सुषमा स्वराज ने जब एक हफ़्ते में कन्नड़ सीखी

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरू से बीबीसी हिंदी के लिए
पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को भारत के राजनीतिक इतिहास में हमेशा एक ऐसी शख़्स के रूप में भी याद किया जाएगा जिन्होंने विदेशी मूल की राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ सबसे तीखा चुनावी अभियान चलाया था.
साल 1999 के लोकसभा चुनाव में कर्नाटक के बेल्लारी संसदीय क्षेत्र में सुषमा स्वराज ने सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा और वहां 'स्वदेशी बनाम विदेशी' का मुद्दा खड़ा हुआ.
उन्हीं के शब्दों में कहा जाए तो ये चुनावी अभियान किसी 'मिशन' से कम नहीं था. ये बात ख़ुद उन्होंने इस रिपोर्टर से कही थी.
उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि लोग क्यों एक 'विदेशी' को वोट देंगे और उन्होंने बेल्लारी के वोटरों से अपील की थी कि वो 'स्वदेशी' को चुनें.
असल में इसी मुद्दे की वजह से इस चुनाव में नामांकन भरना भी बहुत गोपनीय और किसी फ़िल्म के रोमांच जैसा बन गया था.
कांग्रेस ने पहले ये सूचना दी कि सोनिया गांधी आंध्र प्रदेश के कुड्डापाह से चुनाव लड़ेंगी. लेकिन जब हर कोई वहां उनका इंतज़ार कर रहा था, सोनिया नामांकन भरने के लिए बेल्लारी पहुंच गईं.
इसके एक दिन बाद सुषमा स्वराज को अटल बिहारी वाजपेयी की ओर से हरी झंडी मिली. दिलचस्प ये है कि उसी दिन नामांकन का आख़िरी दिन था.
बीजेपी के मीडिया कोआर्डिनेटर एमवी श्रीधर बताते हैं, "जाक्कूर के हेलिपैड से उन्होंने हेलिकॉप्टर से बेल्लारी के लिए उड़ान भरी और मैं उनके नामांकन का बी फॉर्म लेकर वहां पहुंचा."

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चुनाव हारीं लेकिन दिल जीता
जिस दिन सुषमा बेल्लारी पहुंचीं उसी दिन से उन्होंने चुनाव प्रचार शुरू कर दिया. एक ऐसा क्षेत्र जो कांग्रेस का गढ़ माना जाता था, जहां हार जीत का अंतर भी लाखों में होता था, वहां उन्होंने वोटरों पर अपनी छाप छोड़ी.
लेकिन सुषमा यहां महज 56,100 वोटों से हारीं, तब उन्होंने कहा था, "मैं भले ही युद्ध हार गई लेकिन ये लड़ाई मेरे नाम रही."
उनका चुनावी अभियान विदेशी मूल तक ही सीमित नहीं रहा. जब कांग्रेस नीत यूपीए की सरकार बनने वाली थी, सुषमा ने विदेशी मूल के मुद्दे पर सोनिया के ख़िलाफ़ अभियान जारी रखा.
सुषमा ने धमकी दी कि 60 साल की आज़ादी के बाद अगर हम प्रधानमंत्री पद के लिए एक विदेशी को चुनते हैं तो 'मैं अपना सिर मुंड़वा लूंगी और एक सफ़ेद साड़ी पहनूंगी.'
इसका मतलब ये होता कि 100 करोड़ लोग एक हिंदुस्तानी भी चुन पाने में अक्षम हैं. ये लोगों की भावनाओं पर चोट भी थी.
जब सोनिया गांधी ने 2004 में प्रधानमंत्री बनने से इनकार किया और अपनी जगह डॉ मनमोहन सिंह के नाम को आगे बढ़ाया तो सुषमा स्वराज इस बात को स्वीकार करने वाली पहली शख़्स थीं कि सोनिया ने उस प्रचार अभियान की हवा निकाल दी.

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कन्नड़ और खनन दिग्गज रेड्डी बंधुओं से रिश्ता
उनकी टिप्पणियां उन्हें बाक़ी राजनेताओं से अलग करती थीं. लेकिन बेल्लारी चुनाव एक और बात के लिए जाना जाएगा. उन्होंने स्थानीय वोटरों और उभरते हुए जनार्दन रेड्डी के साथ तालमेल बिठाया.
जितनी तेज़ी से उन्होंने कन्नड़ सीखी उससे बीजेपी के कर्नाटक के नेता भी दंग थे.
उनके पहले प्रस्तावक डॉ बीके श्रीनिवास मूर्ति ने बताया, "कन्नड़ सीखने में उन्हें महज एक हफ़्ता लगा. उनके कहने पर मैंने एक व्यक्ति की व्यवस्था की. वो स्थानीय कॉलेज में कन्नड़ पढ़ाते थे. सुषमा हर दिन चुनाव प्रचार ख़त्म करने के बाद 45 मिनट कन्नड़ सीखने पर समय देती थीं."
पेशे से डॉक्टर मूर्ति बताते हैं, "वो हिंदी मे लिखतीं और फिर पूछतीं कि उच्चारण सही है या नहीं. उन्होंने कभी भी मेरे परिवार के सदस्यों से अंग्रेज़ी में बात नहीं की."
जिस दिन अटल बिहारी वाजपेयी बेल्लारी में उनके लिए चुनाव प्रचार करने पहुंचे, सुषमा ने परिचयात्मक टिप्पणी के बाद पूरे 20 मिनट का भाषण कन्नड़ में ही दिया.
उन्हें सुनने के लिए भारी संख्या में लोगों की भीड़ आई थी. वाजपेयी की तरह वे लोग भी दंग थे.
असल में उनका आत्मविश्वास इतना था कि अपने चुनावी प्रचार के दौरान उन्होंने इस रिपोर्टर से खुद कहा था कि वो किस भाषा में बात करें कन्नड़, हिंदी या अंग्रेज़ी में.
चुनाव प्रचार के दौरान उनके साथ रहने वाले बीजेपी वर्कर प्रदीप पाई कहते हैं, "भाषाएं सीखने में उनकी रुचि थी. प्रचार के दौरान हम उन्हें देवनागरी में कुछ बिंदु दे देते थे और वो इसे बड़ी कुशलता से इस्तेमाल करती थीं."
अपने 18 दिनों के चुनाव प्रचार में सुषमा डॉ मूर्ति के घर पर ही रुकी रहीं और परिवार मे हरेक के साथ उनके बड़े आत्मीय संबंध बन गए थे. हर साल वो वारामहालक्ष्मी पूजा के लिए बेल्लारी आती थीं.
मूर्ति बताते हैं, "वो सबसे पहले पूजा में हिस्सा लेने के लिए मेरे घर आती थीं और इसके बाद जनार्दन रेड्डी के घर जाती थीं."
वरामहालक्ष्मी पूजा शादी शुदा औरतें अपने परिवार के कल्याण के लिए करती हैं.

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रेड्डी और श्रीमुलू की 'ताई'
साल 1999 से लेकर 2012 तक सुषमा को बेल्लारी में देखा जा सकता था. इसके बाद रेड्डी बंधुओं का ग़ैरक़ानूनी खनन घोटाला सामने आया और लोक आयुक्त जस्टिस संतोष कुमार हेगड़े की रिपोर्ट के बाद जनरार्दन रेड्डी को जेल भेजा गया.
जनार्दन रेड्डी और उनके क़रीबी बी श्रीरामुलू के लिए सुषमा 'ताई' थीं. बेल्लारी चुनाव प्रचार में सुषमा स्वराज के क़रीबी के नाते ही ये दोनों महत्वपूर्ण बनकर उभरे.
ये जगजाहिर है कि 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा के कैबिनेट में रेड्डी को लाने के पीछे सुषमा का ही दबाव था.
सोनिया गांधी के लिए सीट खाली करने वाले केसी कोंडैया ने बीबीसी को बताया, "साल 2004-2010 के बीच रेड्डी व्यापक पैमाने पर ग़ैरक़ानूनी खनन में लिप्त थे. ये वही वक़्त है जब रेड्डी अपनी पार्टी के सांसदों को ख़रीदना चाहते थे और सुषमा को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे. उन्हें ग़ैरक़ानूनी खनन की जानकारी रही होगी लेकिन जब रेड्डी जेल चले गए तो सुषमा ने बेल्लारी और रेड्डी से दूर बना ली."
मूर्ति कहते हैं, "हमने महज चार दिन पहले उनसे बात की थी और पूछा कि क्या वो इस साल के वारामहालक्ष्मी पूजा पर आ आएंगी. उन्होंने बताया था कि वो आने में असमर्थ थीं."
वारामहालक्ष्मी का त्यौहार कल यानी शुक्रवार को है.
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