मोदी ने अपने पहले विदेश दौरे के लिए मालदीव को क्यों चुना?

- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मालदीव से
शाम होने को है और हरे-नीले समंदर की लहरें तेज़ और ऊँची हो रही हैं.
हम मालदीव की राजधानी माले के बोडुथाकुरुफ़ानु मागु इलाक़े के बीच फ्रंट पर खड़े एक भारतीय का इंतज़ार कर रहे हैं.
बगल की जेट्टी पर दर्जनों स्टीमर समंदर के बीच में बसे एक दूसरे द्वीप से लोगों को लाते-ले जाते रहते हैं.
उस पार मालदीव का हवाई अड्डा है जहाँ पिछले दो दिनों से भारतीय वायु सेना के मालवाहक विमानों की आवाजाही बढ़ी है.
इसी बीच एक आवाज़ सुनाई दी, "आप ही भारत से आए हैं?".
ख़ुशबू अली भारत के मुरादाबाद शहर के रहने वाले हैं जहाँ से वह दिल्ली के लक्ष्मीनगर इलाक़े में बस गए थे. काम की तलाश उन्हें मालदीव तक ली आई.
उन्होंने बताया, "पेशे से एसी मेकैनिक हूँ, उधर हवाई अड्डे के पास कुछ फ़ॉल्ट रिपेयर करने गया था".

भौगोलिक और जनसंख्या की नज़र से मालदीव एशिया का सबसे छोटा देश है.
हालाँकि देश की कुल आबादी क़रीब पाँच लाख है लेकिन आमदनी का असल ज़रिया पर्यटन हैं क्योंकि सालाना दस लाख से भी ज़्यादा पर्यटक यहाँ पहुँचते हैं.
मालदीव में भारतीय मूल के लोगों की तादाद तीस हज़ार के आस-पास है लेकिन सामरिक दृष्टि से भारत के लिए मालदीव बहुत क़ीमती है.

ख़ुशबू अली ने बताया, "यहाँ सब बोलते हैं कि इंडियंस ने बहुत हेल्प की है मालदीव की पहले से, अभी भी कर रहा है. लेकिन काम के बारे में थोड़ा ज़्यादा बेहतर हो सकता है. बारह घंटे का ड्यूटी है इधर, अच्छा नहीं है थोड़ा कम होना चाहिए. थोड़ा सैलरी भी कम है इंडियन आदमी का, टेक्नीशियन का, लेबर का. थोड़ा ज़्यादा होना चाहिए".
मैंने पूछा, "शनिवार को प्रधानमंत्री मोदी आ रहे हैं, पता है."
जवाब मिला, "क्यों नहीं पता होगा. अब देखिए यात्रा से क्या निकलता है."
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मालदीव ही क्यों?
लगातार दूसरी बार आम चुनाव जीतने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा के लिए मालदीव को चुना है.
नरेंद्र मोदी ने अपनी दूसरे शपथ ग्रहण समारोह में पिछली बार की तरह दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के नहीं बल्कि बिमस्टेक देशों के समूह के नेताओं को बुलाया जिसमें थाईलैंड और म्यांमार जैसे मुल्क शामिल हैं, लेकिन मालदीव इसमें नहीं है.
ज़ाहिर है, भारतीय विदेश नीति को अंजाम देने वालों के मन में ये बात रही होगी कि ये क़दम कहीं मालदीव को खटक न जाए.
मालदीव की दक्षिण एशिया और अरब सागर में जो स्ट्रेटेजिक (सामरिक) लोकेशन है वो भारत के लिए अब पहले से कहीं ज़्यादा अहम है.
मालदीव में भारतीय राजदूत संजय सुधीर भी इस बात से इत्तेफ़ाक रखते हैं.

बीबीसी से हुई ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा, "मालदीव हमारी 'नेबरहुड फ़र्स्ट' पॉलिसी का बड़ा हिस्सा है. हमारा जितना भी तेल और गैस का एक्सपोर्ट मध्य-पूर्व से आता है उसका बहुत बड़ा हिस्सा ए डिग्री चैनल, यानी मालदीव के बग़ल से होकर गुज़रता है. साथ ही, बहुत ज़रूरी है भारतीय महासागर के इस इलाक़े में पीस-स्टेबिलिटी रहे. उसके साथ-साथ इंडिया मालदीव में एक भरोसेबंद डिवेलपमेंट पार्टनर की भूमिका भी निभाता है."
भारतीय विदेश सचिव विजय गोखले ने भी इस बात पर ज़ोर दिया था कि, "प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान विकास और सुरक्षा संबंधी कुछ अहम समझौते होंगे".
मालदीव को प्रधानमंत्री की पहली विदेश यात्रा के लिए चुने जाने के पीछे चीन भी एक बड़ा कारण बताया जाता है.
चीन ने पिछले एक दशक से हिंद महासागर में अपना वर्चस्व बढ़ने की मुहिम तेज़ कर रखी है. श्रीलंका को इस कड़ी का पहला हिस्सा बताया जाता है जिसके बाद उसका ध्यान मालदीव पर भी रहा है.
व्यापार, आर्थिक मदद और इन्फ्रास्ट्रक्चर प्लान के ज़रिए चीन इन देशों में तेज़ी से अपना पांव ज़माने में कुछ हद तक कामयाब भी रहा है.
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हालाँकि ये दोनों देश चीन के मुक़ाबले न सिर्फ़ भौगोलिक दृष्टि से बल्कि सांस्कृतिक और छोटे-व्यापारों के मद्देनज़र भारत के ज़्यादा क़रीब रहे हैं.
लेकिन मालदीव पर भारत का प्रभाव कुछ वर्षों के लिए थोड़ा धीमा पड़ गया था.
2013 से 2018 के दौरान यहाँ की अब्दुल्ला यामीन सरकार ने कई ऐसे क़दम उठाए जो भारत को रास नहीं आए थे. इसमें प्रमुख था चीन से नज़दीकियाँ.
मालदीव में भारत के पूर्व राजदूत गुरजीत सिंह भी इस बात को मानते हैं.
उन्होंने कहा, "अगर सभी सार्क देशों की बात की जाए तो पिछले कई वर्षों में पाकिस्तान के बाद मालदीव ही वो देश था जिसके साथ भारत के संबंध ख़ासे खराब हो गए थे. इसलिए ये यात्रा एकदम सही समय पर हो रही है".

बदलाव का असर
मालदीव में 2018 के चुनावों में सत्ता परिवर्तन हुआ और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह के शपथ ग्रहण में आकर एक कूटनीतिक संदेश दिया.
इसके जवाब में राष्ट्रपति सोलिह ने पिछले साल के दिसंबर महीने में भारत की आधिकारिक यात्रा की जिसमें बड़े व्यापारिक समझौते भी हुए.
उस यात्रा के समापन के पहले भारत की चैन की साँस को प्रधानमंत्री मोदी के इन शब्दों से समझा जा सकता है, "आपकी इस यात्रा से आपसी भरोसे और दोस्ती की झलक मिलती है जिन पर भारत-मालदीव संबंध आधारित हैं".
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माहौल
बहरहाल, पिछले कुछ दिनों से मालदीव की राजधानी माले को सजाने-सँवारने का काम जारी है.

सड़कों की सफ़ाई और इमारतों को चमकाने का काम जारी है.
पिछले आठ वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की ये पहली आधिकारिक यात्रा जो है.
दोनों देशों के झंडे सड़कों के इर्द-गिर्द गाड़ दिए गए हैं और सड़कों पर पहरा बढ़ चुका है.
माले के एक मशहूर होटल में मुलाक़ात कोलकाता से नौकरी करने आए अमित कुमार मंडल से हुई जो पीएम मोदी की यात्रा को लेकर ख़ासे उत्साहित दिखे.
उन्होंने कहा, "दूसरी सरकार आने के बाद स्थिति बहुत अच्छी है यहाँ और नरेंद्र मोदी भी आ रहे हैं कल. हम लोगों के लिए अच्छा ही है. पहले हम लोग का स्कोप नहीं था इधर, उस हिसाब से ठीक है, पहले से बेहतर है".
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