गवर्नर को घोषणा कर देनी चाहिए कि कश्मीर आईसीयू में है: वुसअत का ब्लॉग

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कश्मीर के गवर्नर सत्यपाल मलिक ने बिल्कुल सही कहा कि राहुल गांधी उनके पहले से दिए गए न्यौते को सियासत के लिए इस्तेमाल करना चाहते थे. इसलिए उन्हें श्रीनगर एयरपोर्ट से वापस भेज दिया गया.
ज़ाहिर है ग़लती राहुल की है. एक तो उन्हें एक्सपायर्ड न्यौते पर कश्मीर नहीं जाना चाहिए था. उन्हें मालूम होना चाहिए था कि जिस तरह कर्फ्यू पास एक ख़ास समय के लिए पास होता है उसी तरह गवर्नर कश्मीर का न्यौता भी हमेशा के लिए नहीं होता. उसे इस्तेमाल करने की भी एक तारीख़ और एक हद होती है.
दूसरे ये कि राहुल गांधी को पहले ही गर्वनर सत्यपाल मलिक को बता देना चाहिए था कि हम राजनेता ज़रूर है लेकिन श्रीनगर अपनी सियासत की दुकान चमकाने नहीं बल्कि लाल चौक में अपनी मंडली के साथ कश्मीर के लोगों और सुरक्षाबलों के मनोरंजन के लिए क़व्वाली की महफ़िल सजाने आ रहे हैं.
राहुल और उनकी मंडली को सरकारी सूचना विभाग ने भी चेतावनी दी थी कि कश्मीर में इस समय धारा 144 लगी हुई है. इसलिए 12-13 लोग और उनके साथ मीडिया का जुलूस एक साथ नहीं चल सकता. जब धारा 144 हट जाए तब पधारिएगा.

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गांधी जी ने नमक बनाने के लिए जब दांडी यात्रा शुरू की थी तब भी धारा 144 जैसा ही कोई क़ानून लागू था. जब इंदिरा गांधी ने एमरजेंसी लगाई थी तब भी जिस-जिस ने विरोध प्रदर्शन किया था उन सभी ने क़ानून का उल्लंघन किया था इसलिए तो उन्हें जेलों में डाल दिया गया था.
जब ज़िया उल हक़ ने पाकिस्तान में मार्शल लॉ लगाया तब भी राजनेताओं को कहा गया कि आप को नाचने-गाने, रोन-धोने की आज़ादी है लेकिन सियासत से दूर रहिएगा और क़ानून का पालन करना मत भूलिएगा. कैसी मज़े की बात है कि जब कोई पार्टी विपक्ष में होती है तो वो जिस क़ानून को तोड़ती है सत्ता में आने के बाद बाक़ियों को उसी क़ानून पर चलना याद दिलाती रहती है.
जिस तरह राहुल समेत विपक्षी नेताओं को एयरपोर्ट से वापस लौटाया गया आगे इस किचकिच से बचने के लिए सत्यपाल मलिक को एक बात की घोषणा कर देनी चाहिए कि उनका राज्य ऑपरेशन के बाद इस समय इंटेनसिव केयर यूनिट यानि आईसीयू में आराम कर रहा है.
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लिहाज़ा जो शुभचिंतक कश्मीर से मिलना चाहते हैं वो उसके जनरल वार्ड में शिफ्ट होने तक इंतज़ार कर लें. फिर भी कोई बात न सुने तो गृह मंत्री वही करें जो पाकिस्तान में जनरल ज़िया के गृह मंत्रालय ने उस समय के अनुभवी नेता सरदार शेरवाज़ मज़ारी के साथ किया था. यानि पाकिस्तान के तमाम सूबों में उनका प्रवेश बंद कर के राजधानी इस्लमाबाद को मज़ारी साहब के लिए जेल घोषित कर दिया गया था.
अब हम से कोई ये न पूछे कि जो उस समय पाकिस्तान के ज़िया उल हक़ का उदाहरण आप आज के भारत के लिए कैसे देख सकते हैं वरना हम भी बताएंगे कि ज़िया उल हक़ का भी एक प्रधानमंत्री था, एक संसद था और उस संसद में विरोधी पक्ष भी था और वहां भी बहुमत से फ़ैसले कराए जाते थे. वहां भी क़ानून का सख़्ती से पालन करवाया जाता था.
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