दक्षिण भारत में लोग अच्छी तरह हिंदी सीख रहे हैं: के. कस्तूरीरंगन

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए गठित विशेषज्ञ समिति के प्रमुख के. कस्तूरीरंगन ने कहा है दक्षिण भारत में लोग हिंदी सीख रहे हैं और ये कहना ग़लत होगा कि वहां हिंदी को किसी बाहरी भाषा की तरह देखा जाता है, लेकिन अगर आप हिंदी सीखने के लिए किसी आदेश का हवाला देंगे तो उस पर लोग नाराज़ होंगे.
उन्होंने इन आरोपों से भी इनकार किया कि नई शिक्षा नीति के मसौदे में हिंदी को थोपने जैसी बात है, जैसा कि आरोप लग रहे हैं.
मसौदे में छात्रों के लिए तीन भाषा के फ़ार्मूले की बात रखी गई थी. फ़ार्मूले के मुताबिक हिंदी भाषी और ग़ैर-हिंदी भाषी राज्यों में तीन भाषाओं में हिंदी और अंग्रेज़ी को शामिल करना ज़रूरी था.
आखिरकार सरकार ने मसौदे में बदलाव किया. नए मसौदे में तीन भाषा फ़ार्मूले में हिंदी का ज़िक्र नहीं है.

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पूर्व इसरो प्रमुख के कस्तूरीरंगन ने बीबीसी से बातचीत में माना कि मसौदे में हिंदी से जुड़े जिस पैराग्राफ़ को लेकर इतना विवाद हुआ वो रिपोर्ट की विचारधारा से अलग था.
उन्होंने कहा, "जिस पैराग्राफ़ के बारे में हमने सोचा कि वो भाषा को लेकर हमारी सोच को दशाता है, उसे शायद (मसौदे में) नहीं शामिल नहीं किया जाना चाहिए था. भाषा को लेकर जिस सोच से वो रिपोर्ट लिखी गई थी, वो (पैराग्राफ) उस सोच से परे था."
संशोधित मसौदे में क्या है
कस्तूरीरंगन के मुताबिक मसौदे को तैयार करते वक्त भाषा से जुड़ी संवेदनशीलता को देखते हुए उस पर काफ़ी चर्चा, बहस हुई थी और कई विकल्पों पर विचार किया गया था.
उन्होंने बताया कि समिति ने भाषा के मुद्दे पर एक दूसरे प्रारूप पर भी मुहर लगाई थी और ये दूसरा प्रारूप रिपोर्ट की विचारधारा के अनुरूप था, इसलिए विवाद के बाद दूसरे प्रारूप को संशोधित मसौदे में लाया गया.
नए प्रारूप में हिंदी का ज़िक्र नहीं है.
महाराष्ट्र, तमिलनाडु सहित दूसरे राज्य के कई लोगों ने मसौदे को गैर-हिंदी भाषी राज्यों पर हिंदी थोपने वाला कदम बताया था.

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रिपोर्टों के मुताबिक डीएमके नेता स्टालिन ने कहा, "तमिल लोगों के खून में हिंदी के लिए कोई जगह नहीं है. तमिलनाडु पर हिंदी थोपना मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर फेंकने जैसा होगा."
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने हिंदी को कथित तौर पर थोपने पर नाराज़गी जताई और कहा कि सभी भाषाओं के साथ बराबरी का व्यवहार होना चाहिए.
मानव संसाधन मंत्रालय और मंत्री रमेश पोखरियाल ने सफाई दी कि ये सिर्फ़ एक ड्राफ़्ट रिपोर्ट है, फ़ाइनल रिपोर्ट नहीं.
विदेश मंत्री एस जयशंकर जो खुद तमिलनाडु से हैं, उन्होंने ट्वीट किया, "मानव संसाधन मंत्रालय को सौंपी गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति एक ड्राफ़्ट रिपोर्ट है. आम लोगों से इस बारे में विचार मांगे जाएंगे. राज्य सरकारों से बात की जाएगी. उसके बाद ही इसे फाइनल किया जाएगा. भारत सरकार सभी भाषाओं का आदर करती है. किसी भी भाषा को थोपा नहीं जाएगा."
वित्त मंत्री और तमिलनाडु की निर्मला सीतारमन ने भी हिंदी को थोपने की बात से इनकार किया है.
उधर के कस्तूरीरंगन ने कहा, "दक्षिण भारत में लोग बहुत अच्छी तरह हिंदी सीख रहे हैं. मैं बहुत अच्छी हिंदी बोलता हूं. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ने हिंदी सिखाने में अच्छा काम किया है."
"मुझे नहीं लगता कि एक दक्षिण भारतीय हिंदी को बाहरी भाषा की तरह देखता है लेकिन आप उससे कल किया कि आपको इसे (हिंदी को) सीखना ही होगा (तब समस्या होती है) .... ज़रूरत के मुताबिक लोग हिंदी सीखते हैं. जब मैं मुंबई में था, मैंने मराठी और हिंदी सीखी."
"मैं तमिलियन हूँ. मेरा जन्म केरल में हुआ. मैंने मुंबई, अहमदाबाद में पढ़ाई की. मैंने बंगलूरू मे काम किया. मैं दिल्ली में सांसद था और वहां प्लानिंग कमीशन में सदस्य रहा. मैंने बहुत भाषाएं सीखी."

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इससे पहले राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में आई थी और थोड़े बदलाव के बाद उसे 1992 में अपनाया गया.
के. कस्तूरीरंगन के मुताबिक नई शिक्षा नीति के बारे में सोच है कि इसे अगले 10 सालों में इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए, उसके अगले 10 सालों में इस नीति को टेस्ट किया जाए, और उसके अगले 10 सालों में इसमें अगर किसी बदलाव की ज़रूरत हो तो वो किए जाएं ताकि ये प्रासंगिक रहे.
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