कश्मीर का वो इलाका जहां कोई वोट देने नहीं आया

    • Author, जस्टिन रॉलेट
    • पदनाम, बीबीसी दक्षिण एशिया संवाददाता

पिछले हफ़्ते भारत प्रशासित कश्मीर में हुए उप-चुनाव के दौरान आठ लोग मारे गए थे और सौ से ज्यादा घायल हो गए थे.

अलगाववादी नेताओं ने मतदाताओं से मतदान का बहिष्कार करने की अपील की थी.

चुनाव का विरोध करने वाले प्रदर्शनकारियों ने डेढ सौ से ज्यादा मतदान केंद्रों पर हमला किया.

गुरुवार को निर्वाचन आयोग ने फिर से इन मतदान केंद्रों पर मतदान कराने की कोशिश की. इस दौरान इन मतदान केंद्रों पर सुरक्षा के भारी बंदोबस्त रहें.

लेकिन मतदाताओं के अभाव में यह चुनाव एक निराशा भरी कवायद ही बन कर रह गई.

मतदान शुरू होने के पांच घंटे के बाद जब मैं एक मतदान केंद्र पर पहुंचा था तब वहां उस समय तक एक भी मतदान नहीं हुआ था.

जैसे ही मैं वहां पहुंचा, बोर हो रहे सात निर्वाचन अधिकारियों की आंखे उम्मीद से मेरी ओर उठी.

यह देखना बहुत निराशाजनक था. खिड़कियां टूटी पड़ी हुई थीं लेकिन किसी ने भी टूटी हुई खिड़कियों के शीशे हटाने की जहमत नहीं उठाई थी.

रविवार को प्रदर्शनकारियों ने इमारत में तोड़फोड़ की थी और पत्थर फेंके थे. इसके बाद मतदान केंद्र बंद कर दिया गया था और अब मतदान हो रहा था.

मैंने उन निर्वाचन अधिकारियों को अपना परिचय दिया और पूछा कि कैसा चल रहा है सब कुछ. उनमें से एक अली मोहम्मद ने जवाब दिया, "यहां बैठ कर अंडे सेने का काम कर रहे है."

उनके कहने का मतलब था कि खाली बैठे हुए हैं.

जब मैंने पूछा कि इतनी शांति कैसे है तो उन्होंने माना कि कहीं भी कोई अप्रिय घटना ना हो इसे सुनिश्चित करने की भारत सरकार की कोशिशों की वजह से हो सकता है कि कई मतदाता ना निकल पाए हो.

निराशाजनक रवैया

कश्मीर दुनिया में एक ऐसी जगह है जहां बड़ी तदाद में फ़ौज की मौजूदगी रहती है. यहां प्रति व्यक्ति फ़ौज की संख्या सीरिया और इराक़ से भी ज्यादा है.

गलियां फ़ौज से पटी पड़ी हुई थी और हम उनके बीच से गुजर रहे थे. हर तीन मतदाता पर एक जवान तैनात किया गया था.

लेकिन निर्वाचन अधिकारी मोहम्मद मतदाताओं के इस निराशाजनक रवैये के पीछे सिर्फ़ फ़ौज की भारी उपस्थिति को जिम्मेवार नहीं मानते.

वो पेशे से एक शिक्षक हैं. वो कश्मीरियों के इस निराशाजनक रवैये से दुखी भी है.

वो कहते हैं, "मतदान का अधिकार होना महत्वपूर्ण है." थोड़ी देर ठहर कर वो फिर बोलते हैं, "इससे हमें अपनी किस्मत तय करने की ताक़त मिलती है."

मोहम्मद की बातें इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाती हैं कि रविवार को सिर्फ़ सात प्रतिशत मतदान हुआ है. जो कश्मीर की सभी मुख्यधारा की पार्टियों के ऊपर एक सवाल खड़ा करती है.

अलगाववादियों के बहिष्कार का अह्वान और मतदान केंद्रों पर भीड़ की ओर से पत्थरबाजी करने के बावजूद चुनाव में लोग मतदान करने आते अगर कश्मीर के राजनेता लोगों को उज्जवल भविष्य की उम्मीद जगा सकते.

मैंने हमले के शिकार दूसरे मतदान केंद्रों के बाहर जमा नौजवानों से उनकी राय जाननी चाही. मैंने उनसे पूछा कि पत्थर फेंकने वालों में आप में से कितने हैं

वो थोड़ा नर्वस दिख रहे थे. फिर करीब 13,14,15 हाथ उठे होंगे. करीब आधे.

सभी को अपनी इस हरकत को जायज ठहराने की एक ही वजह थी आज़ादी की मांग. कश्मीरी लंबे समय से आज़ाद कश्मीर का ख्वाब देखते रहे हैं. भारत किसी भी क़ीमत पर इसे पूरा करने की मंशा नहीं रखता.

अस्सी-नब्बे के दशक में आज़ाद कश्मीर की मांग के साथ हथियारबंद आंदोलन का दौर कश्मीर में शुरू हुआ था. अब इस आंदोलन से जुड़े लोगों की संख्या बहुत कम हो चुकी है लेकिन भारत सरकार का विरोध घाटी में व्यापक रूप से है.

इसी वजह से नौजवान चुनाव की प्रक्रिया को बाधित करने की कोशिश कर रहे हैं. इनमें से एक नौजवान कहता है, "सभी नेता एक जैसे हैं और उनमें से कोई भी आज़ादी की मांग नहीं पूरा करने वाला है. तो क्यों वोट किया जाए."

लेकिन विकल्प क्या है.

इन नौजवानों से मिलने वाली प्रतिक्रिया ना ही कश्मीर के लिए और ना ही भारत के लिए अच्छी जान पड़ती है. वे कहते हैं कि वे लड़ना चाहते हैं.

एजाज़ अमीन कहते हैं, "जब आप एक के बाद एक अत्याचार झेलते हैं तो आपके अंदर से डर खत्म हो जाता है. हमें अब किसी चीज़ से डर नहीं लगता."

उन्होंने बताया कि वो कभी भी हिंसक कार्रवाइयों में शामिल नहीं रहे. वो एक उर्दू की शायरी सुनाते हैं जिसका मतलब होता है कि "हमारे सिर पर कफन बंधा हुआ है."

इसका मतलब वो जो चाहते हैं उसे पाने के लिए वो कुछ भी कर सकते हैं. वो मरने तक लड़ सकते है.

दोपहर के बाद मैं क्षेत्र के सबसे कुख्यात गांव में पहुंचा. यहां भी मतदान नहीं हुआ था. सैकड़ों नौजवान हाथों में पत्थर लेकर सुरक्षा बलों पर फेंकने के लिए जरूर बाहर निकले हुए थे.

ऐसा लगता है कि यह तो कश्मीर की रवायत बन चुकी है. कश्मीर में हर हफ़्ते इस तरह के दंगे फसाद हुआ करते हैं.

चार बजे मतदान का समय खत्म होने के बाद सुरक्षा अधिकारी ने भीड़ पर आख़िरी गोला दागा और अपनी गाड़ी में बैठकर वहां से फौरन रवाना हो गए.

कश्मीर के निर्वाचन आयोग ने दो घंटे के बाद घोषणा कि कुल 709 मतदाताओं ने वोट दिए. यह सिर्फ़ दो फ़ीसद था.

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