भारत को नुक़सान पहुंचा पाएगा पाकिस्तान?

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- Author, मानसी दाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की अध्यक्षता में राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की एक अहम बैठक बुधवार को हुई जिसमें जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म करने के भारत सरकार के फ़ैसले पर चर्चा हुई.
पाकिस्तान सरकार की इस बैठक में विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री, गृह मंत्री समेत सेना और ख़ुफ़िया एजेंसियों के अधिकारी भी मौजूद थे. पाक सरकार ने बैठक का एक वीडियो ट्विटर पर जारी किया और साथ ही लिखा कि भारत सरकार का क़दम एकतरफ़ा और ग़ैरक़ानूनी है.
पाकिस्तान ने कहा, "वो भारत के साथ कूटनीतिक रिश्तों का स्तर घटाएगा. भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार को निलंबित करेगा. इस मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले जाएगा."
पाकिस्तान ने ये भी कहा, "पाक के स्वतंत्रता दिवस 14 अगस्त को कश्मीरियों के साथ एकजुटता प्रदर्शित करने के रूप में मनाया जाएगा जबकि भारत के स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को काला दिवस मनाया जाएगा."
पाकिस्तान ने भारत से व्यापारिक संबंध तोड़ने के बाद अपने हवाई क्षेत्र के एक कॉरिडोर को भी बंद कर दिया है.
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'प्रतीकात्मक फ़ैसला'
इस पूरे मामले को लेकर पाकिस्तान बेहद नाराज़ और संजीदा लग रहा है लेकिन उसकी इस घोषणा के मायने आख़िर क्या हैं.
पूर्व राजनयिक शरत सभरवाल इसे एक प्रतीकात्मक क़दम मानते हैं.
वो कहते हैं, "सरकार पब्लिक रिएक्शन का जवाब दे रही है. पिछले दो दिन में उन्हें अपना जवाब तय करने में ही दिक़्क़त हो रही थी. सरकार और विपक्ष में भी कोई एकता नज़र नहीं आ रही थी. जहां तक व्यापार की बात है तो पुलवामा हमले और बालाकोट के बाद उनके निर्यात पर हमने दो सौ प्रतिशत ड्यूटी बढ़ा दी थी. मुझे लगता है भारत के उनके निर्यात बहुत कम हो गए होंगे. हालांकि भारतीय निर्यातकों को थोड़ी दिक़्क़त ज़रूर होगी. लेकिन पाकिस्तान को भी होगी, क्योंकि वो सामान कहीं दूर से मंगाएंगे तो उनकी अर्थव्यवस्था को भी नुक़सान पहुंचेगा."
पूर्व राजनयिक विवेक काटजू कहते हैं कि भारत को पाकिस्तान के इन क़दमों से कोई नुक़सान तो नहीं होगा लेकिन पाकिस्तान इस क़दम से दोनों देशों के बिगड़ते रिश्तों की तरफ़ अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचना चाहता है.
विवेक काटजू कहते हैं, "पाकिस्तान चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत-पाकिस्तान रिश्तों में हस्तक्षेप करे और कश्मीर के मामले में मध्यस्थता भारत को किसी तरह से स्वीकार करवाए. वो परंपरागत रूप से यही चाहता है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय जानता है कि भारत इसे कभी क़ुबूल नहीं करेगा. जो क़दम उसने उठाए हैं वो प्रत्यक्ष हैं. पाकिस्तान अप्रत्यक्ष क़दम भी उठाएगा, ताकि किसी न किसी तरह घाटी में स्थिति सामान्य ना हो पाए."

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इस मुद्दे पर पाकिस्तान कितना आगे बढ़ने की स्थिति में है, पाकिस्तान में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार हारून रशीद कहते हैं, "कूटनीतिक संबंधों में कटौती की जा रही है, पता नहीं इसका कितना असर होगा क्योंकि पहले ही दोनों देशों के बीच कोई प्रभावी कूटनीतिक संबंध नहीं हैं."
उनका कहना है कि भारत से सस्ते टमाटर या प्याज़ आने से पाकिस्तानी अवाम को राहत मिल जाती थी लेकिन अब वो राहत ख़त्म हो जाएगी.
'अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचने की कोशिश'
पाकिस्तान की ओर से जारी बयान में ये भी कहा है कि प्रधानमंत्री ने सेना को सतर्क रहने के आदेश दिए हैं. लेकिन ख़ुद पाकिस्तान आर्थिक तंगी के हालात से गुज़र रहा है और ये उसके लिए बड़ी चिंता का सबब है.
हारून रशीद कहते हैं, "सेना को अलर्ट इसलिए किया गया है कि भारत में कुछ ऐसे बयान आए हैं कि वो पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर को भी लेने की कोशिश करेंगे. उन बयानों को देखते हुए एहतियातन ये अलर्ट जारी किया गया है. जनता के दबाव में पाकिस्तानी सरकार ये काम कर रही है."
महीने भर पहले पाक रुपया ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर आ गया था और उसका विदेशी मुद्रा भंडार भी कम हो रहा है. सरकार को हाल में स्वैच्छिक कटौती की घोषणा भी करनी पड़ी थी.
ऐसे में भारत के ख़िलाफ़ पाकिस्तान की स्थिति कितनी मज़बूत नज़र आती है? वरिष्ठ पत्रकार सीमा मुस्तफ़ा इसमें पाकिस्तान की एक रणनीति देखती हैं.
वो कहती हैं, "अगर वो कोई सैन्य कार्रवाई करते हैं, तो वो इसलिए नहीं करेंगे कि वो जीते या हारें या हम उनके दो जहाज़ गिरा दें. क्योंकि हम लोग ज़्यादा मज़बूत स्थिति में हैं. लेकिन वो इसलिए करेंगे कि दुनियाभर का ध्यान उनकी ओर जाए. साथ-साथ ये भी है कि पाकिस्तान चुप नहीं रह सकता है, क्योंकि उन्होंने कश्मीर को पिछले 70 साल से एक बहुत भावनात्मक मुद्दा बनाया हुआ है. और अगर वो कोई ठोस कार्रवाई नहीं करते तो इमरान ख़ान का ख़ुद का और उनके सैन्य प्रमुख का भविष्य सवालों के घेरे में आ जाएगा. वो क्या करेंगे ये हम नहीं कह सकते."
कश्मीर के मसले पर बीते दो दिनों से पाकिस्तान में लगातार बैठकें जारी हैं और अपनी नाराज़गी दिखाने में भी पाकिस्तान ने कोई कमी नहीं बरती है.
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संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की स्थायी प्रतिनिधि मलीहा लोधी ने बुधवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा काउंसिल की सदस्य जोआना रोनेका से चर्चा की. देर रात संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार के प्रवक्ता ने बयान जारी कर भारत प्रशासित कश्मीर के हालात पर चिंता जताई.
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रवक्ता ने कहा, "भारत प्रशासित कश्मीर के ताज़ा हालात और मानवाधिकारों के हनन की स्थिति को लेकर हम चिंतित हैं. हम देख रहे हैं कि वहां मोबाइल और फ़ोन सेवाएं बंद कर दी गई हैं. कथित तौर पर नेताओं को नज़रबंद किया गया है और धारा 144 लगाई गई है."
"इस तरह की रोक से भारत प्रशासित कश्मीर के लोग और उनके चुने हुए प्रतिनिधियों के जम्मू-कश्मीर के भविष्य पर चर्चा करने के अधिकार से वंचित हो जाएंगे. भारत प्रशासित कश्मीर से कोई ख़बर बाहर नहीं आ रही है और ये गंभीर चिंता का विषय है."
इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान कश्मीर मामले पर पहले भी संयुक्त राष्ट्र का रुख़ कर चुका है लेकिन इससे कोई मुकम्मल हल नहीं निकल पाया.
चीन ने लद्दाख़ से सटी अपनी सीमा को लेकर कड़ा बयान दिया है लेकिन कश्मीर या पाकिस्तान से सटी भारत की सीमा के मामले में भारत और पाकिस्तान को संयम बरतने के लिए कहा है.

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ये माना जा सकता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पाकिस्तान को उम्मीदें भी काफ़ी हैं लेकिन क्या उसकी उम्मीदें पूरी होती दिखती हैं.
अंतररष्ट्रीय मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार मनोज जोशी कहते हैं, "जहां तक कश्मीर का सवाल है चीन की स्थिति भी यही रही है. 1963 में चीन और पाकिस्तान के बीच समझौता हुआ था, उसमें भी ये स्पष्ट कर दिया गया है कि कश्मीर का जो मसला है, वो आख़िर में जब भारत और पाकिस्तान में समझौता हो जाएगा, उसके अंतर्गत, उसी समझौते में ये कहा गया है कि इसका अंतिम निर्धारण तभी होगा, जब भारत और पाकिस्तान मिलकर कश्मीर का समझौता करेंगे. यानी चीन भी ये मानता है कि ये भारत और पाकिस्तान के बीच का मुद्दा है."
ये स्पष्ट है कि कश्मीर के दशकों पुराने मुद्दे पर एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव गहरा रहा है, इस बार इसके समाधान के लिए दोनों पड़ोसी एक दूसरे की तरफ़ हाथ बढ़ाएंगे इस बात के आसार फ़िलहाल दिखाई नहीं देते.
ये पूरा मामला अब किस दिशा में आगे बढ़ेगा और दोनों देशों का रुख़ क्या रहेगा इसके लिए हमें कुछ इंतज़ार करना होगा.
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