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कश्मीर की ये 'पत्थरबाज़ लड़कियां'
कश्मीर से आने वाली पत्थरबाज़ी की तस्वीरों में पहले ज़्यादातर लड़के दिखाई देते थे.
लेकिन अब सुरक्षा बलों के साथ होने वाले झड़पों में लड़कियां भी दिखाई देने लगी हैं.
सोमवार को हफ्ते भर की बंदी के बाद कश्मीर घाटी के स्कूल और कॉलेज जब दोबारा खुले तो सड़कों पर कुछ और ही मंज़र देखने को मिला.
वैसे तो कश्मीर में विरोध प्रदर्शन और सुरक्षा बलों के साथ हिंसक झड़पें कोई नई बात नहीं है.
लेकिन लड़कियों का पत्थरबाज़ी में शामिल होने नए चलन के तौर पर उभर रहा है.
स्थानीय मीडिया से मिल रही रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि अब कश्मीरी लड़कियां भी आजादी और भारत विरोध के नारे लगा रही हैं.
उनमें से ज्यादातर स्कूल और कॉलेज जाने वाली लड़कियां हैं. उनकी पीठ पर लदा बैग और यूनिफॉर्म इसकी तस्दीक करते हैं.
कश्मीर पर नज़र रखने वाले लोग इस घाटी में होने वाले विरोध प्रदर्शनों और हिंसक झड़पों का नया चेहरा करार दे रहे हैं.
नौजवान लड़कियां सुरक्षा बलों के खिलाफ विरोध का झंडा बुलंद कर रही हैं. सोशल मीडिया पर ये तस्वीरें लगभग वायरल सी हो गई हैं.
तस्वीरों में बुर्कानशीं लड़कियां देखी जा सकती हैं जो पुलिस और सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंक रही हैं.
ये तस्वीरें श्रीनगर के मौलाना आज़ाद रोड पर मौजूद गवर्नमेंट कॉलेज फ़ॉर वीमेन के पास की हैं.
सामाजिक हलकों में गवर्नमेंट कॉलेज फ़ॉर वीमेन को प्रतिष्ठित कॉलेज माना जाता है.
24 अप्रैल को श्रीनगर के अलग-अलग इलाकों में सुरक्षाबलों के साथ छात्राओं की झड़पें हुईं.
अप्रैल में ही श्रीनगर में हुए उपचुनाव के दौरान महज 7 फ़ीसदी मतदान के बीच ख़ूब हिंसा देखने को मिली.
स्थिति तब और भड़क गई जब सुरक्षा बल और कश्मीरी युवा अपने साथ होने वाली ज्यादतियों को दर्शाने वाले वीडियो शेयर करने लगे.
कश्मीर की बिगड़ती स्थिति से परेशान मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती को केंद्र सरकार से बातचीत करने के लिए नई दिल्ली आना पड़ा.
उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की है कि वे बातचीत की पेशकश करें और कोई सामंजस्य का रास्ता निकाले.
महबूबा पहले से भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन करके मुश्किलों का सामना कर रही हैं.
नीति आयोग की बैठक में हिस्सा लेने नई दिल्ली आईं राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कश्मीर मसले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सोमवार को मुलाकात की.
उन्होंने दोहराया कि कश्मीर पर अटल बिहारी वाजपेयी की रणनीति को अपनाने की ज़रूरत है, डोर के सिरे को वहीं से पकड़े जाना चाहिए जहां वाजपेयी ने उसे छोड़ा था.
कश्मीर के ज्यादातर राजनेता इन दिनों वाजपेयी की कश्मीर नीति की चर्चा करते हैं और उसे अपनाने पर ज़ोर देते हैं.
भीड़ पर काबू पाने के लिए पुलिस ने कहीं-कहीं आंसू गैस के गोले भी छोड़े.
उधर, भारत प्रशासित कश्मीर के तमाम अख़बार, छात्रों और सैन्य बलों के बीच ताज़ा मुठभेड़ पर गंभीर चिंता जता रहे हैं और मोदी सरकार से अपील कर रहे हैं कि वो पाकिस्तान समेत 'सभी पक्षों' से बातचीत करे.
सोमवार को श्रीनगर के लाल चौक में छात्रों और पुलिस के बीच झड़प में एक वरिष्ठ अधिकारी और दो छात्राएं घायल हो गई थीं.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ बीते गुरुवार को भी श्रीनगर के नवकडल इलाके में ऐसी ही एक झड़प में एक लड़की घायल हो गई थी.
घायल लड़की का श्रीनगर के महाराज हरि सिंह अस्पताल में इलाज कराया जा रहा है.
राज्य भर में हो रहे इन विरोध प्रदर्शनों के मद्देनज़र एक सप्ताह के लिए स्कूल और कॉलेज बंद भी कर दिए गए थे.
कई कश्मीरी अख़बारों ने लिखा, "छात्र क्लास में जाएं और पुलिस उनसे दूर रहे."
कई अख़बारों ने राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती के इस बयान को पहले पन्ने पर जगह दी जिसमें उन्होंने कहा कि ये मसला राजनीतिक है और इसका राजनीतिक हल ही निकल सकता है.
कई अख़बारों ने पीडीपी-भाजपा की गठबंधन सरकार को राज्य के ख़राब हालात के लिए ज़िम्मेदार ठहराया और इसे 'नाकाम गठबंधन' क़रार दिया.
बीती जुलाई में भारतीय सुरक्षा बलों से हुई मुठभेड़ में चरमपंथी बुरहान वानी की मौत के बाद भड़की हिंसा में 100 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई थी.
चार महीने तक मुस्लिम बहुल आबादी वाली घाटी उबलती रही, इसमें 55 दिन तो कर्फ़्यू लगा रहा. इन गर्मियों में भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं दिख रही है.
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