राम जेठमलानी: इंदिरा गांधी को दी चुनौती, मोदी सरकार के भी ख़िलाफ़

राम जेठमलानी

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    • Author, विराग गुप्ता
    • पदनाम, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट, बीबीसी हिंदी के लिए

देश के सबसे बेहतरीन वकीलों में से एक और हमेशा विवादों के केंद्र में रहने वाले राम जेठमलानी हमारे बीच नहीं रहे.

दो साल पहले वकालत से संन्यास लेने की घोषणा के बाद से ही जेठमलानी की विदाई का संकेत मिल गया था.

सात दशकों के अभूतपूर्व करियर में उन्होंने लोकतंत्र के चारों स्तंभों में खलबली पैदा करके विलक्षण भूमिका निभाई. एक समय न्यायिक जगत में वे देश के सबसे विद्वान, सफल और महंगे वकील रहे.

कार्यपालिका यानी सरकार में वे क़ानून मंत्री और शहरी विकास मंत्री रहे. विधायिका में वे लोकसभा और मृत्यु तक राज्यसभा सदस्य रहे.

मीडिया और लेखन में भी उनकी गहरी छाप रही. जीवनी के साथ उन पर अनेक पुस्तकें लिखी गई और जेठमलानी ने भी अनेक बेबाक किताबें लिखीं.

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बंटवारे के गवाह बने

जेठमलानी की जीवन यात्रा से भारतीय लोकतंत्र और राज व्यवस्था के विरोधाभासों को समझने की कोशिश भी होनी चाहिए.

गुलाम भारत में 17 साल का युवा वकालत पास करके अंग्रेजों की बौद्धिक श्रेष्ठता को चुनौती देता है.

रणक्षेत्र में हमेशा लड़ने वाले जेठमलानी को पहला पलायन विभाजन के बाद करना पड़ा, जब वे जेब में 1 पैसा रखकर कराची से बॉम्बे आ गए.

पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के लिए मोरारजी देसाई सरकार द्वारा बनाए गए दमनकारी क़ानून को युवा राम ने ख़त्म कराके अपने जंगी इरादों का आगाज़ कर दिया और उनका यही जज्बा आजीवन कायम रहा.

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मोरारजी उस बात को भूले नहीं और 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने पर, उन्होंने जेठमलानी को केंद्र सरकार में मंत्री नहीं बनाया.

जेठमलानी उन गिने-चुने वकीलों में से थे जिन्होंने ब्रिटिश कालीन जूरी प्रणाली में अनेक मामलों में बहस की, जिसमें नानावती का मुक़दमा आख़िरी था. साल 1959 में राम ने इस मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से पैरवी करते हुए अपनी सफलता के झंडे गाड़े.

ये मामला आज भी क़ानून की किताबों मे पढ़ाया जाता है. जेठमलानी की अनेक उपलब्धियों में यह बात पीछे रह जाती है कि उन्होंने कई साल तक क़ानून के विद्यार्थियों को पढ़ाया और अनेक कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर एमेरेट्स भी रहे.

'स्मगलरों के वकील'

जेठमलानी जैसे जीनियस लोगों को क़ानून और तर्क की बारीक़ रस्सियों से पुल बनाने में रोमांच होता था, ये सार्वजनिक जीवन में विवाद बन जाते थे.

वकालत का ऐतिहासिक सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति अपराध सिद्ध होने तक दोषी करार नहीं दिया जा सकता. इस बात को सही साबित करने के लिए उन्होंने अनेक आर्थिक-राजनीतिक अपराधियों और माफ़ियाओं के पक्ष में जुझारू पैरवी की.

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छठे और सातवें दशक में हाजी मस्तान जैसे अनेक तस्करों की पैरवी करने के कारण जेठमलानी 'स्मगलरों के वकील' कहे जाने लगे, पर वो अपने कथित प्रोफ़ेशनल कर्तव्य पथ से कभी नहीं डिगे.

साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एचएल दत्तू की बेंच संवैधानिक मामले की सुनवाई कर रही थी. परंपराओं के अनुसार संविधान बेंच के सामने हो रही सुनवाई के दौरान किसी अन्य मामले का ज़िक्र नहीं किया जा सकता. एक अन्य सीनियर एडवोकेट के किए गए ज़िक्र को जजों ने नकार दिया.

उसके बाद जब जेठमलानी ने कालेधन मामले में सुनवाई को स्थगित करने की बात की, तो परम्पराओं से परे जाकर जजों ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली. अन्य सीनियर एडवोकेट ने आगे जाकर खुद को अभिमन्यु बताते हुए, रिलीफ़ की मांग दोहराई. परन्तु सुप्रीम कोर्ट ने पितामह बताते हुए, जेठमलानी की ऊंचाई का न्यायिक अनुमोदन कर दिया.

न्यायिक व्यवस्था की उपज जेठमलानी, आख़िरी समय में अदालती सिस्टम से भी निराश हो गए. साल 2009 में उन्होंने अनेक बड़े वकीलों के साथ मिलकर न्यायपालिका में पारदर्शिता के लिए जंग शुरू की.

इंदिरा गांधी

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जब इंदिरा गांधी को दी चुनौती

वकालत की चुनौतियों से मन भरने के बाद जेठमलानी राजनीति के मैदान में कूद गए. बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन जेठमलानी ने आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी की निरंकुश सत्ता को चुनौती दी. नतीजा उनके ख़िलाफ़ केरल की अदालत से गिरफ़्तारी के वारंट के तौर पर आया.

नानी पालखीवाला समेत 300 वकीलों ने जेठमलानी के पक्ष में मुंबई की अदालत में पैरवी करके, उनकी गिरफ़्तारी पर रोक लगवा दी.

जिन चंद्रचूड़ के साथ जेठमलानी ने नानावती मामले में पैरवी की थी, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर एडीएम जबलपुर मामले (जिसे संविधान का काला अध्याय माना जाता है) में फ़ैसला देकर मूल अधिकारों को निरीह बना दिया.

उस फ़ैसले के बाद जेठमलानी की गिरफ़्तारी आसन्न हो गयी और जीवन का दूसरा पलायन कर वे कनाडा चले गए. विदेश से उन्होंने आपातकाल के ख़िलाफ़ संघर्ष जारी रखा और आम चुनाव होने पर जनता पार्टी के टिकट पर बंबई से लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हो गए.

लालकृष्ण आडवाणी

राजनीति में आडवाणी ले कर आए

अदालतों में बौद्धिक बहस करने वाले जेठमलानी राजनीति में विरोधाभासों की गिरफ़्त में आकर अविश्वसनीय हो गए. उन्होंने देश के अनेक दलों के बड़े राजनेताओं के मामलों में पैरवी की थी.

इंदिरा गांधी की इमरजेंसी की ख़िलाफ़त से राजनीति की शुरुआत करने वाले जेठमलानी ने जीवन के आख़िरी चरण में आकर नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गांधी के पक्ष में पैरवी के लिए सहमति पत्र दे दिया.

सिंध प्रांत के निवासी जेठमलानी को राजनीति में लाने का श्रेय, सिंध के ही लालकृष्ण आडवाणी को दिया जाता है. तो जेठमलानी ने हवाला कांड में आडवाणी जी के पक्ष में पैरवी करके, इसका बदला भी चुकाया.

अटल बिहारी वाजपेयी के विरोध के बावजूद आडवाणी की वजह से ही जेठमलानी दो बार केंद्र सरकार में मंत्री रहे.

लेकिन जेठमलानी ने 2004 में अटलजी के ख़िलाफ़ लखनऊ से कांग्रेस के समर्थन से चुनाव लड़कर आलोचना भी मोल ली. पार्टियों की अदला-बदली के बाद, जेठमलानी ने खुद का स्वयंभू राजनीतिक दल भी बना लिया और राष्ट्रपति चुनाव भी लड़े.

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इमेज कैप्शन, भाजपा से निकाले जाने के बाद वे लालू की पार्टी से सांसद रहे

फिर लौटे बीजेपी की तरफ

मोदी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने पर जेठमलानी फिर बीजेपी की धारा में आ गए. लेकिन फर्जी एनकाउंटर मामले में अमित शाह का मुक़दमा लड़ने वाले जेठमलानी ने बीजेपी सरकार बनने पर मोदी और अमित शाह के ख़िलाफ़ ही मोर्चा खोल दिया.

इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि मोदी सरकार को हटाना उनके जीवन का लक्ष्य है.

काले धन पर उनकी शुरू की गई जंग की वजह से सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद, मोदी सरकार ने पहले कार्यकाल में एसआईटी का गठन किया.

जेठमलानी ने जब बीजेपी नेताओं पर ही भ्रष्टाचार के अनेक आरोप लगाने शुरू किए तो उन्हें एक बार फिर पार्टी से निकाल दिया गया. राजनीति में क़ानून से हक़ हासिल नहीं होते, परन्तु जेठमलानी ने अरुण जेटली और आडवाणी समेत अनेक बीजेपी नेताओं के ख़िलाफ़ मानहानि का मुक़दमा दायर करके, निष्कासन को रद्द करने की मांग की.

चारा घोटाले के आरोपी लालू यादव की पैरवी करने वाले जेठमलानी को राष्ट्रीय जनता दल की मदद से साल 2016 में राज्यसभा की सदस्यता मिली. इसके बावजूद बीजेपी नेताओं ने साल 2018 में अदालती मामले में जेठमलानी से समझौता करके उनसे माफ़ी मांगना बेहतर समझा.

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इमेज कैप्शन, जेठमलानी अपने आख़िरी समय तक ख़ुशमिजाज़ और चुस्त रहे

सबसे महंगे वकील

जेठमलानी, व्यक्तिगत जीवन में बेबाकी और खुलेपन को पसंद करते थे. एक बार जयपुर साहित्य उत्सव के समय शोभा डे को दिए इंटरव्यू में जेठमलानी ने कहा था, कि "भगवान और शैतान में से अगर किसी एक पर भरोसा करना पड़े तो वे शैतान पर ज़्यादा भरोसा करेंगे."

अदालतों में पैरवी के समय वे मामले में बहस की बजाए पूरे मनोयोग से वाकयुद्ध करते थे. जिन मुक़दमों में राहत की कोई उम्मीद नहीं होती थी, उन मामलों में जेठमलानी की विशेष मांग होती थी और इसलिये वे सबसे महंगे वकील भी थे.

पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली के दिल्ली के मुख्यमंत्री पर दायर मानहानि के मामले में जेठमलानी ने अरविंद केजरीवाल के पक्ष में बहस की, पर करोड़ों रुपये के बिल की वजह से वे विवादों के घेरे में आ गए.

चर्चित मामलों में बहस करने वाले जेठमलानी ने अनेक बार क़ानून की नई व्याख्या की, जिससे वे हारकर भी जीत गए.

नरेंद्र मोदी, राम जेठमलानी

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आज़ादी के पहले अंग्रेजों की ग़ुलामी के ख़िलाफ़ संघर्ष में वकीलों की बड़ी भूमिका थी. आज़ादी के बाद देश में अनेक बड़े वकील हुए लेकिन वे सिस्टम का हिस्सा बनकर ही रह गए. जेठमलानी की ख़ासियत यह थी कि वे सबके दोस्त होने के बावजूद, बेबाक और जुझारू थे और इसलिए वे किसी सिस्टम का हिस्सा नहीं बन सके.

खुद विवादों के घेरे में रहने के बावजूद, जेठमलानी ने सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और राजनीतिक सिस्टम में उत्तरदायित्व के लिए अनके जंग छेड़ी, जो तार्किक मुकाम तक नहीं पहुंच सकीं.

जेठमलानी न तो सुषमा स्वराज और अरुण जेटली जैसे सफल राजनेता बन सके और न ही पालखीवाला जैसे संविधानविद्. लेकिन सभी परम्पराओं को ध्वस्त करने वाले, जेठमलानी अपने आप में अनूठे और बेमिसाल थे. उनका निधन प्रखर-साहसिक मेधा के युग का अवसान है.

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