पश्चिम बंगाल की चुनावी हिंसा क्या इस बार अलग है?

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- Author, संदीप राय
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का इतिहास रहा है लेकिन लोकसभा के अंतिम चरण के मतदान से पहले ताज़ा हिंसा ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
मंगलवार को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो में हुई हिंसा के लिए बीजेपी ने तृणमूल पर आरोप लगाए हैं. जबकि तृणमूल ने बीजेपी पर बाहर से भीड़ लाकर हिंसा फैलाने का आरोप लगाया है.
इससे पहले के चरणों में भी हिंसा हुई थी लेकिन रोड शो के दौरान हिंसा का अलग ही स्वरूप सामने आया.
दोनों पक्षों में जमकर पत्थरबाज़ी हुई और बंगाल में भावनात्मक अपील रखने वाले ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ दी गई. दोनों पक्ष एक दूसरे पर मूर्ति तोड़ने का आरोप लगा रहे हैं.
पुलिस ने हिंसा में शामिल 100 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया. बीजेपी ने इसे लेकर आयोग से शिकायत की.
इसके बाद चुनाव आयोग ने प. बंगाल में एक दिन पहले चुनाव प्रचार बंद करने के आदेश दिया.

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तृणमूल की चुनौती बढ़ी
वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर मणि तिवारी कहते हैं, "पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा कोई नई बात नहीं. जब भी सत्तारूढ़ पार्टी खुद को कमज़ोर पाती है और कोई नई पार्टी चुनौती देती हुई लगती है तो हिंसा होती ही है."
वो कहते हैं, "पश्चिम बंगाल सिद्धार्थ शंकर रे के ज़माने से पिछले चार दशकों से चुनावी हिंसा का गवाह रहा है. 70 के दशक में जब सीपीएम उभर रही थी तब और जब 90 के दशक के अंतिम सालों में तृणमूल सीपीएम को चुनौती दे रही थी तब भी."
वो कहते हैं, "राज्य में पिछले पंचायत चुनावों में भी हिंसा हुई थी. इन चुनावों में सीमावर्ती इलाकों में बीजेपी को कुछ सीटें भी मिलीं थी. अब वो संसदीय चुनाव में कुछ सीटें जीतना चाहती है."
साल 2009 से ही पश्चिम बंगाल में बीजेपी का मत प्रतिशत बढ़ रहा है. पंचायत चुनावों में मिली सफलता के बाद बीपेजी चाहती है कि उसका बढ़ता जानाधार सीटों में परिवर्तित हो.
अंतिम चरण में जिन नौ सीटों पर मतदान होना है, 2014 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने ये सारी सीटें जीती थीं.

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बीजेपी को जीत की उम्मीद
प्रभाकर मणि तिवारी कहते हैं कि बीजेपी इनमें से कम से कम तीन सीटों पर जीत की उम्मीद लगाए हुए है, इसीलिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह यहां ज़ोर लगाए हुए हैं.
उत्तरी कोलकाता का संसदीय क्षेत्र हिंदीवासी बहुल है और बीजेपी का यहां जनाधार बढ़ा है.
वो कहते हैं, "अमित शाह रोड शो के ज़रिए शहरी मतदाताओं में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं और तृणमूल ऐसा होने नहीं देना चाहती. हिंसा की यह भी एक बड़ी वजह है."
इसके अलावा ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी डायमंड हार्बर से चुनाव लड़ रहे हैं, बीजेपी को यहां से भी उम्मीद है. और तीसरी सीट है बशीरहाट.
हालांकि कोलकाता विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी का कहना है कि इस बार चुनावी हिंसा पहले के मुकाबले काफ़ी कम हुई है.
वो कहते हैं, "पिछले लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव को देखें तो चुनावी हिंसा में क़रीब दो तिहाई की कमी आई है."

प्रशासन रोक सकता था
प्रो चतुर्वेदी का कहना है कि 'अमित शाह के रोड शो की घटना इस मामले में नई है कि इससे पहले परंपरा थी कि प्रतिद्वंद्वी दलों की सभा को बाधित नहीं किया जाएगा. इस घटना से बचा जा सकता था.'
वो कहते हैं, "पश्चिम बंगाल में पहले से ही टकराव का माहौल रहा है. चुनावों में बीजेपी की आक्रामक एंट्री ने टकराव को और बढ़ा दिया है."
कॉलेज स्ट्रीट का इलाक़ा बहुत छोटी जगह है, जहां हिंसा हुई, वहीं पास में बीजेपी का कार्यालय भी है. जबकि आस पास मुस्लिम बहुल इलाका है. ऐसे में इस हिंसा से दंगा फैलने की आशंका भी थी.
प्रो चतुर्वेदी का कहना है कि 'रोड शो के लिए बीजेपी के कार्यकर्ता वहीं इकट्ठा हुए थे लेकिन सवाल ये उठता है कि दूसरे दल के कार्यकर्ताओं को वहां इकट्ठा होने क्यों दिया गया? प्रशासन इस टकराव को रोक सकता था.'
उन्होंने कहा कि ये हिंसा स्वतःस्फूर्त नहीं बल्कि पूर्व नियोजित लगती है, लेकिन इससे दोनों पार्टियों को कोई अतिरिक्त फायदा नहीं होने जा रहा.
गौरतलब है कि ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ने को तृणमूल कांग्रेस मुद्दा बना रही है और इसे बंगाली पहचान पर हमले के रूप में प्रचारित कर रही है.

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मूर्ति तोड़ने से किसको नुकसान
प्रो जगदीश्वर चतुर्वेदी कहते हैं, "70 के दशक में जब नक्सली बहुत मज़बूत स्थिति में थे और बंगाली भद्रलोक का एक बड़ा जनमत उनके साथ था, उसी बीच में उन्होंने ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ दी थी. नक्सलबाड़ी आंदोलन की ये सबसे बड़ी भूल साबित हुई. उसके बाद नक्सलवाद पूरे पश्चिम बंगाल में अलग थलग पड़ गया."
वो कहते हैं, "लेफ्ट सरकार के ज़माने में भी बीजेपी को 6-7 प्रतिशत तक मत मिलते थे. पिछले आम चुनावों में कांग्रेस और लेफ़्ट के कुछ वोटर ममता सरकार के उत्पीड़न से तंग आकर बीजेपी की तरफ़ चले गए और उसका मत प्रतिशत बढ़ गया. लेकिन मूर्ति तोड़ने की ताज़ा घटना से उसे अब नुकसान हो सकता है."
पश्चिम बंगाल में चुनावी गणित बीजेपी के पक्ष में अभी उतना नहीं है कि वो उम्मीद से अधिक सीटें जीत ले.
कोलकाता की डॉयमंड हार्बर सीट के पिछले चुनाव में बीजेपी दूसरे नंबर पर आई थी, इसलिए शायद बीजेपी की इस बार उम्मीद बढ़ी हुई है.
प्रो जगदीश्वर चतुर्वेदी का कहना है कि 'अगर सभी बंगाली हिंदू बीजेपी को वोट दे दें तो शायद बीजेपी कुछ सीटें जीत सकती है, लेकिन इस बार हो सकता है कि बीजेपी के मतप्रतिशत में कमी आए.'

इस तर्क के समर्थन में वो कहते हैं कि बीजेपी ने राष्ट्रीय नागिरक रजिस्टर (एनआरसी) को लागू करने का वादा करके खुद को मुसीबत में डाल दिया है.
उनके अनुसार, "बांग्लादेश से तक़रीबन 50 से 60 लाख लोग पलायनकर पश्चिम बंगाल में आए थे. तब वो खाली हाथ थे, आज वो धनी मध्यवर्ग का हिस्सा बन चुके हैं. बंगाल के मछलीपालन धंधे में उनका दबदबा है. उनमें से कई अरबपति हैं. उनके पास सभी वैध कागज़ात हैं."
तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी इन मुद्दों को अपने ढंग से जनता के बीच ले जा रही हैं.
अब इनका असर क्या होता है, ये तो 23 मई के बाद ही पता चलेगा.
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