दक्षिण भारत का जलियांवाला बाग़, पुलिस फ़ायरिंग में मरे थे 32

- Author, अरुण शांडिल्य
- पदनाम, बीबीसी तेलुगू
"जलियांवाला बाग़ त्रासदी ने ब्रिटिश भारत के इतिहास पर एक अमिट दाग़ को छोड़ा है" - इस कड़वी सच्चाई को आज के ब्रिटिश शासक भी स्वीकार करते हैं. वैशाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग नरसंहार हुआ था.
लेकिन बहुत कम लोगों को ही पता है कि दक्षिण भारत भी जलियांवाला बाग जैसी एक त्रासदी झेल चुका है.
उस दिन आंध्र प्रदेश के अनंतपुर की सीमा से सटे एक बग़ीचे में स्वतंत्रता सेनानियों का एक समूह इकट्ठा हुआ था.
वहां जुटे लोगों पर पुलिस ने गोलियां बरसाई थीं और 32 लोग काल के गाल में समा गए.

कहां है वो जगह?
दक्षिण का 'जलियांवाला बाग़' आंध्र प्रदेश की सीमा से महज़ 2 किलोमीटर दूर है.
यह त्रासदी 25 अप्रैल 1938 को विदुरश्वत्था में हुई थी. यह जगह आज कर्नाटक के गौरीबिदानुर ज़िले में पड़ता है.
विदुरश्वत्था तब मैसूर रजवाड़े के कोलार का एक गांव था. उस दिन यहां की धरती 32 स्वतंत्रता सेनानियों के ख़ून से रंग गई थी.
उनकी शहादत ने मैसूर राज्य में आज़ादी के आंदोलन को और मज़बूती प्रदान की. ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ लोग सड़कों पर उतर आए और उनका यह संकल्प आज़ादी मिलने तक कायम रहा.
आज विदुरश्वत्था, कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से 90 किलोमीटर और आंध्र प्रदेश के हिंदूपुर से महज़ 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.

झंडा फ़हराने की क़सम
ब्रिटिश राज के अधीन मैसूर राज के अधिकार क्षेत्र में आने वाले विदुरश्वत्था ने गांधी के मार्ग को अपनाया था.
यह वो समय था जब आज़ादी को लेकर कांग्रेस का संघर्ष अपने चरम पर था.
तब मैसूर राज ने आदेश पारित किया कि उनके अधिकार क्षेत्र में कोई भी राष्ट्र ध्वज नहीं फ़हराएगा. यह भी कहा गया कि जो झंडा फ़हराने की हिमाकत करेगा गोली मार कर उसकी जान ले ली जाएगी.
मैसूर राज के इस आदेश का विरोध करते हुए भोगराजू पट्टाभि सीतारमैया, केटी श्याम, हारदेकर, सिद्धालिंगैया, केसी रेड्डी, रामाचार जैसे तब के कांग्रेसी नेताओं ने मंड्या ज़िले के शिवपुरा में आयोजित होने वाली कांग्रेस की बैठक के दौरान राष्ट्रीय ध्वज को फ़हराने का फ़ैसला किया.
उनके इस फ़ैसले की जानकारी सरकार तक पहुंच गई और वहां पुलिस तैनात कर दी गई. शोधकर्ता गंगाधर मूर्ति और स्मिता रेड्डी ने अपनी किताब 'जलियांवाला बाग़ ऑफ़ कर्नाटक' में विदुरश्वत्था नरसंहार के बाद की घटनाओं पर विस्तार से लिखा है.
उसमें लिखा गया है कि तीन दिवसीय उस बैठक के दौरान जब कांग्रेसियों ने झंडा फ़हराने की कोशिश की तो ब्रिटिश सैनिकों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया.

विदुरश्वत्था में झंडा फ़हराने का इरादा
शिवपुरा में उनके झंडा फहराने की कोशिशों को नाकाम कर दिया गया, तो कांग्रेसी नेताओं ने 18 अप्रैल 1938 को विदुरश्वत्था में राष्ट्रीय ध्वज फ़हराने के लिए 'ध्वज सत्याग्रह' सभा का आयोजन किया.
चूंकि यह जगह आंध्र प्रदेश के क़रीब है तो सीमावर्ती नेताओं के यहां आने की उम्मीद थी. नेताओं ने कोलार ज़िले में घूम-घूमकर इस सभा का प्रचार किया.
मैसूर सरकार को उनकी इन गतिविधियों के बारे में सब पता था. उसने इस विदुरश्वत्था इलाक़े के दो किलोमीटर के दायरे में निषेधाज्ञा लगाकर किसी भी कार्यक्रम को आयोजित करने पर प्रतिबंध लगा दिया.
कांग्रेसी नेताओं ने रणनीतिक रूप से पहले चार दिनों में कोई भी गतिविधि नहीं की.
एन.सी. नागी रेड्डी के नेतृत्व में हाथों में राष्ट्रीय ध्वज लिए नेताओं ने विदुरश्वत्था की ओर कूच किया.
रास्ते में उन्होंने लोगों को पर्चे बांटे और सरकार के आदेश को तोड़ते हुए उन्हें ध्वज सत्याग्रह में जुड़ने की अपील की. लोग उनके साथ जुड़े भी. वहीं, दूसरी ओर कल्लूरू सुब्बाराव के नेतृत्व में आंध्र प्रदेश के लोग भी मार्च कर रहे थे.
हज़ारों लोगों ने विदुरश्वत्था की ओर कूच किया था जिसको पुलिस ने तितर-बितर भी किया. आख़िरकार कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के सत्याग्रही विदुरश्वत्था पहुंच गए और एक मंदिर के पीछे वाले बगीचे में इकट्ठा हुए.
नेताओं को जेल में डाला गया
पुलिस ने वहां पहुंचकर एन.सी. नागी रेड्डी और दूसरे नेताओं को गिरफ़्तार कर उन्हें चिकबल्लापुर कोर्ट में पेश किया. जज ने सरकार के नियम को तोड़ने के लिए नेताओं से माफ़ी मांगने के लिए कहा लेकिन उन्होंने माफ़ी नहीं मांगी जिसके बाद उन्हें जेल में डाल दिया गया.
कोलार ज़िले में जब नेताओं के जेल में डाले जाने का लोगों को पता चला तो वह सड़कों पर उतर आओ और उन्होंने सरकार विरोधी प्रदर्शन किए.
इसके बाद विदुरश्वत्था में स्थिति तनावग्रस्त हो गई. बगीचे में इकट्ठा सभी सत्याग्रही ग़ुस्से से भरे हुए थे.
लोगों को नियंत्रण करना मुश्किल हो गया था जिसके बाद अतिरिक्त सुरक्षाबलों को वहां भेजा गया. वहां चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात कर दी गई. हालांकि वहां लोगों की संख्या लगातार बढ़ती रही.
पुलिस ने सत्याग्रहियों को बग़ीचे के एक कोने तक सीमित कर दिया और सभी आने-जाने वाले रास्तों को बंद कर दिया.
नरसंहार का दिन
25 अप्रैल 1938 को गौरीबिदानुर और आसपास के गांवों से सुबह साढ़े दस बजे के क़रीब लोग पहुंचने लगे.
वहीं, तकरीबन 25 हज़ार लोग झंडा फ़हराने का इंतज़ार कर रहे थे. सत्याग्रहियों ने तय किया कि तय समय से पहले ही झंडा फ़हराया जाए लेकिन जैसे ही वे झंडा फ़हराने के लिए तैयार हुए पुलिस ने अपनी बंदूक़ें उनकी ओर मोड़ दीं.
लेकिन तब भी जब सत्याग्रही पीछे नहीं हटे तो पुलिस ने वेदुलवेनी सुरन्ना, नारायण स्वामी, कल्लूरू सुब्बाराव जैसे नेताओं को गिरफ़्तार कर वहां से हटा दिया.
उन नेताओं की गिरफ़्तारी ने लोगों में ग़ुस्सा पैदा कर दिया. तभी कांग्रेसी नेता रामचर ने सत्याग्रहियों को संबोधित करना शुरू कर दिया. मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया कि उन्हें वहां भाषण देने की अनुमति नहीं है इसलिए वह जगह को छोड़ दें लेकिन रामचर ने आदेश नहीं माना. इसके बाद पुलिस ने लोगों पर लाठीचार्ज शुरू कर दिया.
इसी दौरान ज़िले के पुलिस अधीक्षक ने अपनी पिस्तौल से गोलियां चलानी शुरू कर दीं जिसमें एक शख़्स की मौक़े पर ही मौत हो गई. इसके बाद पुलिस अधीक्षक समेत कई पुलिसकर्मियों ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं.
एक के बाद सत्याग्रही बग़ीचे में गिरते चले गए.
यह गोलीबारी दोपहर एक बजे शुरू हुई जिसके कारण 32 लोगों की मौत हुई और तकरीबन 48 लोग घायल हुए. विदुरश्वत्था का बग़ीचा सत्याग्रहियों के शवों से क़ब्रिस्तान में तब्दील हो गया. उनके शव पूरे बाग़ में फैले हुए थे.

इमेज स्रोत, Getty Images
वल्लभ भाई पटेल पहुंचे मैसूर
इस त्रासदी के बारे में महात्मा गांधी को सूचित किया गया. उस समय वह वर्धा मे थे. उन्होंने 29 अप्रैल को एक बयान जारी किया और इसकी निंदा करते हुए लिखा, "विदुरश्वत्था में आज़ादी के लिए अहिंसा का रास्ता चुनने वाले 32 शहीदों की शहादत ज़ाया नहीं जाएगी."
गोलाबारी की घटना के बाद मैसूर राज्य ने क्षेत्र के कई अख़बारों और नेताओं को दो महीने तक बोलने के लिए प्रतिबंधित कर दिया.
पूरे कोलार ज़िले में गिरफ़्तारियों और प्रतिबंधों का विरोध करने के लिए कॉलेज और स्कूलों के छात्र सड़कों पर उतर गए. इस स्थिति में सेना को बुलाया गया जिसके बाद स्थिति और तनावपूर्ण हो गई.
निजालिंगप्पा के नेतृत्व में कांग्रेस ने पांच सदस्यों की एक फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग कमिटी का गठन किया. इसके बाद सरकार ने जांच के लिए अपनी भी एक कमिटी का गठन किया.
इस स्थिति के लिए कथित तौर पर ज़िम्मेदार मैसूर के दीवान सर मिर्ज़ा के ख़िलाफ़ भी प्रदर्शन तेज़ हो गए.
दीवान मिर्ज़ा ने महात्मा गांधी को पत्र लिखकर इस मामले में दख़ल देने के लिए कहा जिसके बाद गांधी ने वल्लभ भाई पटेल और आचार्य कृपलानी को मैसूर भेजा.
मैसूर के दीवान ने पटेल की निषेधात्मक आदेशों को हटाने और नेताओं को रिहा करने की मांगों को मान लिया. इन निषेधात्मक आदेशों में तिरंगा फ़हराने पर रोक भी दी जिसे भी वापस ले लिया गया. इस समझौते को 'पटेल-मिर्ज़ा' समझौते के नाम से जाना जाता है.

कमिटी ने माना 10 लोग मरे
बाद में सरकार ने एक कमिटी का गठन करके 147 चश्मदीदों को सुना और अपनी रिपोर्ट जमा की. इसमें पाया गया कि गोलीबारी उस स्थिति का एक न टाले जाने वाला परिणाम था और इस रिपोर्ट के हिसाब से घटना में सिर्फ़ 10 लोगों की मौत हुई थी.
'जलियांवाला बाग़ ऑफ़ कर्नाटक' नामक किताब में इसका उल्लेख है कि मैसूर सरकार ने इसको लेकर 19 नवंबर 1938 को एक नोटिफ़िकेशन जारी किया था.
मारे गए लोगों की याद में विदुरश्वत्था में 1973 में एक स्मारक का निर्माण किया गया था. 2004 में मारे गए लोगों के लिए एक मक़बरे और इमारत का भी निर्माण किया गया. उसी इमारत के चारों ओर एक बाग़ तैयार किया गया जिसे 'वीर सौध गार्डन' का नाम दिया गया.
साथ ही स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित किताबों के लिए एक लाइब्रेरी और विदुरश्वत्था नरसंहार से जुड़ी डॉक्यूमेंट्री दिखाने के लिए एक थियेटर भी बनाया गया है.
'सत्याग्रह मेमोरियल डेवेलपमेंट कमिटी' के सदस्य गंगाधर मूर्ति कहते हैं कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम के बारे में रूचि लेने वाले लोग, शोधकर्ता मारे गए लोगों के बलिदान को जानने भारी संख्या में यहां आते हैं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















