कश्मीरः अफ़रातफ़री के बीच ज़रूरत के सामान स्टोर कर रहे हैं लोग

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- Author, आदर्श राठौर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्या वाक़ई भारत प्रशासित कश्मीर में ऐसे हालात पैदा हो गए हैं जो 90 के दशक से भी बदतर हैं जब आए दिन होने वाली चरमपंथी घटनाओं और मुठभेड़ों के कारण घाटी में दहशत का माहौल था?
ये सवाल स्थानीय राजनीतिक दल और विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने उठाए हैं. कांग्रेस नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद ने शनिवार को कहा कि ऐसे हालात पहले कभी नहीं पैदा हुए. उनका कहना था- 'आज के हालात 1990 की याद दिला रहे हैं.'
पिछले कुछ दिनों में यहां अतिरिक्त सुरक्षाबलों की तैनाती से चिंतित लोगों की बेचैनी उस समय और बढ़ गई, जब प्रशासन ने अमरनाथ यात्रियों और पर्यटकों को राज्य छोड़ने की सलाह दे दी.
पहले इस मामले में जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रीय दल नेशनल कॉन्फ़्रेंस और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने ही खुलकर चिंता ज़ाहिर की थी मगर शनिवार को कांग्रेस ने भी प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके सवाल खड़े किए.
शुक्रवार को पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा था कि 'वह घाटी में ऐसा ख़ौफ देख रही हैं, जैसा उन्होंने पहले कभी नहीं देखा.'
राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ़्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने शनिवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाई और कहा कि 'केंद्र सरकार को संसद में इसका जवाब देना चाहिए कि कश्मीर में तनाव की स्थिति क्यों है.'
इस बीच जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक की ओर से बयान आया कि उन्हें किसी संवैधानिक प्रावधान में बदलाव की ख़बर नहीं है.
राजभवन की ओर से जारी बयान में कहा गया कि अर्धसैनिक बलों की अतिरिक्त तैनाती केवल सुरक्षा कारणों से की जा रही है. मगर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने दोपहर बाद प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके घाटी के हालात पर चिंता जताई और अमरनाथ यात्रा को रोकने के दिशा-निर्देश जारी करने की निंदा की.
यह समझने के लिए कि आख़िर घाटी में क्या चल रहा है, हमने बात की जम्मू-कश्मीर और ख़ासकर भारत प्रशासित कश्मीर के घटनाक्रम को लंबे समय से कवर कर रहे पत्रकारों से.

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क्या हो रहा है घाटी में
श्रीनगर में मौजूद बीबीसी संवाददाता रियाज़ मसरूर बताते हैं कि सरकार की ओर से अडवाइज़री मिलने के बाद लोगों में हड़बड़ी मच गई. लोग इस आशंका से भर गए कि शायद कश्मीर में एक-दो महीने के लिए बंद जैसे हालात बन सकते हैं. इससे लोग ज़रूरत के सामान को जमा करने में जुट गए.
रियाज़ कहते हैं, "मैंने देखा कि लोग गाड़ियों में तो तेल भर रहे थे, प्लास्टिक के डब्बों में भी पेट्रोल भर रहे थे. राशन की दुकानों से लेकर हर जगह भीड़ थी. एटीएम में कैश ख़त्म हो गया और हाहाकार सी मची हुई थी."
दरअसल अडवाइज़री में यह भी कहा गया था कि यहां जो पर्यटक हैं उन्हें भी निकलना चाहिए. ऐसे में शनिवार को घाटी में बाहर से आए लोगों का निकलना जारी रहा.
प्रशासन ने बसों को एनआईटी तक जाने की इजाज़त दी थी. लोग सड़क और हवाई मार्ग दोनों तरीक़ों से लौट रहे थे. एयरपोर्ट पर भीड़ ज़्यादा हो गई थी क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में वहां लोगों को कभी नहीं संभाला गया.
रियाज़ मसरूर कहते हैं कि अडवाइज़री में जो "तुरंत" शब्द का ज़िक्र किया गया था, उससे लोगों को लगा कि कोई बड़ा संकट आने वाला है. वह कहते हैं कि घाटी में "ऐतिहासिक अनिश्चितता' देखने को मिल रही है.
वह बताते हैं, "जो लोग यहीं रहते हैं और जिन्हें कहीं नहीं जाना है, वो भी चिंतित हैं. उन्हें लगता है कि दो महीने के लिए बंद की स्थिति पैदा होती है तो दवाइयों और ज़रूरत के अन्य सामानों का इंतज़ाम कहां होगा. उनके सामने दूसरी चुनौती मानसिक थी कि बच्चों या बुज़ुर्गों को कैसे समझाएं कि सब ठीक है. कश्मीरी इस घटनाक्रम के शुरू होने से ही चिंता में हैं कि आज की रात बीतेगी और अगला दिन निकलेगा तो स्थिति कैसी होगी. ऐतिहासिक अनिश्चितता फैली हुई है."
रियाज़ का कहना है कि 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान भी ऐसा ख़ौफ़ नहीं था. वह कह रहे हैं, "सुरक्षा बलों की मुस्तैदी बढ़ गई है. इतने सुरक्षा बल हैं कि उन्हें ठहराने तक में दिक्क़त हो रही है. अधिकारी भी परेशान हैं, उन्हें देर रात तक रुकना पड़ रहा है."
राज्यपाल कह रहे हैं कि वह दिल्ली के संपर्क में हैं और सिर्फ़ ख़तरे के कारण यात्रा को रोका गया. मगर जिस तरह का माहौल है, जैसी तैयारी है, उसे लेकर न तो दिल्ली से कुछ जानकारी मिल रही है न स्थानीय प्रशासन से.
रियाज़ कहते हैं, "जैसा देखने को मिल रहा है, उससे कोई भी सामान्य समझ रखने वाला अंदाज़ा लगा सकता है कि कुछ बड़ा होने वाला है."

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1990 की वो सर्दियां
जम्मू-कश्मीर की राजनीति और यहां चल रहे संघर्ष को लंबे अरसे तक नज़दीक से कवर कर चुकीं जम्मू में रहने वाली वरिष्ठ पत्रकार अनुराधा भसीन बताती हैं कि आज घाटी में पैदा हुआ माहौल उस दौर की याद दिलाता है जब जगमोहन ने राज्यपाल के तौर पर प्रशासन संभाला था.
यह 1990 की सर्दियों का दौर था जब चरमपंथ नियंत्रण से बाहर होता जा रहा था. अनुराधा बताती हैं, "जिस तरह से यहां से लोगों को निकलने के लिए कहा जा रहा है, ऐसा पिछले 30 सालों में देखने को नहीं मिला है. हां, 1990 की जनवरी में ज़रूर ऐसा कुछ देखने को मिला था. उसके बाद के नरसंहार और क्रैकडाउन की घटनाएं इतिहास में दर्ज हैं."
वो मौजूदा हालात को चिंताजनक बताते हुए कहती हैं कि 90 के उस दौर में तो चरमपंथ बहुत ज़्यादा था मगर अब तो सरकार ख़ुद दावा करती रही है कि उसने इसे लगभग ख़त्म कर दिया है. वह मानती हैं कि इस हलचल के पीछे कोई बड़ा बदलाव करने की कोशिश हो सकती है.
उन्होंने कहा, "अमरनाथ यात्रा 20 सालों में कभी बाधित नहीं हुई. 90 के दशक में हरकत उल अंसार संगठन ने हमले की धमकी दी थी. उसके बाद 2008, 2018 और 2016 में घाटी में प्रदर्शनों का दौर चला मगर फिर भी यात्रा में अड़चन नहीं आई. फिर अब क्यों यात्रा रोक दी गई?"
अनुराधा कहती हैं कि यहां पर जो माहौल बना है वह सरकार के कदमों के कारण ही बना है और वह स्पष्ट भी नहीं कर रही कि इसके पीछे कारण क्या है.

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व्यापक हिंसा की आशंका
श्रीनगर के वरिष्ठ पत्रकार अल्ताफ़ हुसैन भी मौजूदा हालात के पीछे सुरक्षा का हवाला दिए जाने के तर्क पर यक़ीन करने को थोड़ा मुश्किल मानते हैं.
वह कहते हैं, "30 साल मैंने इस संघर्ष को कवर किया है. एक दौर था जब यहां एक समय पर तीन हज़ार चरमपंथी सक्रिय रहते थे. अगर साल में 500-600 मारे भी जाते थे तो उतने ही नए आ जाते थे. आज सक्रिय चरमपंथियों की संख्या अधिक से अधिक 300 होगी. बेशक पुलवामा की घटना हुई मगर एक दौर था जब यहां दिन में 30 तक घटनाएं हो जाती थीं हमलों की. आज 20 दिन में होती हैं. यहां चरमपंथ बड़ा ख़तरा नहीं है."
अल्ताफ़ बताते हैं कि इस संघर्ष के साथ नया पहलू जुड़ गया है और वह है किशोरों का जुड़ जाना. वह बताते हैं कि कुछ जगहों पर हुई मुठभेड़ों में ऐसा भी हुआ है कि अगर चार चरमपंथी मारे गए तो साथ में कुछ आम नागरिक भी मारे गए. तो एक तरह से इसे लेकर भी लोग उठ खड़े हुए.
अल्ताफ ने कहा, "जिस नागरिक के पास बंदूक नहीं है, वह पत्थर लेकर सुरक्षा बलों के सामने आ जाता है. यानी संघर्ष का चेहरा बदल गया है. तो ऐसे माहौल में अगर सरकार कुछ करती है तो इसका विरोध होना तय है. ज़रूरी नहीं कि तुरंत हो, मगर जैसे ही लोगों को मौक़ा मिलेगा, वे बाहर निकलेंगे और फिर वे वापस मुश्किल से बैठेंगे."
अल्ताफ़ सुझाव देते हैं, "मेरी राय है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहें तो अटल बिहारी वाजपेयी की राह पर चलकर शांति के लिए बहुत बड़ा योगदान दे सकते हैं. लेकिन वह आक्रामक नीति अपनाते हैं तो उससे या तो कश्मीर का दमन हो जाएगा या फिर भारत को नुक़सान होगा."
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