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नज़रिया: कश्मीर और हिंदुस्तान का रिश्ता होगा बहाल?
- Author, अपूर्वानंद
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
वह एक खूबसूरत जवान था. हँसता हुआ नूरानी चेहरा. मुझ अजनबी से हँसते हुए ही हाथ मिलाया. नाम मुदस्सर मान लें.
'कश्मीरी हूँ, दरियागंज में रहता हूँ .कमरा खोज रहा था विजय नगर में जिससे यूनिवर्सिटी के करीब रह सकूं, लेकिन...' .
एक तो मुसलमान, दूसरे कश्मीरी, आगे का हिस्सा मैंने पूरा किया.
'जी हाँ! फिर जो हालात हैं, सोचा, हिफाजत जहाँ हो सके, वही जगह मुनासिब है. दिल्ली विश्वविद्यालय के समाज कार्य विभाग में पढ़ाई की. एक एक्टिविटी के दौरान एक सहपाठी ने पीछे पाकिस्तानी का बिल्ला चिपका दिया .'
मुदस्सर जब यह कह रहा था, हँसी एक क्षण के लिए भी कहीं गई नहीं थी.
क्या यह अपने हाल पे थी या हिंदुस्तानियों पर जिन्हें कश्मीर चाहिए लेकिन कश्मीरियों से खाली?
कश्मीर और हिंदुस्तान का रिश्ता वापस बहाल हो सकता है, आज यह सोचना नामुमकिन है.
सरकारी रवैया जो हो, अगर हिंदुस्तानी अवाम के दिल में कोई लगाव नहीं कश्मीरी के लिए तो फिर कश्मीर खुद को क्यों जोड़े हमारे साथ!
'कश्मीर की घाटी डूब रही है' यह लिखा है प्रताप भानु मेहता ने.
डूब रही कश्मीर की घाटी
उसका नमूना है वह वीडियो जिसमें फौज की गाड़ी के आगे एक कश्मीरी को बांधकर बारह किलोमीटर का रास्ता पार किया गया.
दलील फौज की तरफ से पेश कर रहे हैं भारत के पढ़े लिखे लोग,पत्रकार और संपादक. कहा जा रहा है कि पत्थरबाजी रोकने का यह सबसे कम खर्चीला तरीका है!
छर्रे भी नहीं चलाने पड़ेंगे. कश्मीरी नौजवान की ढाल लिए चलती बहादुर भारतीय फौज इस तरह पूरे कश्मीर पर अपना झंडा गाड़ आएगी.
इसके पहले वह वीडियो सामने आया था जिसमें चुनाव के काम पर लगे सुरक्षा बल को कश्मीरी धकिया रहे हैं और मार रहे हैं.
जिस बात पर सुरक्षा बल के इन सदस्यों को शाबाशी देनी चाहिए. वहां भारत के लोग इस संयम की जगह कश्मीरियों को सबक सिखा देने की मांग करने लगे और अगले ही दिन कश्मीरी नौजवान को आगे बांधे फौजी गाड़ी की तस्वीर सामने आ गई .
कश्मीर के प्रसंग में हमारी भाषा कब्जे और दबदबे की है.
कब्जे और दबदबे की भाषा
हम कश्मीरियों को 'नमकहराम' मानते हैं जिनपर भारत का इतना पैसा खर्च होता है लेकिन जो अहसान नहीं मानते. ऐसे लोगों के साथ यही सलूक होना चाहिए. यह ज़्यादातर हिंदुस्तानियों का ख्याल है.
भारतीय जनता पार्टी ने भी कश्मीर में सरकार बनाने के बाद अपने भारतीय समर्थकों को समझाया कि देखो कैसे हम पीडीपी को भी अपने पाले में ले आए. मुझे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक बौद्धिक की वह डींग याद है कि हमने चतुराई से पीडीपी को 'को-ऑप्ट'कर लिया है.
सरकार बनने के बाद जम्मू के तकनीकी संस्थान में कश्मीरी छात्रों के खिलाफ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के आंदोलन को भी याद करें.
आज़ादी का हासिल?
अभी हाल में फिर राष्ट्र गान के अपमान के आरोप में कश्मीरी छात्रों पर कार्रवाई की मांग को भी न भूलें. भारत के अलग-अलग हिस्सों में कश्मीरी छात्र हमेशा शक के दायरे में रहने को मजबूर हैं.
भारतीय आज़ादी के जज्बे के खिंचाव को भूल गए हैं,इसलिए उन्हें कश्मीरी इतने अतार्किक मालूम पड़ते हैं. हमें लगता है कि जब उनकी सारी दुनियावी ज़रूरतें पूरी हो रही हैं तो फिर वे आज़ाद होकर आखिर क्या हासिल करेंगे! लेकिन आज़ादी अपने आप में अपना हासिल है!
अंग्रेजों को भी हैरानी थी कि दुनिया के सबसे सभ्य क़ानून के राज्य में रहने के बाद हिंदुस्तानी अपनी लस्टम पस्टम आज़ादी क्यों कर मांग रहे हैं. अक्सर वे कहा करते थे कि पिछड़ेपन,जातिगत और सांप्रदायिक बंटवारेवाले इस मुल्क को कैसे एक अशिक्षित जनता संभाल पाएगी.
गाँधी ने उनसे कहा कि हमारी फिक्र आप न करें और हमें हमारे हाल पर छोड़ दें! यह तार्किक उत्तर न था! हम इस आज़ादी की शक्ल पर बहस कर सकते हैं. इस पर भी कि यह आजादी खुद अपने अल्पसंख्यकों को कितना आज़ाद रखेगी.
भारत का नुकसान
यह बहस आज की दुनिया में प्रासंगिक है. लेकिन इनके उत्तर मिल जाने तक हम उस घेरेबंदी की किसी भी तरह वकालत नहीं कर सकते जो भारत ने फौजी तरीके से कश्मीर की कर रखी है.
पिछले तीन वर्षों में जम्मू और कश्मीर में जो खाई थी, वह और खतरनाक तरीके से चौड़ी और गहरी हुई है.
जम्मू के व्यापारियों की रोहिंग्या शरणार्थियों की निशानदेही कर उन्हें मारने की धमकी एक और मुस्लिम विरोधी घृणा का नमूना है.
कश्मीर की विडंबना यह है कि भारत के साथ उसके नेताओं के मेल जोल ने उन्हें अपनी जनता की निगाह में अविश्वसनीय बना दिया है.
इसका नुकसान भी भारत को ही होगा. क्योंकि अब उससे बात करने को कोई प्रामाणिक कश्मीरी न होगा .
कश्मीरी जनता के गुस्से को बिकाऊ कहकर पहले ही भारत की सरकार रही सही जगह गंवा चुकी है.
भारत सरकार की नीयत?
याद कीजिए,नोट रद्द करने के पीछे यह तर्क दिया गया था कि चूंकि कश्मीरी पैसे लेकर पत्थर चलाते हैं, नोट न रहने से पत्थर चलने बंद हो जाएंगे.
उसके बाद क्या हुआ? आज तक जो न देखा गया था,वह हो रहा है. कश्मीरी खुद अब खुद-ब-खुद फौजी कार्रवाई की जगह उसे रोकने जमा हो रहे हैं.
वे मारे जा रहे हैं लेकिन यह सिलसिला रुक नहीं रहा है. तो कश्मीरी क्या पैसे के बदले सड़क पर निकल रहे थे?
भारतीय सरकार की भाषा ज़मींदार की है. प्रधानमंत्री जब वहां के नौजवानों को टेररिज्म या टूरिज्म में चुनने को कहते हैं तो यह कश्मीरी कानों को घटिया तुकबंदी की तरह सुनाई देता है.
ज़रूरत एक ईमानदार, इंसानी जुबान की है लेकिन वह कहां है ?
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