मोदी सरकार में बैंकों के साढ़े पांच लाख करोड़ रुपये 'डूबे'- प्रेस रिव्यू

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इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले 10 साल में बैंकों के सात लाख करोड़ रुपये डूब गए.
अख़बार ने रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया से इस बारे में आरटीआई यानी सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी थी जिसके जवाब में रिज़र्व बैंक ने ये जानकारी दी है.
अख़बार लिखता है कि अकेले 2018 में नौ महीने के भीतर बैंकों ने एक लाख छप्पन हज़ार सात सौ दो करोड़ (1,56,702) रुपये का कर्ज़ राइट ऑफ़ कर दिया यानी बैंकों ने माना कि उन्होंने ये रकम बट्टा खाते में डाल दी है.
इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि बैंक इस कर्ज़ की वसूली प्रक्रिया तो जारी रखते हैं, लेकिन बही-खाते को साफ़-सुथरा रखने के लिए इसे बट्टा खाते में डाल दिया जाता है.
रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2014 से लेकर अब तक यानी पांच साल के भीतर बैंकों के 5 लाख 55 हज़ार 603 करोड़ रुपये डूबे हैं.
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'पीरियड्स में पारसियों के मंदिर नहीं जा सकतीं औरतें'
मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के धर्मस्थलों में प्रवेश न मिलने के मामले लगातार तूल पकड़ रहे हैं. सबरीमला मंदिर, शनि शिंगणापुर, हाजी अली और निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के बाद अब बारी पारसी समुदाय के धर्मस्थल अग्निमंदिर की है.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ संजीव कुमार नाम के एक वकील ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर कहा था कि पारसियों के अग्नि मंदिर में न तो दूसरे धर्मों के लोगों को जाने की इजाज़त है और न मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को. याचिका में इसे असंवैधानिक और ग़ैर-क़ानूनी बताया गया है.
याचिका के जवाब में दिल्ली पारसी अंजुमन ने अदालत से कहा कि पारसी धर्म महिलाओं और पुरुषों में भेदभाव नहीं करता. अंजुमन ने कहा कि अगर पुरुषों को किसी तरह की चोट लगी या ख़ून बह रहा हा तो उन्हें भी अग्निमंदिर के गर्भगृह में जाने का इजाज़त नहीं है.

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'राजनीति पर कुछ न लिखें छात्र'
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़ दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में प्रशासन ने छात्रों से कहा है कि वो कॉलेज की वार्षिक पत्रिका में 'राजनीतिक मुद्दों' पर लेख न लिखें.
अख़बार लिखता है कि कॉलेज प्रशासन ने छात्रों से कहा कि पत्रिका में सिर्फ़ 'आम विषयों' पर लिखे लेख ही छपेंगे. कॉलेज ने 13 अप्रैल को जारी किए गए एक नोटिस में लिखा है राजनीतिक विषयों पर लिखे लेख स्वीकार नहीं किए जाएंगे.
नोटिस में लिखा गया है कि छात्र बिज़नेस पर लिखें, सामाजिक मुद्दों पर लिखें लेकिन राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़े विषयों पर कुछ न लिखें.
कॉलेज की इस कदम की काफ़ी आलोचना हो रही है. अख़बार लिखता है कि छात्रों और शिक्षक दोनों ही इससे नाराज़ हैं.

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रैली में क्या बोल रहे हैं राहुल और मोदी?
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी 35 चुनावी रैलियों में भारतीय वायु सेना की एयर स्ट्राइक का ज़िक्र किया और राहुल गांधी ने अपनी 31 रैलियों में न्याय की बात की.
अख़बार लिखता है कि पीएम मोदी ने सिर्फ़ एक बार राहुल और प्रियंका का नाम लिया जबकि राहुल गांधी ने हर रैली में पीएम मोदी का नाम लिया.
प्रधानमंत्री मोदी ने 'चौकीदार', 'नामदार', 'कामदार' और 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया. इस बार उन्होंने 'शाहजादा' शब्द का इस्तेमाल सिर्फ़ एक बार किया. इस बार रैलियों में उन्होंने 'सबका साथ-सबका विकास' और 'कांग्रेस मुक्त भारत' जैसे नारे नहीं लगाए.
वहीं, राहुल गांधी ने सबसे ज़्यादा बार नरेंद्र मोदी, नीरव मोदी, विजय माल्या और मेहुल चोकसी का नाम लिया. रफ़ाल मुद्दे का ज़िक्र राहुल ने सिर्फ़ एक रैली में किया.
राहुल गांधी ने नोटबंदी, किसान और जीएसटी जैसे शब्दों का इस्तेमाल अपनी आधी से ज़्यादा रैलियों में किया.

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'आप इस देश को कभी शांति से नहीं रहने देंगे'
'आप इस देश को कभी शांति से नहीं रहने देंगे'.
इकोनॉमिक टाइम्स की ख़बर के मुताबिक़ ये बात सुप्रीम कोर्ट के जजों ने एक याचिकाकर्ता से बेहद नाराज़गी भरे अंदाज़ में कही.
याचिकाकर्ता ने अयोध्या स्थित रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद से सटे नौ प्राचीन मंदिरों में पूजा करने की मांग की थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस संजीव खन्ना ने याचिका ख़ारिज़ कर दी.
सुप्रीम कोर्ट अयोध्या के राम मंदिर और बाबरी मस्जिद मामले को मध्यस्थता के लिए भेज चुका है.
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