प्रणब मुखर्जी अचानक क्यों सक्रिय हो गए हैं?: नज़रिया

प्रणब मुखर्जी

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    • Author, राशिद किदवई
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

प्रणब मुखर्जी एक सिद्धांतवादी व्यक्ति हैं. आज के दौर में वो शायद सर्वाधिक सम्मानित भारतीयों में से एक हैं.

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को लेकर लगाए गए आरोपों या फिर वोटिंग मशीन में टेम्परिंग (धांधली) को लेकर उनकी चिंता, जिसे उन्होंने वोटरों की टेम्परिंग कहा है, गंभीर है. इसके राजनीतिक मायने भी हैं.

ये पूरा घटनाक्रम और प्रणब मुखर्जी के बयान की टाइमिंग इस पूरे मुद्दे के और भी अर्थ निकालने की वजह बनती है. इसमें कई संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं.

प्रणब मुखर्जी

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चुनाव आयोग के समर्थन में पूर्व राष्ट्रपति?

प्रणब मुखर्जी ने सोमवार को एनडीटीवी की सोनिया सिंह की एक किताब रिलीज़ करते हुए कहा, "संस्थान उम्दा हैं और ये संस्थान कई बरसों में तैयार हुए हैं. मैं मानता हूं कि सिर्फ एक खराब कारीगर ही अपने औज़ारों से शिकायत करता है. एक अच्छा कारीगर जानता है कि इन औज़ारों का इस्तेमाल कैसे किया जाए."

मौजूदा वक़्त में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारी बहुमत से जीत का अनुमान ज़ाहिर करने वाले तमाम एक्ज़िट पोल के बोझ तले दिल्ली के राजनीतिक हलके ने प्रणब मुखर्जी के बयान को उस चुनाव आयोग की तारीफ के तौर पर देखा जिस पर विपक्षी दल पक्षपाती होने की तोहमत लगाते हुए हमला कर रहे हैं.

प्रणब मुखर्जी शब्दों की सही नाप तोल के लिए जाने जाते हैं और आम तौर पर बयानों को पलटने, खंडन करने या फिर स्पष्टीकरण देने से दूर रहते हैं. लेकिन उन्होंने ही 24 घंटे के ही अंदर चार पैराग्राफ का बयान जारी किया. इसके हर शब्द के राजनीतिक मायने हैं.

इस बयान में उन्होंने कहा, "संस्थान की सत्यनिष्ठा तय करने की ज़िम्मेदारी" चुनाव आयोग पर है. "ईवीएम चुनाव आयोग के अधिकार में हैं और उनकी सुरक्षा आयोग की जिम्मेदारी है."

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'अटकलों के लिए नहीं हो जगह'

कामगार के अपने औज़ारों में ख़ामी तलाशने की बात करने वाले प्रणब मुखर्जी ने मानो अपनी कही बात की समीक्षा करते हुए कहा, "अपने संस्थानों में आस्था रखने वाले व्यक्ति के तौर पर मेरी ये राय है कि ये 'कामगार' है जो तय करता है कि संस्थान के 'औज़ार' कैसे काम करें."

पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, "हमारे लोकतंत्र की बुनियाद को चुनौती देने वाली अटकलों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए. जनमत के पाक साफ होने में रत्तीभर संशय की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए." ये एक ऐसा रुख है जिस पर कोई भी लोकतंत्रवादी आपत्ति नहीं करेगा.

बड़ा सवाल ये है कि प्रणब मुखर्जी की मंशा क्या है? क्या वो उस चुनाव आयोग का समर्थन करते नहीं दिखना चाहते हैं, जिस पर विपक्ष हमलावर है?

प्रणब मुखर्जी और रामनाथ कोविंद

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दादा में दिखता है विकल्प?

इससे भी अहम ये है कि प्रणब मुखर्जी का बयान ऐसे वक़्त में आया है जबकि बीजेपी और पूरा एनडीए चुनाव आयोग पर सवाल उठाने के लिए विपक्ष की खिल्ली उड़ाने में जुटा है और इसे उनकी चुनाव में हार के संकेत के तौर पर देख रहा है.

दलगत आस्था से दूर एक पूर्व राष्ट्रपति जो फिलहाल उम्दा स्वास्थ्य होने के बाद भी रिटायर्ड जीवन बिता रहे हैं, लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के एक दिन पहले सक्रिय क्यों हो जाते हैं?

दिल्ली के राजनेताओं का एक धड़ा ऐसा भी है जो अब भी मानता है कि 17वीं लोकसभा चुनाव के नतीजों में किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा. सत्ताधारी गठबंधन या फिर विपक्ष दोनों के ही लिए सरकार बनाना मुश्किल होगा. पर्दे के पीछे की इस बातचीत में एक ऐसे व्यक्ति की तलाश है जिसकी क्षेत्रीय दलों के बीच व्यापक तौर पर स्वीकार्यता हो.

ख़ासकर कांग्रेस और एनडीए के बाहर के दल, मसलन बीजू जनता दल, वाईएसआर कांग्रेस और तेलंगाना राष्ट्रीय समिति जैसे कुछ और दल.

वीपी सिंह

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इतिहास के गवाह प्रणब

आज़ादी के बाद के भारतीय इतिहास के 15 राष्ट्रपतियों (वास्तविकता में 13 क्योंकि ज़ाकिर हुसैन और फ़ख़रुद्दीन अली अहमद की पद पर रहते हुए ही मौत हो गई) में से किसी ने सक्रिय राजनीति में वापसी नहीं की. ज़ैल सिंह राजीव गांधी का विरोध करने के विचार को टटोलते रहे. वहीं आर वेंकटरमण 'राष्ट्रीय सरकार' की अगुवाई करने की आकांक्षा को गुपचुप पालते रहे.

आरवी के नाम से मशहूर वेंकटरमण भारत के आठवें राष्ट्रपति थे. उनका कार्यकाल 1987 से 1992 तक था. ये वो दौर था जब मतदाताओं ने 1989 और 1991 में खंडित जनादेश दिया और देश ने अनचाहे तरीके से गठबंधन सरकार को मंजूर किया.

खंडित जनादेश के दौर में वेंकटरमण राष्ट्रीय सरकार के विचार को आगे बढ़ाने की कोशिश में थे.

साल 1989 में वीपी सिंह ने गठबंधन सरकार की अगुवाई की. उन्हें दक्षिणपंथी और वाम दलों दोनों का समर्थन मिला. लेकिन उन्होंने 'राष्ट्रीय सरकार' का विकल्प नहीं चुना.

साल 1991 में पीवी नरसिंह राव ने अल्पमत की सरकार चलाने के लिए वाम दलों का समर्थन हासिल किया. दोनों ही मौकों पर प्रणब मुखर्जी ने पूरे घटनाक्रम को करीब से देखा.

प्रणब मुखर्जी और मोहन भागवत

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सही वक़्त का इंतज़ार?

प्रणब मुखर्जी के करीबी सूत्रों का कहना है कि पूर्व राष्ट्रपति न तो बहुत महत्वाकांक्षी हैं और न ही देश की राजनीतिक स्थिति से अनजान हैं. एक घाघ राजनीतिज्ञ की तरह प्रणब मुखर्जी रिंग में अपना हैट तब तक नहीं फेंकेंगे जब तक कि 17वीं लोकसभा एक्ज़िट पोल के अनुमानों के परे बुरी तरह खंडित जनादेश नहीं देती और पूरा विपक्ष हाथ जोड़े उनका दरवाजा नहीं खटखटाता है.

प्रणब मुखर्जी को ये भी अंदाज़ा है कि एक उलझे गठबंधन को चलाना मुसीबत को आमंत्रित करने की तरह है. लेकिन कुछ लोगों की राय है कि प्रधानमंत्री कार्यालय प्रणब मुखर्जी के योग्य है. वो देश के वित्त, विदेश और रक्षा मंत्री रह चुके हैं. उनके बारे में ये टैगलाइन भी मशहूर है, "सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्रियों में से एक जो भारत को कभी नहीं मिला."

क्या ये सिर्फ खाली दिमाग की अटकलें हैं? इस सवाल का जवाब 2019 चुनाव के नतीजे आने के बाद ही मिलेगा.

प्रणब मुखर्जी विवादों को आमंत्रित करने या फिर चौंकाने से पीछे नहीं रहते. भूलना नहीं चाहिए कि जून 2018 में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर स्थित मुख्यालय में मुख्य अतिथि बनना मंजूर किया था.

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