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'अगर वो रात में आते तो मेरे तीनों बच्चों को मार डालते'
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) 18 साल की ख़ुशबू जान के घर के बाहर आज माहौल शांत है. भारत प्रशासित कश्मीर के शोपियां में बसे वेहिल गांव में मैं ख़ुशबू जान के घर के सामने था.
घर में क़दम रखते ही उनकी मां, हसीना जान की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी रही थी. वो रो रही थीं और चिल्ला कर सवाल कर रही थीं कि उनकी बेटी को किस गुनाह के लिए मार दिया गया.
घर में आस-पड़ोस से कई महिलाओं और पुरुष संवेदना जताने के लिए ख़ुशबू जान के घर आए थे. कुछ लोग हसीना जान को सांत्वना दे रहे थे और कई थे जो ख़ुशबू के पिता मोहम्मद नज़ीर भट को दिलासा दे रहे थे.
पेशे से मज़दूर भट बेटी की मौत की घटना के बाद से ही गहरे सदमे में हैं.
शनिवार को संदिग्ध चरमपंथियों ने दिन के उजाले में वेहिल में उन्हीं के घर पर एसपीओ ख़ुशबू जान की हत्या कर दी थी.
पुलिस ने पुष्टि की कि पुलिस विभाग में बतौर एसपीओ काम कर रहीं ख़ुशबू जान पर उनके ही घर में हमला किया गया.
न कोई धमकी न किसी ने कुछ कहा
शनिवार को हुई अपनी बेटी की बर्बर हत्या के बारे में याद करते हुए मोहम्मद नज़ीर भट कहते हैं, "लगभग 2.40 बजे का वक़्त था. हम परिवार से सभी लोग एक साथ बैठे हुए थे. अचानक ही जैकेट पहने दो युवा आए. उन्होंने हमारे घर के बाहर अपनी मोटरसाइकिल रोकी और घर में दाख़िल हुए. हमें सब सामान्य लगा. उन्होंने ख़ुशबू जान के बारे में पूछा."
"हमने उसे बुलाया तो वो अपने कमरे से बाहर निकल कर आई. इसी बीच उन्होंने किसी को फ़ोन मिलाया और ख़ुशबू से बात करने को कहने लगे. पहले तो उसने बात करने से मना कर दिया और कहा कि उसे किसी से भी बात करने की ज़रूरत नहीं है. लेकिन बाद में वो उसे कमरे के अंदर ले गए. मैं सबकुछ अपनी आंखों के सामने देख रहा था."
"जब वो मेरी बेटी के साथ अंदर गए, उनमें से एक ने पिस्तौल निकाल ली और उसके चेहरे पर गोली मार दी. वो गिर गई और दोनों लड़के वहां से भाग निकले. वो कश्मीरी थे. वे अपना चेहरा छुपाए हुए थे. हमें कुछ नहीं समझ आया कि चल क्या रहा है. हम ख़ुशबू को जल्द ही नज़दीक के अस्पताल ले गए जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया."
"हम ग़रीब लोग हैं. वो इस परिवार का एक बड़ा सहारा थी. हमारे पास न तो ज़मीन है और न ही कोई बाग. मैं राज्य से बाहर मज़दूरी करता था और कुछ दिन पहले ही लौटा हूं."
"वो अपन नौकरी सामान्य तरीक़े से कर रही थी. हमारे पास कभी कोई नहीं आया और ना ही किसी ने उससे इस्तीफ़ा देने की मांग की थी."
पहली बार महिला एसपीओ निशाना बनी
वो कहते हैं, "अगर इस्तीफ़े के लिए किसी ने कुछ कहा होता तो वो ज़रूर नौकरी छोड़ देती, हम ख़ुद ऐसा करने देते, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ. उन्होंने हमारी ज़िंदगी तबाह कर दी."
जम्मू-कश्मीर पुलिस में काम कर रहे एसपीओ स्थाई कर्मचारी नहीं होते, वो केवल कांट्रैक्ट पर काम करते हैं.
पिछले दो सालों में चरमपंथियों के द्वारा कई एसपीओ मारे गए, कई घायल हुए और उन पर इस्तीफ़ा देने का दबाव डाला गया.
लेकिन ख़ुशबू जान का मामला इसलिए अलग है क्योंकि पहली बार किसी महिला एसपीओ को निशाना बनाया गया.
पिछले साल जब चरमपंथियों ने एसपीओ से इस्तीफ़ा देने के लिए कहा तो दर्जनों एसपीओ ने सोशल मीडिया या अपने गांव की मस्जिदों से इस्तीफ़े की घोषणाएं कीं.
पूरे राज्य में जम्मू एवं कश्मीर पुलिस के तहत 30 हज़ार एसपीओ काम कर रहे हैं.
जब डरी हुई हसीना ने मुझसे बात शुरू की तो उनकी आवाज़ आंसुओं में डूब गई. वो केवल इतना कह पाईं कि 'मेरी एकमात्र उम्मीद ख़ुशबू और ये दो बच्चे थे.'
सपना थाख़ुशबू दुल्हन बनेगी, सब ख़त्म हो गया
थोड़ा संभल कर उन्होंने बताया, "हमें नहीं पता था कि उसकी हत्या हो जाएगी. ख़ुशबू मेरा सब कुछ थी. जबसे शादी हुई है मैं परेशानी ही झेल रही हूं. ऐसे समय में ख़ुशबू मेरे और अपने परिवार के लिए एक मज़बूत सहारा थी. हालांकि, उसकी कमाई बहुत मामूली थी, लेकिन ये मामूली कमाई भी एक ग़रीब मां के लिए एक बड़ी मदद थी."
"हमने उसे इस मामूली कमाई के लिए मर जाने को नहीं कहा था. हमारा ये मक़सद क़त्तई नहीं था. उसने अपने भविष्य के सपने संजो रखे थे. वो उच्च शिक्षा हासिल करना चाहती थी. अब वो हमें अकेला छोड़ गई है. मेरी अब कोई दूसरी बेटी नहीं है. हमारे दुश्मनों ने उसे हमसे छीन लिया."
हसीना ने कहा, "जिन्होंने मेरी बेटी को मारा अगर वो रात में हमारे घर में घुसे होते तो वो मेरे तीनों बच्चों को मार डालते. मेरा कोई भरोसा नहीं करेगा. भगवान का शुक्र है कि उसके पिता कुछ ही दिन पहले लौटे थे और मारे जाने से पहले उन्होंने उसका चेहरा देख लिया था."
बेटी को शादी के जोड़े में न देख पाने के अफ़सोस के साथ हसीना कहती हैं, "हाल के दिनों में कभी कभी हम उसकी शादी के बारे में बातें करते थे. मेरा सपना था कि एक दिन मेरी ख़ुशबू दुल्हन बनेगी, लेकिन ये सपना अब दफ़न हो गया. अब वो इस दुनिया से चली गई है और उसकी जुदाई मुझे मारे डाल रही है."
ख़ुशबू 11वीं कक्षा की छात्रा थीं. पिछले साल वो इम्तिहान में फ़ेल हो गई थीं और उनके परिजनों के अनुसार, वो परीक्षा की तैयारी कर रही थीं.
हसीना कहती हैं कि 'ख़ुशबू का अधिकांश वक़्त अपने रूम में परीक्षा की तैयारियों में बीतता था.'
'एसपीओ के लिए काम करना आसान नहीं'
वर्तमान में ख़ुशबू की पोस्टिंग शोपियां में डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में थी. हफ़्ते में तीन दिन के काम के बदले उन्हें 5,000 रुपये तनख्वाह मिलती थी.
ख़ुशबू जान की हत्या के बाद एसपीओ के रूप में काम करने वाली अन्य महिलाों में डर समाना लाज़मी है.
उनका कहना है कि कश्मीर में एसपीओ की नौकरी करना आसान नहीं है.
बीबीसी से बात करते हुए अफ़रोज़ा अख़्तर (बदला हुआ नाम) ने कहा, "जब ख़ुशबू की तरह घटनाएं घटित हों, तो ये हमारे अंदर असुरक्षा पैदा करती हैं, चाहे ऑफ़िस में हों या घर पर. डर हमेशा बना रहता है. हमारे साथ कुछ भी हो सकता है. एसपीओ की नौकरी करना आसान नहीं. मैं ग़रीबी की वजह से ये करती हूं. मेरे चार बच्चे हैं. मैं उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाना चाहती हूं. वरना, मैं ये नौकरी नहीं करती."
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