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सैनिक कैसे जाने कि जंग देश के लिए है या सरकार के लिए: ब्लॉग
- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी के लिए
ये ठीक है कि कुछ डर अच्छे होते हैं मगर बहुत से डर अच्छे नहीं भी होते.
जब परमाणु शक्ति राहत और प्रगति का हथियार बनने की बजाय एक आसेब यानी प्रेत की तरह सीमाओं के आर-पार उन करोड़ों लोगों को डराने लगे जिनके पास जीवन को खोने के डर के सिवाय कुछ भी नहीं, तो यह डर अच्छा नहीं है.
जब सिपाही के दिल में यह सवाल लहराने लगे कि वो देश के लिए जान दे रहा है या किसी सरकार के लिए और क्या ये देश और सरकार भी उसके बाद उसके परिवार का पूरी तरह से ध्यान रखेंगे या उसके परिवार को अपने हाल पर छोड़ देंगे तो ऐसा कोई भी डर अच्छा नहीं है.
जब मतदाता के मन में यह डर पैदा हो जाए कि मैं जिसे वोट दे रहा हूं वो इस वोट को अपने की वचन अमानत समझेगा या मेरे वोट को स्वार्थ प्रथा की सीढ़ी बना लेगा तो यह डर अच्छा नहीं है.
किसी भी दो देशों के संबंधों की नींव भले शक की ज़मीन, भय की ईंटों और अज्ञान के गारे से उठे मगर एक-दूसरे को समझने के लिए दिमाग़ की हर खिड़की बंद कर दी जाए और ये खिड़की कभी न खुलने का डर दिल में बैठता जाए तो यह डर अच्छा नहीं है.
जब यह डर पैदा हो जाए कि सिर्फ़ एक आतंकवादी अपनी सिर्फ़ एक ज़हरीली हरक़त से पूरे-पूरे देशों की व्यवहारिक बुद्धि को अपने नापाक एजेंडे का बंधक बनाने के लिए काफ़ी है तो यह डर अच्छा नहीं है.
जब ये डर पैदा हो जाए कि मीडिया किसी भी घटना से फैलने वाले डर को कम करने और डरने वालों को हौसला देने और इस घटना की तह में जाने और खोज करने के बजाय मुंह में रेटिंग का पेट्रोल भरकर आसमान की तरफ़ मुंह करके शोले निकालना शुरू कर देगा तो यह सोच-सोचकर जो डर पैदा होता है वो अच्छा नहीं है.
यक़ीन न आए तो रवांडा का उदाहरण हाज़िर है. जहां रेडियो और चैनलों ने हुतुओं और तुर्सियों की आड़ में लाख-लाख लाशें गिरवा दीं और दामन पर एक छींट भी नहीं आई.
जब मैं सिर्फ़ इस डर के मारे भीड़ का हिस्सा बन जाऊं कि अगर मैं भीड़ का हिस्सा नहीं बना तो मारा जाऊंगा या मेरा हुक्का-पानी बंद हो जाएगा या चलना-फिरना दूभर हो जाएगा तो यह डर अच्छा नहीं है.
जब मुझे लोकतंत्र के ख़्वाब में भी फासिज़्म का शैतान आ-आकर डराने लगे तो यह डर अच्छा नहीं है. जब मैं सामने वाले को इस डर से मार दूं कि मुझे किसी ने बताया है कि मैंने अगर उसे आज नहीं मारा तो एक दिन वो मुझे मार देगा तो यह डर न तो मेरे लिए अच्छा है और न तो सामने वाले के लिए.
ये डर सिर्फ़ उसके लिए अच्छा है जिसके पास डराने के अलावा कोई दूसरा हथियार नहीं. कोई कभी ये भी तो बताए कि डर को कैसे मारा जाए ताकि डर ही डरकर भाग जाए.
ऐसा कोई न कोई तरीक़ा ज़रूर होगा, मगर फिर डराने वालों का क्या होगा और फिर डर के उत्पादन और उद्योग का क्या होगा कालिया?
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