You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
क्या कश्मीर के हिंसक प्रदर्शन बड़े ख़तरे का संकेत हैं?
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत प्रशासित कश्मीर इन दिनों अशांति के दौर से गुज़र रहा है. हिंसा और तनाव के दौर में विश्लेषक ये आशंका भी जताने लगे हैं- क्या कश्मीर भारत के हाथ से निकल रहा है?
बीते साल की गर्मियों में भी कश्मीर की घाटी हिंसा की चपेट में थी.
बीती जुलाई में भारतीय सुरक्षा बलों से हुई मुठभेड़ में चरमपंथी बुरहान वानी की मौत के बाद भड़की हिंसा में 100 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई थी.
चार महीने तक मुस्लिम बहुल आबादी वाली घाटी उबलती रही, इसमें 55 दिन तो कर्फ़्यू लगा रहा. इन गर्मियों में भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं दिख रही है.
अप्रैल में श्रीनगर में हुए उपचुनाव के दौरान महज 7 फ़ीसदी मतदान के बीच ख़ूब हिंसा देखने को मिली. स्थिति तब और भड़क गई जब सुरक्षा बल और कश्मीरी युवा अपने साथ होने वाली ज्यादतियों को दर्शाने वाले वीडियो शेयर करने लगे.
इसके बाद घाटी की गलियों में छात्रों का ग़ुस्सा देखने को मिला. इतना ही नहीं कश्मीर की छात्राएं भी पुलिस वाहन पर पत्थर फेंकती नज़र आने लगीं.
कश्मीर की बिगड़ती स्थिति से परेशान मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती को केंद्र सरकार से बातचीत करने के लिए नई दिल्ली आना पड़ा.
उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की है कि वे बातचीत की पेशकश करें और कोई सामंजस्य का रास्ता निकाले. महबूबा पहले से भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन करके मुश्किलों का सामना कर रही हैं.
बहरहाल, ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने महबूबा से कहा- 'घाटी के अंदर अलगाववादी और दूसरे अशांति फैलाने वाले समूहों को बातचीत की पेशकश नहीं कर सकते, चाहे घाटी में हिंसा और चरमपंथी हमले का दौर जारी रहे.'
राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कांफ़्रेंस पार्टी के नेता फ़ारूख़ अब्दुल्ला ने चेताया है कि कश्मीर भारत के हाथ से निकल रहा है.
अब्दुल्ला ने ये सलाह भी दी है कि कश्मीर के सभी साझेदारों से बातचीत करनी चाहिए- पाकिस्तान, अलगाववादी और क्षेत्रीय दल और समस्या का सैन्य हल सोचने के बदले राजनीतिक तरीका निकालना चाहिए.
कश्मीर में पांच लाख सुरक्षा बलों की मौजूदगी को देखते हुए इतना तो स्पष्ट है कि कश्मीर भारत के हाथ से नहीं निकलने जा रहा है. लेकिन देश के जाने माने पत्रकार और स्तंभकार शेखर गुप्ता कहते हैं, "कश्मीर हमारे नियंत्रण में तो है लेकिन भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक तौर पर हम इसे गंवाते जा रहे हैं."
श्रीनगर के उपचुनाव में महज सात फ़ीसदी मतदान से ये तो साफ़ है कि ज़मीन भले आपके कब्ज़े में है लेकिन आप लोगों का समर्थन खो रहे हैं.
ऐसे में कश्मीर के बारे में नई बात क्या है जो भारत के लिए चिंता का सबब है, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के मुताबिक स्थिति नाज़ुक बनी हुई है?
पहली बात तो यही है कि कश्मीर के स्थानीय युवा भारत विरोधी प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे हैं. कश्मीर घाटी में रहने वाले पुरुषों में 60 फ़ीसदी आबादी 30 साल से कम उम्र की है. इनमें ज़्यादातर युवा ग़ुस्से में हैं, उलझन में हैं.
बडगाम के 19 साल के एजाज़ ने मुझे बताया कि उनकी पीढ़ी के लिए उम्मीदें ख़त्म हो रही है. भारत की दमनकारी नीति के सामने वे और उनके दोस्तों को मौत से डर नहीं लगता. हालांकि जब मैंने उसे अकेले में पूछा कि जीवन में तुम्हारा लक्ष्य क्या है तो उसने बताया कि वो प्रशासनिक सेवा में आकर कश्मीर में काम करना चाहता है.
चरमपंथियों की युवा पीढ़ी पढ़ी लिखी है और संपन्न परिवारों से उनका ताल्लुक है. एक चरमपंथी समूह का नेतृत्व करने वाला बुरहान वानी, बेहद शिक्षित और संपन्न परिवार का लड़का था. उसके पिता सरकारी स्कूल के शिक्षक हैं. वानी का छोटा भाई खालिद राजनीति विज्ञान का छात्र था, जिसकी मौत सुरक्षा बलों के हाथों 2013 में हुई थी.
एक विद्रोही समूह का कमांडर ज़ाकिर राशिद भट्ट चंडीगढ़ के इंजीनयरिंग कॉलेज से शिक्षा प्राप्त है.
राज्य में दो साल की गठबंधन सरकार, ने अपने कई वादे पूरे नहीं किए हैं. कई विश्लेषकों के मुताबिक दो एकदम भिन्न विचारधार वाली पार्टियां- नरम अलगाववाद की हिमायती पीडीपी और हिंदू राष्ट्रवाद की समर्थक भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन विचित्र माना जा रहा है और इससे संघर्ष की स्थिति बन रही है.
केंद्र सरकार का संदेश भी काम नहीं आ रहा है. नरेंद्र मोदी ने घाटी के युवाओं से अपील की कि उन्हें टेररिज़्म और टूरिज़्म में से एक को चुनना होगा, तो स्थानीय लोगों को लगा कि उनके लंबे संघर्ष को कमतर दिखाया जा रहा है.
जब भारतीय जनता पार्टी के महासचिव राम माधव ने एक अख़बार से कहा कि अगर लोगों ने सरकार का साथ नहीं दिया तो उनसे सख़्ती से निपटा जाएगा तो लोगों को ये सरकार का घमंड लगा है.
कट्टर हिंदुत्ववादी समूहों द्वारा देश के अन्य हिस्सों में मुसलमानों के ख़िलाफ़ हवा बनाने, गोरक्षा के नाम पर मुस्लिम मीट दुकानदारों पर हमला करने, से भी घाटी के लोगों में एकजुटता दिख रही है. घाटी के एक प्रभावी नेता ने कहा कि मध्यमार्गी मुसलमान अब हाशिए पर जा रहे हैं, कट्टर मुसलमान बढ़ रहे हैं.
वहीं सुरक्षा बलों को भी चिंता इस बात की है कि घाटी के युवाओं में धार्मिक कट्टरता बढ़ रही है.
कश्मीर के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी जेएस साधु ने एक समाचार पत्र से कहा है कि, "चरमपंथियों को आम लोगों की मदद, उनका महिमामंडन और कट्टरता में बढ़ोत्तरी चिंता के विष्य है."
एक अन्य सैन्य अधिकारी ने बताया कि धार्मिक कट्टरता पत्थरबाजी से बड़ी चुनौती है. उनके मुताबिक बीते एक दशक में सउदी अरब से प्रभावित वहाबी समुदाय की 3000 से ज़्यादा मस्जिदें राज्य में बन गए हैं.
इस महीने हुए उपचुनाव में महज़ सात फ़ीसदी मतदान से मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के सामने संकट बढ़ा है. नेशनल कांफ्रेंस के नेता जुनैद अज़ीम मट्टू ने कहा, "अगर मुख्यधारा की राजनीति को लोग वोट देने नहीं आएंगे तो असंगठित ताक़तें खाली जगह को भरने आएंगी ही."
अपने संस्मरण में ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के पूर्व मुखिया अमरजीत सिंह दुल्लत ने लिखा है कि कुछ भी स्थिर नहीं है, कम से कम पूरे कश्मीर में.
लेकिन मौजूदा समय में लग रहा है कि भारत सरकार के प्रति युवाओं का ग़ुस्सा और लोगों का आक्रोश एकमात्र स्थिर बात है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)