कभी कोई दवा नहीं खाती थी. सिरदर्द की कौन सी दवा मिलती है मुझे ये तक नहीं पता था. आज तो मुझे रोज़ सिरदर्द की एक टैबलेट खानी पड़ती है. मेरे साथ जो भी हुआ, बहुत बुरा हुआ. हम सोच रहे थे कि आगे जाकर बहुत कुछ करेंगे लेकिन मेरे साथ बहुत ग़लत हुआ.
मैं अपने हाथों से कमाती थी. हम दोनों पति-पत्नी कमाते थे और सोच रहे थे कि अपना घर बनाएंगे लेकिन वो भी ख़त्म हो गया. मुझे इस आंख से कुछ भी नहीं दिखाई देता है. मैं दर्जी का काम करती थी. अब तो वहां पर भी नहीं जा सकती क्योंकि डॉक्टर ने मना किया है.
जो काम मैं ख़ुद कर रही थी वो अब मेरे पति को करना पड़ता है. मैं अपने बेटे को ट्यूशन लेकर जाती थी लेकिन वो तक नहीं कर पाती. मेरे पति घर पर ख़ाली बैठे हुए हैं. सब कुछ ख़त्म हो गया.

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'हम पर पैलेट क्यों चलाई'
जिस दिन पैलेट लगी उस दिन यहां दोपहर में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे लेकिन वो सड़क पर हो रहे थे. उन्हें हमारे घरों के पास आकर पैलेट चलाने से पहले सोचना चाहिए था. वो तो मेरा बच्चे किसी तरह से बच गया वरना मेरे बेटे को भी लग जाती. यहां पर और भी बहुत सारे बच्चे थे.
मेरी ज़िंदगी तो पूरी तरह ख़त्म हो गई.
मेरी ये मांग है कि ये जो पैलेट गन चल रही हैं वो बंद होनी चाहिए. कई लड़कियों की ज़िंदगी ख़राब हो गई है. मैं तो फिर भी शादीशुदा हूं लेकिन जिनकी शादी नहीं हुई है वो क्या करेंगी. कई लोगों की दोनों ही आंखें ख़राब हो चुकी हैं.

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