एनआरसी से जुड़ा तनाव असम में लोगों को आत्महत्या के लिए मज़बूर कर रहा है?- बीबीसी विशेष

    • Author, प्रियंका दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, असम से लौटकर

असम के बंगाईगांव ज़िले का डुमेरगुरी गांव जुलाई की बारिश में डूबा हुआ है. यहां के निवासी अब्दुल जैनल के परिजनों का दुख जैसे लगातार होती बरसात और झींगुरों के अनवरत स्वरों में घुलकर पूरी ब्रह्मपुत्र घाटी में फैल गया है.

चार जुलाई की रात अब्दुल ने अपने घर से कुछ ही दूर एक पेड़ पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. परिवार का कहना है कि उन्होंने असम में तैयार हो रही एनआरसी लिस्ट या नेशनल रेजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न्स में नाम न आने से जुड़े तनाव की वजह से अपनी जान ले ली.

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इमेज कैप्शन, जैनल की पत्नी महेला खातून

अपनी जान गंवाने वाले जैनल अकेले नहीं हैं. हालांकि एनआरसी से जुड़े तनाव के कारण हो रही आत्महत्याओं का कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन मानवाधिकार पर काम कर रही सामाजिक संस्थाओं की रिपोर्टों के अनुसार 2016 से लेकर अब तक असम में 50 से ज़्यादा लोग नागरिकता से जुड़े तनावों के कारण ख़ुदकुशी कर चुके हैं.

जुलाई में बीबीसी टीम की असम यात्रा के दौरान ही 13 दिनों के भीतर छह लोगों के आत्महत्या करने की ख़बर आई.

फ़िलहाल एनआरसी की अंतिम लिस्ट के प्रकाशन को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 31 अगस्त तक के लिए टाल दिया गया है. अंतिम सूची के प्रकाशन के बाद असम में हालात और नाज़ुक होने की आशंका है.

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इमेज कैप्शन, बंगाईगांव स्थित जैनल का घर

दिल्ली से 1,800 किलोमीटर दूर डुमेरगुरी से गुज़रने वाली 'आइ' नदी ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों में से एक है. 'आइ' नदी डुमेरगुरी गांव को दो हिस्सों में बांटती है. डुमेरगुरी- पार्ट टू के नाम से पहचाने जाने वाले गाँव में जैनल अली का परिवार रहता है. यहाँ तक जाने के लिए नाव ही एक मात्र साधन है.

नदी पार करने के बाद तक़रीबन आधे घंटे का दलदल भरा कच्चा रास्ता पैदल पार करके हम जैनल के घर पहुँचते हैं.

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इमेज कैप्शन, जैनल की चप्पल

अनिश्चितता के आसपास उपजता व्यवसाय

बांस और टीनशेड से बने जैनल के एक कमरे वाले घर में उदासी पसरी हुई थी. घर की फ़र्श पर बैठी जैनल की पत्नी और उनके पाँच बच्चों की माँ, 40 वर्षीय महेला खातून की आँखों में उतरा दुख जैसे ब्रह्मपुत्र से भी गहरा था.

महेला शुरू के दस मिनट ख़ामोशी से रोती हैं. फिर एक लंबी स्थिर चुप्पी के बाद कहती हैं, "नदी पार एनआरसी सेवा केंद्र के आसपास ही कहीं एक दिन मेरे पति को एक दलाल मिला था. उस दलाल ने मेरे पति से कहा कि अगर वह पैसों का इंतज़ाम कर सकें तो वह दलाल उनका नाम एनआरसी की लिस्ट में शामिल करवा देगा."

वो कहती हैं, "मेरे पति ने उसका भरोसा कर लिया और बड़ी मुश्किल से कुछ पैसों का जुगाड़ करके उसे एक छोटी रक़म भी दी, लेकिन फिर वह और पैसे मांगने लगा. आसपास के लोग भी उसने कहते कि एनआरसी लिस्ट में नाम नहीं आने पर हम सबकी ज़िंदगी ख़राब हो जाएगी."

जैनल के मामले से यह साफ़ हो जाता है कि कुछ स्थानीय लोग आम जनता को झूठे आश्वासन देकर एनआरसी से जुड़ी अनिश्चितता को पैसे कमाने के मौक़े में तब्दील करने का प्रयास कर रहे हैं.

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इमेज कैप्शन, डुमेरगुरी गांव

ख़ुदकुशी की वो रात...

महेला आगे बताती हैं, "पैसों के इंतज़ाम को लेकर वह परेशान रहने लगे. रात दिन यही सोचते रहते कि एनआरसी में नाम आएगा या नहीं और दिल ही दिल में घुटते रहते. ख़ुदकुशी से एक रात पहले उन्होंने मुझसे कहा था कि अगर पैसों का इंतज़ाम नहीं हो पाया तो उन्हें कोई निर्णय लेना पड़ेगा."

"उनकी बात सुनकर मैं डर गई थी. मैंने उनसे कहा कि बचपन में जब वो खो जाते थे तो उनके भाई उन्हें गांव से ढूँढ कर ले आते थे. लेकिन अब अगर वो कहीं चले गए तो उन्हें कौन ढूँढेगा."

"मैंने उनसे पूछा कि उनके बैगर मेरा और बच्चों का क्या होगा. उन्होंने सिर्फ़ खुदा का वास्ता दिया और सो गए. लेकिन उस रात मैं ठीक से नहीं सोई. मुझे आभास था की वो कहीं चले न जाएँ, इसलिए आधी रात तक तो मैं जाग कर उन्हें देखती रही, लेकिन इसके बाद मुझे नींद आ गई."

"सुबह सुबह अजान के वक़्त मेरी आँख खुली तो मैंने देखा घर का दरवाज़ा खुला था और वो कहीं नहीं थे. मैंने बच्चों को जगाया और पड़ोसियों को बुलाया. सबने उन्हें ढूँढना शुरू किया. फिर कुछ ही देर में बच्चों ने मुझे आकार बताया कि उन्होंने घर के सामने बने पेड़ पर लटककर ख़ुदकुशी कर ली है."

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इमेज कैप्शन, जैनल के बड़े भाई अब्दुल ख़ालिक़

ख़ुदकुशी से एक रात पहले जैनल ने अपने बड़े भाई अब्दुल ख़ालिक़ से भी फ़ोन पर बात की थी. अब्दुल को जैनल की बेचैनी तो महसूस हुई लेकिन वह जैनल के भीतर पल रहे तनाव की गंभीरता को भांप नहीं सके.

एनआरसी के काग़ज़ात दिखाते हुए वह कहते हैं, "ख़ुदकुशी से पिछली रात जब उसने मुझे फ़ोन किया तो उसकी बातों में ख़ौफ़ था. मैंने उसे समझाया कि वो लोगों की बातों पर ध्यान न दे. मैंने यह भी कहा कि हमारे पास काग़ज़ात है तो हमें यहां से कौन निकलागा? हम सिर्फ़ एनआरसी की फ़ाइनल लिस्ट के आने का इंतज़ार कर रहे हैं."

भाई अब्दुल ख़ालिक़ ने फ़ोन पर जैनल से कहा, "मुझे विश्वास है कि उसमें हम सबका नाम है क्योंकि हमारे पास पूरे पक्के कागजात हैं. तो हम क्यों डरें? मुझे सुप्रीम कोर्ट तक भी जाना पड़ा तो मैं जाऊँगा और साबित करके आऊँगा कि मैं असम का क़ानूनी नागरिक हूं. मुझे लगा था कि जैनल को मेरी बात समझ में आ गई है लेकिन मैं ग़लत था."

वीडियो कैप्शन, NRC से असम के लोगों में क्यों हैं खौफ़?

निरोधबरन दास की कहानी

जैनल और महेला के घर से क़रीब 200 किलोमीटर दूर, असम के दरांग ज़िले में रहने वाली 32 वर्षीय निरुपमा दास आज भी अपने पिता निरोधबरन दास की आत्महत्या के सदमे से उबर नहीं पाई हैं.

दरांग ज़िले के खरपेटिया क़स्बे में रहने वाले 68 वर्षीय निरोधबरन दास क्षेत्र के मशहूर शिक्षक और वक़ील थे. लेकिन परिवार के अनुसार बीते साल एनआरसी लिस्ट में अपने नाम के आगे 'डी' या डाउटफुल वोटर लिखा देखकर उन्हें गहरा सदमा पहुंचा.

बेटी निरुपमा बताती हैं, "शहर के सभी बड़े और इज़्ज़तदार लोग उनकी मदद को तैयार थे. उनके पुराने दोस्त और साथी ख़ुद उनके साथ कभी कलेक्टर, तो कभी एसपी से लेकर एनआरसी के दफ़्तर तक के चक्कर लगाते थे. उन्होंने सब जगह अर्ज़ियां दी, काग़ज़ तो थे ही हमारे पास. मेरे पिताजी वक़ील थे और यहां के स्कूलों में लंबे समय तक पढ़ा कर रिटायर हुए थे. इसलिए उन्होंने ख़ुद को 'डी' वोटर बताए जाने को अपनी प्रतिष्ठा पर एक दाग़ की तरह लिया. फिर, इतनी भागदौड़ करने के बाद भी उनका नाम एनआरसी में नहीं आया. इसी बात से वो परेशान रहते थे. लेकिन हमने कभी नहीं सोचा था कि अपनी परेशानी में वो इतना बड़ा क़दम उठा लेंगे."

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इमेज कैप्शन, निरोधबरन की पत्नी रमा

'काग़ज़ होने के बावजूद शक किया गया'

निरोधबरन की पत्नी रमा अपने पति के आख़िरी दिनों को याद करते हुए बताती हैं, "लिस्ट में नाम नहीं आने के बाद से ही वो परेशान रहने लगे थे. उनके चेहरे की हँसी चली गई थी. न ठीक से खाते पीते और न ही ठीक से सो पाते. सिर्फ़ चिंता करते रहते. मैं उन्हें बहुत समझाती कि कोई बात नहीं, लिस्ट में नाम नहीं आया तो क्या हुआ? कुछ न कुछ कर लेंगे. लाखों लोगों का नाम लिस्ट में नहीं आया है, हम अकेले नहीं हैं."

"लेकिन उनको जैसे धक्का लग गया था. सारे काग़ज़ होने के बावजूद उनपर शक किया गया. जहाँ जन्मे, जहाँ पले-बढ़े... जिस मिट्टी पर हमने ज़िंदगी गुज़ार दी... वहां इस उम्र में आकर जब बताया जाएगा कि यह हमारी मिट्टी ही नहीं, तब इंसान क्या करेगा? उन्हें लगा जैसे समाज के सामने उनकी सालों की बनाई इज़्ज़त कम हो गई हो?"

अपनी रोती हुई माँ को संभालते हुए निरुपमा आगे कहती हैं, "उस दिन वो रोज़ की तरह सुबह 4 बजे उठे और उठकर अपना पूजा पाठ किया. फिर रोज़ की तरह सुबह की वॉक पर निकल गए. लेकिन सुबह की सैर से वापस आकर उन्होंने घर की बैठक में खुद को फांसी लगा ली. सरकार को किसी को भी नोटिस भेजने से पहले सोच समझ लेना चाहिए. क्योंकि एनआरसी के एक नोटिस से इंसान की ज़िंदगी तितर-बितर हो जाती है."

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इमेज कैप्शन, खरपेटिया में निरोधबरन का घर

पुलिस का क्या है कहना?

इस बारे में सरकार का पक्ष जानने के लिए बीबीसी ने हर संबंधित ज़िले के उच्चतम पुलिस अधिकारियों से लेकर गृह मंत्रालय तक से सम्पर्क किया लेकिन सभी ने कैमरे पर बात करने से इनकार कर दिया.

कैमरे के पीछे सभी पुलिस अधिकारियों ने एनआरसी की वजह से हो रही आत्महत्याओं को नकारते हुए कहा कि यह आत्महत्याएं निजी कारणों से हो रही हैं.

लेकिन पीड़ित परिवारों के साथ काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता शाहजहाँ प्रशासन की इसी उदासीनता तो असम में बढ़ रही आत्महत्यों के लिए ज़िम्मेदार मानते हैं.

बीबीसी से बातचीत में वे कहते हैं, "जिन लोगों का नाम लिस्ट में नहीं है, उनका टेंशन अब बहुत बढ़ गया है. एनआरसी की प्रक्रिया में इस स्टेप के बाद फ़ौरन ट्रायब्यूनल में ख़ुद को नागरिक साबित करने के लिए बहुत से काग़ज़ात जमा करने पड़ते हैं. उन्हें वक़ील के लिए पैसा भी चाहिए. जिनके पास इतने साधन नहीं है वह आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं. प्रशासन की उदासीनता की वजह से स्थिति और ख़राब हो रही है."

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असम में बरसात अब भी अनवरत जारी है. बरसाती धुंध के हटने के साथ-साथ यहां अब सभी को 31 अगस्त को प्रकाशित होने वाली एनआरसी की अंतिम सूची का इंतज़ार है.

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