भाषाओं की उलझन सियासत ने पैदा की है वो क्या सुलझाएगी?

हिन्दी

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    • Author, अजित वडनेरकर
    • पदनाम, भाषाशास्त्री और वरिष्ठ पत्रकार

हंगामे के बाद नई शिक्षा नीति के मसौदे से हिंदी शब्द हटा दिया गया है. भाषाएँ हमेशा से ही सामूहिक अस्मिता से जुड़ी रही हैं और इसे लेकर लोग काफ़ी संवेदनशील होते हैं.

किसी दूसरी भाषा को तरजीह मिलने की आशंका भर से जन-मन अशांत होने लगता है. बोली इतनी महत्वपूर्ण है कि दुनिया भर में बोल-व्यवहार के आधार पर इलाकों की सीमाएँ तय होती हैं, प्रांतों, प्रदेशों के नाम तय होते हैं.

भाषा के सवाल पर ही पाकिस्तान ने बांग्लादेश को गंवा दिया.

कहावत है कि भाषा बहता नीर. यह दिलचस्प है कि भौगोलिक सीमांकन का आधार भी प्रकृति की यही दोनों धाराएं करती हैं, यानी भाषा और नदी. भारत में देखें तो आज़ादी के बाद रियासतों का समन्वय हुआ. उसके उपरान्त 1956 में जब राज्यों का पुनर्गठन हुआ तब देश का वह स्वरूप उभर कर सामने आया जिसमें भाषायी आधार पर राज्य बने.

तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, मराठी, गुजराती से लेकर हिन्दी भाषी राज्यों में भी यह बात नज़र आती है. मसलन, राजस्थान वह प्रदेश है जहाँ की अस्मिता हिंदी से न जुड़कर राजस्थानी से जुड़ती है.

भाषा का सांस्कृतिक-पौराणिक आधार

इसी तरह, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में भी राजस्थानी की तरह ही अनेक भाषाएँ बोली जाती रही हैं. मगर सदियों से समूचे देश को हिन्दुश, हिन्दवी की जो धारा जोड़ती आई, उस सम्पर्क भाषा हिन्दी का इलाका मानते हुए इस समूचे इलाके को इन प्रांतों में तब्दील कर दिया गया.

हिंदी भाषा

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बाद में पंजाब का एक और विभाजन हुआ और उसके हिन्दी भाषी क्षेत्र को हिमाचल प्रदेश के नाम से अलग राज्य का दर्जा मिला. इन तमाम हिन्दीभाषी नए राज्यों में भी अलग-अलग अंचलों की भाषाओं वाले इलाके थे. मिसाल के तौर पर अवध, भोजपुर, मिथिला, मालवा, छत्तीसगढ़, कोशल, महाकोशल, बुंदेलखण्ड, रुहेलखण्ड, जौनसार-बावर, कुमाऊँ, गढ़वाल आदि.

इन सब इलाकों के नामकरण का कुछ न कुछ सांस्कृतिक-पौराणिक आधार ज़रूर रहा है जैसे अवध से अवध्य की बात आती है. मालवा से मल्लों का रिश्ता रहा है. कूर्मांचल से कुमाऊँ बना, भोजपुर के साथ भोज संज्ञा जुड़ती है. मगर आज ये नामकरण सीधे-सीधे भाषा से जुड़ते हैं यानी अवधी बोलने वालों से अवध है या मालवी बोलने वालों से मालवा है.

द्रविड़ भाषी क्षेत्रों में हिन्दी विरोध का मूल आधार आर्य आक्रमण का सिद्धान्त है. भारत में वैसे भी यूरोपीयों का आगमन दक्षिण-पश्चिमी भारत में पहले हुआ उसके बाद यूरोपीय बंगाल पहुँचे. द्रविड़ राजनीति को सदा ही इस विचार से प्रेरणा मिलती रही कि दुष्ट आर्यों ने (जिनकी भाषा वैदिकी, संस्कृत थी, हिन्दी जिसकी वंशबेल है) द्रविड़ों को पराजित कर दक्षिण में धकेल दिया था.

आज़ादी के बाद दक्षिण में हिन्दी का विरोध दरअसल उसी आर्य संस्कृति का प्रतीकात्मक विरोध था, जिसका जिसका आधार आर्य आक्रमण सिद्धान्त था. जातीय गौरव अथवा जातीय अपमान की काल्पनिक कहानियाँ समाज में अशान्ति फैलाने के काम आती हैं. हिन्दी विरोध के मूल में द्रविड़ राजनीति में निहित स्वार्थ के लिए आर्य आक्रमण सिद्धान्त को द्रविड़ों के साथ हुई ज्यादती के तौर पर प्रचारित किया जाता रहा है.

'हिन्दी ना ना, अंग्रेजी हाँ हाँ'

त्रिभाषा फार्मूले के दूसरे सूत्र पर दक्षिण में हमेशा विरोध होता रहा है जिसमें हिन्दी या अंग्रेजी को चुनने की बात है. इसके विरोध में द्रविड़ राजनीति में 'हिंदी नेवर एण्ड इंग्लिश एवर' यानी 'हिन्दी ना ना, अंग्रेजी हाँ हाँ' जैसा दिलचस्प नारा आज तक जारी है लेकिन राजनीति से हट कर अगर देखा जाए तो दक्षिण भारतीयों में हिन्दी के लिए स्वाभाविक ललक है. उत्तर और दक्षिण के बीच आने-जाने-बसने की वजह से भी हिन्दी का देशव्यापी महत्व बना रहा है.

अंग्रेज़ी भाषा

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दक्षिण-उत्तर मिलाप चाहे उत्तर में हो या दक्षिण में, ज़रिया हमेशा हिन्दी ही रही है. आज से एक हज़ार साल पहले शंकर ने अपना देशाटन शुरू किया तो मुख्यतः उत्तर भारत भाषा यानी बहता पानी जो सबको समेटती चलेमें ही भ्रमण किया. उस दौर में निश्चित ही जो भी देश की सम्पर्क भाषा होगी, हिन्दी उसी की वारिस है इसमें किसी को सन्देह नहीं होना चाहिए. काशी में उस दौर में भी द्रविड़ ब्राह्मणों का ठिकाना था. दक्षिण के विद्वानों का उत्तर भारत में बड़ा मान रहा. इसकी वजह भी भाषा ही बनी. संस्कृत और वेद-पुराणों पर उनका ऐसा अधिकार था कि अध्ययन-अध्यापन की दाक्षिणात्य धारा ही उनके नाम हो गई.

पर यह आदान-प्रदान एकतरफ़ा नहीं, दोतरफ़ा रहा है. हैरत होती है कि उत्तराखण्ड के कुमाऊं अंचल में भट्ट, पाठक, दीक्षित, पन्त, पाण्डे उपनामधारी ब्राह्मण दाक्षिणात्य हैं. समझा जाता है कि नवीं-दसवी सदी में ये महाराष्ट्र से उत्तराखण्ड आकर बसे. इसी तरह डिमरी, डोभाल, चमौली, कुकरेती आदि अनेक ब्राह्मणों के उपनाम चाहे पहाड़ी गाँवों से सम्बद्ध हैं, मगर इनके पुरखे भी तमिल, तेलुगू, कन्नड़ भाषी थे. सुदूर दक्षिण से उत्तर के प्रवास के दौरान जिस सूत्र ने इन्हें जोड़े रखा, वह निश्चित ही सम्पर्क भाषा हिन्दी (तत्कालीन संज्ञा जो भी रही हो) ही थी.

पौराणिक स्वरूप

इसी तरह पंचद्रविड़ ब्राह्मणों में एक हव्यक श्रेणी भी है. बताया जाता है कि कुमाऊं के हव्यक ब्राह्मण जो हवन-होम करने में निष्णात थे, नवीं-दसवीं सदी के आसपास कदम्ब वंश के मयूरवर्मन नाम के राजा ने न्योता दिया. आज कर्नाटक में हैवा, हैगा, हविगा, हेगड़े नामधारी ब्राह्मण समुदाय इन्हीं कुमाऊंनी ब्राह्मणों के वारिस हैं. ये लोग संस्कृत तथा अन्य भाषाज्ञान में निष्णात माने जाते रहे. कर्नाटक के शिमोगा जिले में इनकी खासी संख्या है.

यही नहीं, न जाने कितने तेलुगूभाषी वेदपाठी, अग्निहोत्र ब्राह्मण उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में पहुँच कर ऐसे रचे-बसे कि हिन्दी छोड़ ठेठ राजस्थानी, मराठी, बुंदेलखण्डी और तो और भोजपुरी वाले हो गए. ये तमाम लोग बीकानेर, उदयपुर, जोधपुर, जयपुर, झाँसी, सागर, छतरपुर, टीकमगढ़, झाँसी, ग्वालियर, कानपुर से लेकर बनारस, गया और कोलकाता तक मिल जाएँगे.

महाराष्ट्र से लेकर ठेठ तमिलनाडू तक में रहने वाले लोग 150 साल पहले तक सतपुड़ा-विन्ध्य के उत्तर वाले हिस्से को हिन्दुस्तान ही कहा करते थे. बीसवीं सदी की शुरूआत तक हिन्दी के लिए हिन्दुस्तानी शब्द ही आम था. उर्दू या हिन्दी का फ़र्क़ तो आज़ादी के बाद ज्यादा बढ़ा. इससे हटकर उर्दू या हिन्दी जैसे शब्दों की अहमियत साहित्य की दुनिया में थी. बतौर भाषा, हिन्दुस्तानी का अर्थ हिन्दी न होकर वह भाषा थी जो उर्दू से अलग नहीं थी.

भाषा

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भाषा में शब्दों की समानता

दक्षिण भारतीय भाषाओं- तमिल, कन्नड़, मलयालम, मराठी, तेलुगू अथवा कोंकणी, गुजराती में अनेक अरबी शब्द घुले-मिले हैं. हिन्दी में फ़ारसी के अधिक और अरबी के अपेक्षाकृत कम शब्द है. थोड़ा और साफ़ करें तो यह कि हिन्दी में जो अरबी शब्द हैं, उनका फ़ारसीकरण हो चुका है, इसलिए ख़ालिस अरबी शब्दों की संख्या शुद्ध अरबी की तुलना में कम है. हिन्दी की तुलना में मराठी में अरबी-फारसी की रचबस ज्यादा दिखती है.

यह जानकर ताज्जुब हो सकता है कि हिन्दी में अरबी-फ़ारसी शब्दों की कुल संख्या शायद 15 हज़ार से ज्यादा न हो, मगर एक अध्ययन के मुताबिक मराठी में यह संख्या हिन्दी के दुगने से भी ज्यादा बताई जाती है. अन्तर यही है कि हिन्दी में विदेशी शब्दों को जस का तस बरतने पर जोर रहता है, वहीं मराठी में उसे अपने अनुकूल ढाल लिया जाता है. जैसे ब्राह्मणों का एक पदनाम है फड़नीस. यह मूलतः फ़र्द-नवीस (लेखा-जोखा रखने वाला) था.

अरबी का तफह्हुस हिन्दी के लिए अनजान है मगर मराठी में यह तपास बनकर विराजमान है जिसका अर्थ है चौकसी या परख करना. तमिल, कन्नड़, तेलुगू में भी अरबी-फ़ारसी की यह रचबस देखने को मिलती है जैसे तमिल का रप्पिलव्वल दरअसल यह रबीउलअव्वल है.

दक्षिणी भाषाओं में अरबी शब्दों की आमद पर ग़ौर करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यहाँ उत्तर भारत की तुलना में अरबी और इस्लाम पहले पहुँचे. यही नहीं, दक्षिण की तमाम भाषाओं का अगर इस नज़रिये से अध्ययन किया जाए तो शायद पता चलेगा कि मध्ययुगीन अरबी के अनेक शब्द इन भाषाओं में सुरक्षित हैं. जो हिन्दी में अत्यल्प या लगभग नहीं बोले जाते.

कहने का आशय यही कि दक्षिण में भाषाओं को लेकर पूर्वग्रह नहीं है. यूँ किसी भी भाषायी समाज में अन्य भाषा को लेकर सहज ललक रहती है. दक्षिण में हिन्दी के प्रति दुराव राजनीति प्रेरित ज्यादा है, स्वाभाविक नहीं. दक्षिण भारतीयों की अंग्रेज़ी उत्तर भारतीय लोगों की तुलना में बेहतर होती है. पर यह गुण किसी अन्य भारतीय भाषा को सीखने में हिन्दी ज्ञान की तुलना में ज्यादा मदद नहीं करता.

कल्पना करें कि कोई तमिलभाषी अगर पंजाबी या कश्मीरी सीखना चाहेगा तो हिन्दी माध्यम के ज़रिये नई भाषा सीखना कहीं ज्यादा आसान होगा बनिस्बत अंग्रेजी के. ज़रूरी नहीं कि सिखाने वाले को बहुत अच्छी इंग्लिश आती हो.

दक्षिण भाषाएं

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सम्पर्क भाषा के रूप में हिंदी

हमारा मानना है कि आज हिन्दी का रथ अपनी स्वयं की रफ़्तार से दौड़ रहा है. हिन्दी चाहे तमिल, तेलुगू, मराठी, अवधी, राजस्थानी व अन्य भाषाओं की तुलना में बहुत प्राचीन नहीं है. हिन्दी में शास्त्रीय साहित्य नहीं है जो पुरातनता के पैमानों पर उसे शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिलाता हो. मगर उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक देश और दुनिया को जोड़ने वाली सम्पर्क भाषा के तौर पर जो बढ़त हिन्दी को हासिल है वह उसकी कम उम्र को देखते हुए गज़ब है. इसका महत्व इस बात में है कि हिन्दी और दूसरी भाषाओं का प्राकृतों से अन्तर्सम्बन्ध है.

जहाँ तक संस्कृत का सवाल है, द्रविड़ भाषाओं में संस्कृत के रूपभेद पहचानना कठिन होता है. मगर उनमें संस्कृत की मौजूदगी साबित करती है कि भाषायी आधार पर जो आर्य-द्रविड़ टकराव दर्शाया जाता है वह नकली है. संस्कृत और द्रविड़ भाषाओं में अटूट अन्तर्सम्बन्ध रहा है. भारतीय भाषाओं में एकता का जो सूत्र संस्कृत के ज़रिये नज़र आता है, वही सूत्र आज हिन्दी के रूप में समूचे भारत को जोड़े हुए है.

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