कश्मीर: अनुच्छेद 370 को लेकर किए जा रहे दावों की पड़ताल

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- Author, फ़ैक्ट चेक टीम
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद-370 के तहत जम्मू-कश्मीर को प्राप्त 'विशेष राज्य का दर्जा' समाप्त कर दिया है.
सरकार जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में बाँटने का फ़ैसला कर चुकी है. इस फ़ैसले के तहत दो केंद्र शासित प्रदेश बनाये जाएंगे. एक जम्मू-कश्मीर और दूसरा लद्दाख.
सरकार ने तय किया है कि जम्मू-कश्मीर में विधायिका रहेगी, जबकि लद्दाख में विधायिका नहीं होगी.
05 अगस्त 2019 को जब राज्यसभा में भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने पहली बार यह घोषणा की, तभी से लोग सोशल मीडिया पर 'अनुच्छेद-370' से जुड़े तमाम दावे कर रहे हैं.
इनमें से कुछेक दावों की हमने पड़ताल की तो कई अलग-अलग तथ्य सामने आए.

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दावा: आर्टिकल-370 संविधान से हटाया गया
सच: यह दावा भारतीय जनता पार्टी जनसंघ के संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के उस नारे को फ़ॉलो करती आई है जिसमें कहा गया था कि "एक देश में दो निशान, दो विधान और दो प्रधान नहीं चलेंगे."
जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में दिया गया ये नारा राज्य को अनुच्छेद-370 के तहत मिले उन विशेषाधिकारों के ख़िलाफ़ था जिन्हें बीजेपी साल 2014 और फिर 2019 लोकसभा चुनाव के घोषणापत्र में राज्य से हटाने का वादा कर चुकी थी.
5 अगस्त 2019 को भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने जो संवैधानिक आदेश जारी किया, उसमें राष्ट्रपति ने लिखा है कि उन्होंने संविधान के अनुच्छेद-370 के खण्ड (1) द्वारा दी गई शक्ति का इस्तेमाल करते हुए यह आदेश जारी किया है.
इस बारे में क़ानून विशेषज्ञ फैज़ान मुस्तफा ने लिखा है कि अनुच्छेद-370 संविधान का हिस्सा है और इसका इस्तेमाल करते हुए ही राष्ट्रपति ने जम्मू-कश्मीर का स्पेशल स्टेटस हटाया है.
वो लिखते हैं, "यह पहली बार है जब अनुच्छेद-370 से मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अनुच्छेद-370 को ही संशोधित किया गया हो."
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दावा: कश्मीर में पहले तिरंगा नहीं फहराया जाता था
सच: पिछले 67 सालों से जम्मू-कश्मीर के सभी सार्वजनिक आयोजनों में और सरकारी इमारतों पर तिरंगा झंडे के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर का झंडा फहराने का प्रोटोकॉल रहा है.
लेकिन अनुच्छेद-370 के निष्क्रिय होने के बाद प्रदेश के अलग झंडे की अहमियत नहीं रह गई है और वहां अब सिर्फ तिरंगा फहराया जाएगा.
जम्मू-कश्मीर का अपना झंडा अस्तित्व में इसलिए था क्योंकि साल 1952 में हुए 'दिल्ली समझौते' में ये कहा गया था कि केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर राज्य के अलग झंडे पर सहमत है और ये झंडा भारतीय झंडे का प्रतिद्वंदी नहीं होगा.
कुछ लोग यह अफ़वाह भी फैलाते हैं कि कश्मीरियों को तिरंगे का अपमान करने पर सज़ा नहीं होती थी. लेकिन यह कहना ग़लत है क्योंकि अनुच्छेद-370 के सक्रिय होते हुए भी कश्मीर के लोगों पर 'प्रिवेंशन ऑफ़ इंसल्ट टू नेशनल ऑनर एक्ट, 1971' और 'फ़्लैग कोड ऑफ़ इंडिया, 2002' लागू था.

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दावा: जम्मू-कश्मीर में था अलग संविधान, नहीं चलते थे भारतीय नियम
सच: अनुच्छेद-370 जम्मू-कश्मीर विधानसभा को यह अधिकार देता था कि वो चाहे तो भारत सरकार द्वारा पास किये गए क़ानूनों को स्वीकार न करे. लेकिन 1950 के दशक से लेकर अब तक अनुच्छेद-370 में राष्ट्रपति के आदेश से कई संशोधन किये गये थे जिनके ज़रिये यह सुनिश्चित किया जा सका कि ज़्यादा से ज़्यादा भारतीय क़ानून जम्मू-कश्मीर में लागू हों.
इसी वजह से सीबीआई और सीएजी जैसी संस्थाएं जम्मू-कश्मीर में पहले से काम कर रही थीं. साल 2017 में जीएसटी को भी कुछ दिन की देरी से जम्मू-कश्मीर में लागू कर दिया गया था, लेकिन इसे लागू करने के लिए जम्मू-कश्मीर विधानसभा की मंज़ूरी लेनी पड़ी थी. अब ऐसे क़ानून संसद में पास होने के साथ ही जम्मू-कश्मीर में भी लागू होंगे.
भारत के गृह मंत्री अमित शाह ने 6 अगस्त 2019 को संसद में कहा कि अनुच्छेद-370 में पहले हुए संशोधनों के बाद भी 100 से ज़्यादा ऐसे क़ानून थे जो जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं हो पाये थे. लेकिन अनुच्छेद-370 निष्प्रभावी होने के बाद सूबे में शिक्षा का अधिकार, आरक्षित जनजातियों के ज़मीन से जुड़े अधिकार और आईपीसी (रणबीर पीनल कोड की जगह) जैसे क़ानून लागू हो पाएंगे.
यह बात सही है कि अब तक जम्मू-कश्मीर का अपना अलग संविधान था, जिसका काम नवंबर, 1956 में पूरा हुआ था और 26 जनवरी, 1957 को राज्य में विशेष संविधान लागू कर दिया गया था. अनुच्छेद-370 के तहत जम्मू-कश्मीर के संविधान को पूरी मान्यता प्राप्त थी.
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दावा: दोहरी नागरिकता के कारण कश्मीरी लोग पाकिस्तान आते-जाते थे
सच: अनुच्छेद-370 और 35A के प्रावधानों के तहत जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासियों को कुछ विशेष अधिकार ज़रूर प्राप्त थे लेकिन उनके पास दोहरी नागरिकता नहीं थी और ना ही जम्मू-कश्मीर के लोग अन्य भारतीयों की तरह बिना वैध वीज़ा प्राप्त किये पाकिस्तान आ-जा सकते थे.
भारत प्रशासित कश्मीर से आने वाले सभी कश्मीरी भारत के नागरिक हैं. उनके पास सामान्य भारतीय पासपोर्ट होता है.
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दावा: सिर्फ़ कश्मीर ऐसा राज्य जहाँ भारत के लोग ज़मीन नहीं ले सकते थे
सच: भारत में ऐसे कई राज्य हैं जिन्हें ऐसा विशेषाधिकार प्राप्त है.
संविधान विशेषज्ञ कुमार मिहिर ने बीबीसी को बताया कि "भारत में कुछ आदिवासी बहुल इलाकों और कुछ अन्य राज्यों (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पूर्वी भारत के कुछ इलाकों) में इस तरह के प्रावधान हैं कि अन्य राज्य के व्यक्ति वहां तमाम शर्तों के साथ सीमित मात्रा में ही ज़मीन खरीद सकते हैं. लेकिन जम्मू कश्मीर में अब हर कोई ज़मीन खरीद सकेगा. उन्हें परमानेंट रेज़िडेंट न होने के कारण इससे वंचित नहीं किया जाएगा."
अनुच्छेद-370 के निष्प्रभावी होने से पहले संविधान की धारा 35A के तहत दूसरे राज्य के लोगों पर जम्मू-कश्मीर में ज़मीन ख़रीदने की रोक थी. वो जम्मू-कश्मीर में ज़मीन ख़रीदकर बस नहीं सकते थे और ना ही ज़मीन ख़रीदकर उद्योग लगा सकते थे.
दावा: कश्मीर में आरटीआई एक्ट लागू नहीं था
सच: महाराष्ट्र की तर्ज़ पर जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने साल 2004 में राज्य का आरटीआई क़ानून पास कर दिया था. लेकिन साल 2005 में जब केंद्र सरकार ने सेंट्रल आरटीआई एक्ट पास किया तो जम्मू-कश्मीर के केंद्रीय दफ़्तरों पर इसे लागू करने में दो साल का अतिरिक्त समय लगा.
इसलिए यह कहना कि अनुच्छेद-370 के कारण राज्य में आरटीआई क़ानून लागू नहीं था, ग़लत है.
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दावा: अनुच्छेद-370 के कारण कुछ लोग वोटिंग से थे वंचित
सच: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 अगस्त को टीवी के माध्यम से देश को संबोधित करते हुए कहा कि "हमारे देश का लोकतंत्र इतना मज़बूत है मगर आप यह जानकर चौंक जाएंगे कि जम्मू-कश्मीर में दशकों से हज़ारों-लाखों की संख्या में ऐसे भाई-बहन रह रहे हैं जिन्हें लोकसभा के चुनाव में तो वोट डालने का अधिकार था मगर वे विधानसभा, पंचायत और नगर पालिका आदि के लिए न तो वोट डाल सकते थे न ही लड़ सकते थे. क्या इन लोगों के साथ ऐसे ही अन्याय चलता रहता?"
मोदी ने ज़ोर देकर कहा कि ऐसा सिर्फ़ अनुच्छेद-370 के कारण था और कहा कि हिंदुस्तान के हर राज्य में उन्हें सब अधिकार हैं, मगर जम्मू-कश्मीर में नहीं.
यहाँ पीएम मोदी 1947 में बंटवारे के समय पश्चिमी पाकिस्तान से भारत आये शरणार्थियों की बात कर रहे थे. जम्मू मण्डल के कठुआ और राजौरी ज़िले में रह रहे इन शरणार्थी परिवारों को अब तक जम्मू-कश्मीर के विधानसभा, पंचायत और नगर पालिका के चुनावों में वोट डालने का अधिकार नहीं था.
साल 2017 में छपी एक मीडिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि जम्मू-कश्मीर में 32,000 ऐसे परिवार हैं जो पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से भारत आये और 20,000 ऐसे परिवार हैं जिन्होंने पश्चिमी पाकिस्तान से आकर भारत में शरण ली. लेकिन सिर्फ़ पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से आये शरणार्थियों को विधानसभा और लोकसभा में वोट देने का अधिकार दिया गया.

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