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कश्मीर में चरमपंथ की राह पर क्यों बढ़ रहे हैं युवाओं के कदम
- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जम्मू कश्मीर में एक शीर्ष ख़ुफ़िया अधिकारी ने बीबीसी को बताया है कि बीते पांच महीने में 100 कश्मीरी लड़के चरमपंथियों में शामिल होने के लिए जंगलों की ओर गए हैं.
उनका ये भी कहना है कि सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में हिज़्बुल कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद चरमपंथ की राह पर जाने वाले कश्मीरी युवाओं की ये सबसे बड़ी संख्या है.
कश्मीर घाटी में लंबे समय से अपने पैर जमाए हिज़्बुल मुजाहिदीन ने बुरहान वानी की दूसरी बरसी से ठीक पहले ये दावा किया कि 20 नए युवा उसके साथ जुड़ गए हैं.
इनमें से चार युवा सोपोर और कुपवाड़ा से हैं जबकि बाकी शोपियां, कुलगाम और पुलवामा के रहने वाले हैं.
घर का एक सदस्य पुलिस में दूसरा 'चरमपंथी'
भारतीय सुरक्षा तंत्र को सबसे अधिक परेशान करने वाली बात ये है कि इन नए चरमपंथियों में शम्सुल हक़ भी शामिल हैं, जो भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी इनामुल हक़ के छोटे भाई हैं.
शोपियां के रहने वाले इनामुल हक़ भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में तैनात रहे हैं.
पुलिस के एक आला अधिकारी का कहना है, ''इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है. ऐसे दर्जनों चरमपंथी हैं जिनके पिता या भाई पुलिस अधिकारी हैं.''
अपना नाम ज़ाहिर नहीं करने की शर्त पर जम्मू कश्मीर में ख़ुफ़िया विभाग के एक अधिकारी ने बीबीसी को बताया, ''युवाओं को चरमपंथ की राह पर जाने से रोकने के लिए हम अपनी ओर से हर संभव प्रयास कर रहे हैं. हम माता-पिता से भी कह रहे हैं कि वो अपने बच्चों पर नज़र रखें, उन्हें परामर्श दें और चरमपंथ की राह पर जाने के नतीजे बताएं. लेकिन हालात बदल नहीं रहे हैं.''
श्रीनगर स्थित भारतीय सेना की 15 कोर के मुताबिक, बुरहान वानी के मारे जाने के बाद शुरू किए गए 'ऑपरेशन ऑल आउट' में कम से कम 350 चरमपंथी मारे गए हैं, लेकिन पूरी कश्मीर घाटी में अभी भी लगभग 275 चरमपंथी सक्रिय हैं.
'ग़ुस्साए युवा सब पर भारी'
एक आला पुलिस अधिकारी का कहना है, ''हर चरमपंथी मरने के बाद भी चार नए चरमपंथी पैदा करने की क्षमता रखता है. इसकी वजह ये है कि मुठभेड़ के बाद शांति बहाल तो होती नहीं है. लोग मुठभेड़ वाली जगह पर जुट जाते हैं, पथराव करते हैं जिसके जबाव में सुरक्षाबलों को भी कार्रवाई करनी पड़ती है. दुर्भाग्य की बात ये होती है कि इसमें आम लोग मारे जाते हैं. इससे आम लोगों में संदेश ये जाता है कि हथियार उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.''
कश्मीर घाटी में मौजूद विश्लेषकों का मानना है कि भारत सरकार की ओर से राजनीतिक पहल नहीं होने की वजह से चरमपंथी आंदोलन गति पकड़ता है.
स्तंभकार रियाज़ मलिक कहते हैं, ''बातचीत की कोशिश अपनी विश्वसनीयता पहले ही खो चुकी है. भारत-पाकिस्तान के बीच और भारत के साथ कश्मीरी पृथकतावादियों की इस तरह की 150 से अधिक दौर की बातचीत हो चुकी है. लेकिन ऐसी हर कोशिश के बाद हत्याएं और गिरफ्तारियां बढ़ी हैं. अब हुआ ये है कि गुस्साए युवा सब पर भारी पड़ रहे हैं और कोई उन्हें सुनने को राज़ी नहीं है.''
भारत सरकार ने सभी पक्षों से बातचीत के लिए एक पूर्व ख़ुफ़िया अधिकारी को अपना आधिकारिक वार्ताकार बनाया, लेकिन पृथकतावादियों और चरमपंथियों ने इस पहल को एक 'मज़ाक' माना.
जम्मू कश्मीर इस समय राजनीतिक अस्थिरता की चपेट में है, राज्य पर इस समय केंद्र सरकार का सीधा नियंत्रण है. दूसरी ओर सूबे की अवाम ग़ुस्से से भरी हुई है जिसे सुरक्षा अधिकारियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है.
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