असम: एनआरसी में नाम न होने से ग़ुस्से में हैं सैकड़ों हिंदीभाषी

एनआरसी, असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर

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    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिंदी के लिए

असम में बीते 30 जुलाई को प्रकाशित की गई एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की फ़ाइनल सूची में जिन 40 लाख लोगों को भारतीय नागरिक नहीं माना गया है, उनमें सैकड़ों लोग हिंदी भाषी भी है.

ये हिंदीभाषी वो लोग हैं, जिनका दावा है कि वर्षों पहले उनके बाप-दादा राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से असम में आकर बस गए थे.

सोमवार को जारी की गई एनआरसी की फ़ाइनल सूची में इन हिंदी भाषी लोगों का नाम नहीं आने से इनकी नागरिकता सवालों के घेरे में आ गई है. जबकि असम में एनआरसी को अपडेट करने का मकसद था यहां कथित तौर पर बांग्लादेश से आए बांग्ला बोलने वाले हिंदू और मुसलमानों की शिनाख़्त करना.

यही कारण था कि असम समझौते की शर्तों के अनुसार 25 मार्च 1971 को आधार वर्ष बनाया गया. ताकि इस तिथि के बाद असम आए लोगों की पहचान की जा सके. क्योंकि इसके अगले दिन बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) के आज़ाद होने की घोषणा हुई थी. 26 मार्च 1971 को बांग्लादेश को एक अलग राष्ट्र घोषित कर दिया गया था.

दरअसल, आज़ादी के बाद भारत में पूरे राष्ट्र के लिए 1951 में एक संपूर्ण एनआरसी बनाई गई थी. लेकिन असम में 1971 के बाद कथित तौर पर हुई घुसपैठ के ख़िलाफ़ यहां के स्वदेशी संगठनों ने आवाज़ उठाई और देखते ही देखते राज्य में व्यापक स्तर पर अवैध विदेशी नागरिकों को खदेड़ने के लिए असमिया जाति के लोगों ने गोलबंद होना शुरू कर दिया.

वर्ष 1979 से लगातार छह साल चले असम आंदोलन ने पूरे देश का ध्यान अपनी और खींचा. असम आंदोलन में 855 आंदोलनकारी मारे गए. इस तरह साल 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और आंदोलनकारियों के बीच असम समझौता हुआ और इसी समझौते की शर्तों के अनुसार राज्य में घुसपैठियों की शिनाख़्त कर उन्हें देश से बाहर निकालने का निर्णय हुआ.

इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले कई आंदोलनकारी छात्र नेता रातों-रात प्रदेश के मुख्यमंत्री-मंत्री बन गए, लेकिन इस समझौते को लागू करवाने में 33 साल लग गए. लिहाजा कई बार असम समझौते की प्रासंगिकता पर सवाल भी उठे.

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सरकारी लापरवाही

इस तरह 30 जुलाई को जारी की गई एनआरसी की फ़ाइनल सूची में अब कई कमियां सामने आने लगी हैं, भारतीय नागरिकता से जुड़ा ये मुद्दा अब और पेचीदा होता नज़र आ रहा है. क्योंकि सालों से यहां बसे हिंदी भाषी लोगों का नाम वैध सूची में शामिल नहीं किए जाने ये लोग न केवल परेशान हैं, बल्कि आगे की कार्रवाई को लेकर चिंतित भी हैं.

असम में राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश से आकर बसे लोगों का इतिहास क़रीब 300 साल पुराना है. एनआरसी की फ़ाइनल सूची में अपने परिवार का नाम शामिल नहीं होने से गुवाहाटी के अशोक अग्रवाल बेहद नाराज़ हैं.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "मेरे पिता 1959 में राजस्थान के सीकर ज़िले से आकर असम के बरपथार में बसे थे. हमने अपने पिता की लिगेसी डेटा के आधार एनआरसी का आवेदन भरा था लेकिन आश्चर्य की बात है सारे काग़ज़ात जमा कराने के बाद मेरा नाम फ़ाइनल सूची में आ गया, लेकिन मेरे पिता का नाम नहीं आया. इस तरह मेरे बेटे का नाम भी एनआरसी में नहीं आया. जबकि हमने अपने पिता वाली कॉलम में सही नाम भरा था. इससे साफ़ पता चलता है कि अधिकारियों ने कितनी लापरवाही से यह काम किया है. यही है सरकारी काम जिसका कोई मालिक नहीं होता."

कुछ ऐसी ही नाराज़गी जताते हुए डिब्रूगढ़ शहर में सालों से रह रहे राजस्थान मूल के निरंजन बगड़िया कहते है, "असम में हमारी यह चौथी पीढ़ी है. मेरे दादा जी क़रीब 100 साल पहले असम में आकर बसे थे. पहले हम डिकम के पास एक चाय बागान में रहते थे. वहां हमारा पुश्तैनी व्यापार था. इसके बाद 1972 में हमारा परिवार डिब्रूगढ़ शहर में शिफ्ट हो गया. हम बहुत पुराने लोग हैं. एनआरसी के लिए आवेदन करते वक्त हमने सारे पुराने काग़ज़ात जमा करवाए थे, लेकिन किसी का नाम एनआरसी की फ़ाइनल सूची में नहीं आया है. केवल मेरी एक बहू का नाम इसमें शामिल हुआ है."

नागरिकता पर सवाल उठने से परेशान बगड़िया कहते हैं, "अपने ही देश में मेरी नागरिकता को साबित करने के लिए जो कुछ करना पड़ रहा है, इससे दुखद और क्या हो सकता है. मैं काफ़ी परेशान हूं और मुझे फिर से सारे काग़ज़ात लेकर एनआरसी में नाम शामिल करने के लिए चक्कर काटने पड़ेंगे. सरकार को सोचने की ज़रूरत है कि वो किन लोगों से नागरिकता साबित करने को कह रही है. जबकि ये पूरा मुद्दा विदेशी घुसपैठियों का है."

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बिहार से आए लोग भी बेहद परेशान

बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर से सालों पहले असम के धुबरी शहर में आकर बसे लखी नारायण रजक भी एनआरसी को लेकर काफ़ी परेशान हैं.

वो कहते हैं, "हमारा परिवार बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर से यहां आकर बसा है. मेरे पिता का जन्म असम का है. पिताजी का नाम 1951 की एनआरसी में भी है. हम लोगों का नाम तो एनआरसी में आया है, लेकिन हमारी भाभी का नाम नहीं आया. जल्द ही हम बिहार जाकर काग़ज़ निकलवाएंगे और फिर से फ़ॉर्म भरना होगा. क्या बिहारी भी अब देश का नागरिक नहीं रहेगा?"

वो बताते हैं, "हम इस देश के नागरिक हैं, लेकिन एनआरसी कि लिए हमें बहुत परेशान होना पड़ रहा है. हमारे यहां ऐसे कई रिश्तेदार हैं जिनका नाम नहीं आया है. जो लंबे समय से असम में रह रहे हैं."

वो कहते हैं, "अगर हिंदी भाषी की नागरिकता पर कोई शक करेगा, उसे परेशान करेगा तो लोग कहां जाएंगे. बिहार जाकर वहां कई दिन रहकर काग़ज़ निकालना पड़ेगा. इसके लिए पैसा भी तो चाहिए. एनआरसी का काम कर रहे अफ़सर कहते हैं कि बिहार-यूपी से काग़ज़ का वेरिफिकेशन नहीं हो रहा है. इसमें हमारी क्या ग़लती है. वेरिफिकेशन करवाने का काम तो सरकार का है."

साल 2011 की जनगणना के अनुसार असम में 21 लाख हिंदी भाषी लोग रहते हैं. इनमें राजस्थान से आए लोगों की संख्या क़रीब सात लाख बताई जाती है.

असम में बसे राजस्थान मूल के लोगों के सबसे पुराने संगठन पूर्वोत्तर प्रदेशीय मारवाड़ी सम्मेलन के प्रादेशिक अध्यक्ष मधुसूदन सीकरिया कहते हैं, "एनआरसी की सूची जारी होने के बाद हमारे संगठन से काफ़ी लोगों ने संपर्क किया है और इस आधार पर हमारा अनुमान है कि तक़रीबन 15 से 20 फ़ीसदी लोगों का नाम एनआरसी की फ़ाइनल सूची में नहीं आया है. ऐसी भी जानकारी समाज के लोगों से मिल रही है कि 100 साल पुराने हो चुके कुछ लोगों का नाम भी एनआरसी में शामिल नहीं किया गया है. ये इतने पुराने परिवार हैं जिन्हें असम में राय बहादुर की उपाधि मिली हुई है."

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आगे उनका संगठन किस तरह से इन लोगों की मदद करेगा, इस पर सीकरिया कहते हैं, "हम लोगों की मदद करेंगे और उनके सारे काग़ज़ात लेकर सरकार से संपर्क करेंगे. असम में राजस्थानी लोगों का इतिहास 300 सौ साल पुराना है. वो कैसे अवैध नागरिक हो सकते हैं? राजस्थान के लोगों ने असम के विकास में काफ़ी योगदान दिया है. लोगों ने अपनी संपूर्ण जानकारी एनआरसी के आवेदन के साथ जमा करवाई है फिर भी उनका नाम नहीं आना बड़ी परेशानी की बात हैं. ऐसे भी लोग हैं जो राजस्थान जाकर अपने काग़ज़ात लाए हैं और यहां जमा कराए हैं. फिर भी उनका नाम नहीं आया."

राजस्थानी मूल के लोगों के इतिहास का पता इस बात से चलता है कि प्रदेश में कई ऐसे क़स्बे है जहां राजस्थान के लोगों द्वारा बनाए हुए सालों पुराने स्कूल-कॉलेज आज भी चल रहे हैं.

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असम में वर्षों से रह रहे राजस्थान मूल के वरिष्ठ पत्रकार विनोद रिंगानिया कहते हैं, "राजस्थानी मूल के लोगों ने असम में लगभग 1870 से आना शुरू किया था और 1920 के बाद काफ़ी बड़ी संख्या में राजस्थान के लोग यहां आ गए. असम में करीब 7 लाख राजस्थानी लोग होंगे जिन्हें मारवाड़ी भी कहा जाता हैं. असम के साहित्य और संस्कृति में ज्योति प्रसाद आगरवाला का बहुत बड़ा योगदान रहा. उनके परदादा राजस्थान से असम आए थे. यूं कहे कि जब हिंदी सिनेमा जन्म ले रहा था उस समय ज्योति प्रसाद आगरवाला ने यहां असमिया सिनेमा बनाया था. असम में आज उनका वैसा ही सम्मान है जैसा कि बंगाल में रवींद्रनाथ टैगोर का है. लिहाजा राजस्थान मूल के लोगों का नाम एनआरसी में शामिल नहीं करना हैरानी की बात है."

हालांकि भारत सरकार ने कहा है जिन लोगों का नाम एनआरसी सूची में नहीं आया, उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने का एक और मौक़ा दिया जाएगा. लेकिन जिस कदर हिंदी भाषी लोग अपनी नागरिकता को लेकर नाराज़ है उससे एनआरसी को अंजाम तक पहुंचाने वाले अफ़सरों की भूमिका पर सवाल ज़रूर खड़े हो गए हैं.

वकील हाफ़िज़ रशीद अहमद

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गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील हाफ़िज़ रशीद अहमद चौधरी का कहना है कि एनआरसी का ज़मीनी स्तर पर काम किस तरह हुआ है, यह तो सुप्रीम कोर्ट ने नहीं देखा है. कुछ अफ़सरों की लापरवाही के चलते आज भारत के मूल नागरिकों के सामने इतनी बड़ी परेशानी खड़ी हो गई है, जहां एक वास्तविक नागरिक को अब एनआरसी सेवा केंद्र में न जाने कितने चक्कर काटने पड़ेंगे.

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