मालदीव से भारत के उखड़ते पैर कितने नुकसानदेह

भारत और मालदीव

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    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

जून के पहले हफ़्ते के मंगलवार को मालदीव में सत्ताधारी पार्टी के सांसद अहमद निहान को चेन्नई के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से वापस भेज दिया गया.

मालदीव के अख़बार मालदीव इंडिपेंडेंट का दावा है कि निहान इलाज के लिए भारत पहुंचे थे, लेकिन चेन्नई हवाई अड्डे पर ही राजनयिक पासपोर्ट से जुड़ी पूछताछ के बाद सुरक्षाबलों ने उन्हें वापस भेज दिया गया.

मालदीव इंडिपेंडेंट के मुताबिक़ निहान ने कहा कि अगर भारत का पड़ोसी देशों के प्रति यह नीतिगत रवैया है तो इससे कुछ भी हासिल नहीं होने जा रहा.

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निहान ने अपने देश के स्थानीय मीडिया से कहा, ''मुझसे पूछा गया कि राजनयिक पासपोर्ट कहां से मिला. मैंने उनसे कहा कि मैं सांसद हूं. उन्होंने फिर पार्टी का नाम पूछा तो मैंने बताया- प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ़ मालदीव. इसके बाद उन्होंने और पूछताछ की बात कही.''

भारत में मालदीव के राजदूत अमहद मोहम्मद ने मिहारू अख़बार से इस मामले में कहा है कि उन्होंने इसे लेकर विदेश मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. हालांकि इस मामले में भारत की तरफ़ से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है.

भारत और मालदीव के बीच बिगड़ते रिश्तों का यह सबसे ताज़ा मामला है.

मोहम्मद निहान

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इमेज कैप्शन, मालदीव की सत्ताधारी पार्टी सांसद अहमद निहान

लगातार क्यों बिगड़ रहे हैं संबंध?

इससे पहले मालदीव ने भारत से उपहार स्वरूप मिले दो नेवी हेलिकॉप्टर को वापस ले जाने के लिए कहा था. भारत ने मालदीव को ये हेलिकॉप्टर राहत बचाव कार्य के लिए दिए थे. मालदीव दोनों हेलिकॉप्टर का नवीनीकरण नहीं कराना चाहता है और जून के आख़िर तक भारत से इसे ले जाने का वक़्त दिया है.

इसी महीने के इन घटनाक्रमों से अंदाज़ा लगाया जा सकता है दोनों देशों के रिश्तों में किस कदर कड़वाहट आई है. मालदीव इंडिपेंडेंट का कहना है कि मालदीव में चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण रिश्तों दरार लगातार बढ़ती जा रही है.

मालदीव इंडिपेंडेंट में दोनों देशों के बिगड़ते संबंधों पर 'मालदीव-इंडिया बाय भाई' शीर्षक से एक रिपोर्ट छपी है.

इस रिपोर्ट का कहना है, ''भारतीय फ़िल्म, फैशन, फूड की लोकप्रियता मालदीव में किसी से छुपी नहीं है. भारतीय शहर तिरुवनंतपुरम माले के क़रीब है. दसियों हज़ार मालदीव के नागरिक हर साल भारत जाते हैं. ख़ास कर इलाज के लिए भारत इनका सबसे पसंदीदा ठिकाना है. इस छोटे से द्वीप समूह की सुरक्षा में भारत की अहम भूमिका रही है. 1988 में राजीव गांधी ने सेना भेजकर मौमून अब्दुल गयूम की सरकार को बचाया था. हाल ही में जब मालदीव के लोग पेय जल की समस्या से जूझ रहे थे तो प्रधानमंत्री मोदी ने पानी भेजा था.''

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क्यों बदले हालात?

पर अब हालात बदल गए हैं. इस अख़बार का कहना है कि राजनीतिक मोर्चे पर मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन को चीन ज़्यादा रास आ रहा है. मालदीव टाइम्स के मुताबिक़ इसकी शुरुआत राष्ट्रपति मोहम्मद वहीद के कार्यकाल में ही शुरू हो गई थी.

वहीद ने भारतीय कंपनी जीएमआर से 511 अरब डॉलर की लागत से विकसित होने वाले अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की डील को रद्द कर दिया था. उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि भारत मालदीव के आंतरिक मामलों में दख़ल दे रहा है. ऐसा तब है जब मोहम्मद वहीद की सरकार मनमोहन सिंह ने ही मान्यता दी थी.

भारत के लिए सबसे ज़्यादा चिंताजनक बात तो यह रही कि पाकिस्तानी सेना की तरफ़ से घोषणा की गई कि पाकिस्तानी युद्धपोत मालदीव के एक्सक्लूसिव इकनॉमिक ज़ोन की देखरेख करेंगे. कई अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक इस बात को मानते हैं कि मालदीव में पाकिस्तान की एंट्री चीनी हितों को साधने के लिए है.

जेएनएयू में दक्षिण एशियाई अध्ययन केंद्र की प्रोफ़ेसर सविता पांडे को लगता है कि मालदीव से रिश्ते ख़राब ज़रूर हो रहे हैं, लेकिन पूरी तरह से कभी ख़त्म नहीं होंगे. वो मानती हैं कि मालदीव कई मामलों में भारत पर निर्भर है.

हालांकि पांडे मानती हैं कि श्रीलंका के बाद अब मालदीव भी चीन के क़र्ज़ के जाल में फंसता जा रहा है. सविता पांडे के मुताबिक मालदीव पर कुल क़र्ज़ का 70 फ़ीसदी क़र्ज चीन का है, इसलिए मालदीव का चीन की तरफ़ झुकना चौंकाता नहीं है.

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कड़वाहट की शुरुआत

भारत और मालदीव के रिश्तों में इस साल सबसे ज़्यादा कड़वाहट आई है. इसकी शुरुआत मालदीव के सुप्रीम कोर्ट के एक फ़रवरी के फ़ैसले से हो गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया था कि राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने विपक्ष के नेताओं को क़ैद करवाकर संविधान और अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन किया है.

कोर्ट ने यह भी आदेश दिया था कि सरकार पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद समेत सभी विपक्षी नेताओं को रिहा करे. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने मानने से इनकार कर दिया.

इसके साथ ही यामीन ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी थी. यह आपातकाल 45 दिनों तक चला. भारत ने इस आपातकाल का विरोध किया था. भारत ने कहा था कि मालदीव में सभी संवैधानिक संस्थाओं को बहाल करना चाहिए और आपातकाल को तत्काल ख़त्म करना चाहिए.

मोहम्मद नाशीद

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चीन जमा रहा पैर

मालदीव में नाटकीय राजनीतिक संकट भारत और चीन दोनों के लिए परेशान करने वाला था. इसी संकट के बीच यामीन ने चीन, पाकिस्तान और सऊदी अरब में अपने दूत भेजे. इसके बाद चीन ने चेतावनी दी कि मालदीव के आंतरिक मामले में किसी भी देश को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसमें रचनात्मक भूमिका अदा करे.

चीन ने कहा कि किसी भी सूरत में मालदीव की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं होना चाहिए. दूसरी तरफ़ मालदीव के विपक्षी नेता नाशीद चाहते थे कि भारत मदद करे.

वो भारत से सैन्य हस्तक्षेप की भी उम्मीद कर रहे थे ताकि जजों को हिरासत से मुक्त कराया जा सके. नाशीद ने अमरीका से भी मदद की गुहार लगाई.

इस गतिरोध के बीच समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एक चीनी न्यूज़ वेबसाइट के हवाले से बताया कि चीन युद्धपोत मालदीव की तरफ़ बढ़ गए हैं. भारतीय नेवी ने भी इस बात की पुष्टि की कि चीनी युद्धपोत सुंदा और लोंबोक जलडमरुमध्य से आगे बढ़ रहे हैं.

हालांकि चीनी युद्धपोत की हिंद महासागर में तैनाती कोई नहीं बात नहीं है. चीन का जिबुती में पहले से ही एक सैन्य ठिकाना है.

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मालदीव में चीन का पहुंचना भारत के क़रीब आना

चीन के लिए मालदीव सामरिक रूप से काफ़ी अहम ठिकाना है. मालदीव रणनीतिक रूप से जिस समुद्री ऊंचाई पर है वो काफ़ी अहम है. चीन की मालदीव में मौजूदगी हिंद महासागर में उसकी रणनीति का हिस्सा है. 2016 में मालदीव ने चीनी कंपनी को एक द्वीप 50 सालों की लीज महज 40 लाख डॉलर में दे दिया था.

दूसरी तरफ़ भारत के लिए भी मालदीव कम महत्वपूर्ण नहीं है. मालदीव भारत के बिल्कुल पास में है और वहां चीन पैर जमाता है तो भारत के लिए चिंतित होना लाज़मी है. भारत के लक्षद्वीप से मालदीव क़रीबी 700 किलोमीटर दूर है और भारत के मुख्य भूभाग से 1200 किलोमीटर.

विपरीत हालात में मालदीव से चीन का नई दिल्ली पहुंचना काफ़ी आसान हो जाएगा. मालदीव ने चीन के साथ फ्री ट्रेड अग्रीमेंट किया है. यह भी भारत के लिए हैरान करने वाला क़दम था. इससे साफ़ होता है कि मालदीव भारत से कितना दूर हुआ है और चीन से कितना क़रीब.

मालदीव चीन और पाकिस्तान की महत्वाकांक्षी योजना वन बेल्ट वन रोड का भी खुलकर समर्थन कर रहा है. अगर भारत मालदीव में अपनी खोई साख वापस करने में नाकाम रहता है तो दक्षिण एशिया के बाक़ी छोटे देशों में भी चीन का प्रभाव बढ़ेगा.

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