लोकसभा चुनाव 2019: मोदी से टक्कर में पुलवामा के बाद क्यों चूक रहे राहुल गांधी

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- Author, कल्याणी शंकर
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक
गुजरात के अहमदाबाद में कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक थी. ये बैठक लोकसभा चुनावों की तारीख़ों की घोषणा के ठीक दो दिनों बाद हुई.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के गृह राज्य से इस बैठक के साथ कांग्रेस ने चुनावों का बिगुल फूंक दिया है.
देखने वाली बात है कि एक महीना पहले तक नरेंद्र मोदी के फिर से जीतने की संभावना मुश्किल लग रही थी. हालांकि, पुलवामा हमले के बाद हालात बदले हैं.
महात्मा गांधी की विरासत पर अपना दावा करते हुए साबरमती आश्रम में प्रार्थना सभा से दिन की शुरुआत करके कांग्रेस ने सीडब्ल्यूसी के माध्यम से कई राजनीतिक संदेश दिए हैं. महात्मा गांधी ने 1930 में 12 मार्च को साबरमती आश्रम से दांडी मार्च की शुरुआत की थी.
कांग्रेस की यह बैठक ख़ुद सरदार वल्लभभाई पटेल स्मारक में हो रही है जिससे ये याद दिलाने की कोशिश है कि पटेल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे थे. इसके अलावा पाटीदार नेता हार्दिक पटेल को पार्टी में शामिल करके दिखाया गया है कि कांग्रेस मज़बूत हो रही है.
इन सबसे ऊपर, ये मोदी और शाह के लिए संकेत है कि कांग्रेस उनके ही गढ़ से उन्हें चुनौती देने के लिए तैयार है. 2017 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को कड़ी टक्कर देने वाली कांग्रेस लोकसभा चुनावों में भी अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद कर रही है.
सबसे महत्वपूर्ण ये है कि सीडब्ल्यूसी की बैठक में पार्टी की चुनावी रणनीति को अंतिम रूप दिया गया और पार्टी के सामने मौजूद चुनौतियों पर भी चर्चा की गई है.

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सबसे पहली चुनौती
ये सच भी है कि कांग्रेस के समक्ष कई चुनौतियां हैं. सबसे पहली चुनौती ये है कि पार्टी को चुनावी प्रक्रिया के लिए कैसे तैयार किया जाए क्योंकि संगठन पूरी तरह से इस चुनौती के लिए तैयार नहीं है.
बूथ समीतियों को सक्रिय करने और उपयुक्त उम्मीदवार चुने जाने की ज़रूरत है. प्रियंका गांधी, राहुल गांधी, सोनिया गांधी और अन्य नेता भीड़ को आकर्षित तो कर सकते हैं लेकिन उसे वोटों में तब्दील करना ज़रूरी है और पार्टी इस मामले में पिछड़ जाती है.
पार्टी ने अपनी ताक़त और कमज़ोरियों की पहचान की है और हर निर्वाचन क्षेत्र के मुताबिक़ रणनीति बनाने पर ध्यान केंद्रित किया है.

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घरेलू मुद्दों पर कैसे लौटें
दूसरी चुनौती ये है कि वह चर्चा को घरेलू मसलों जैसे बिगड़ती अर्थव्यवस्था, नौकरी, कृषि संकट, रफ़ाल और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों की ओर कैसे वापस लाए. इस वक़्त पुलवामा और बालाकोट हवाई हमले के बाद नरेंद्र मोदी चरमपंथ और राष्ट्रवाद के मसले पर उड़ान भर रहे हैं. बीजेपी ने इसका पूरी तरह से फ़ायदा उठाने का फैसला कर लिया है.
वहीं, कांग्रेस नौकरियों, कृषि संकट, रफ़ाल, नोटबंदी, जीएसटी, मोदी सरकार के दावों और 2014 के अधूरे वादों पर ध्यान दे रही थी.
पुलवामा हमले ने सब मसलों को फ़िलहाल पीछे धकेल दिया है. अब कांग्रेस इंतज़ार कर रही है कि किस तरह इन्हें फिर से चर्चा के केंद्र में लाया जाए.
साथ ही पार्टी ने अब तक नकारात्मक अभियान चलाया है लेकिन लोग नकारात्मकता को पसंद नहीं करते. सीडब्ल्यूसी में इन सभी मुद्दों पर चर्चा की गई है.

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गठबंधन की चुनौती
कांग्रेस के सामने तीसरी चुनौती गठबंधन को लेकर है. कांग्रेस अलग-अलग राज्यों में गठबंधन की कोशिश में लगी हुई है और डीएमके की तरह कुछ दलों के साथ उसने सफलता भी पाई है.
अब उसका जनता दल(सेक्युलर) आरजेडी, सीपीआई-एम और अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ सीटों का बँटवारा होना बाकी है.
यूपी का यहां ख़ास महत्व है क्योंकि अभी एसपी-बीएसपी के साथ कांग्रेस की बातचीत पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई है. ऐसे में कांग्रेस को अपनी इन कमियों को जल्द से जल्द दुरुस्त करना होगा.
सीडब्ल्यूसी को पता है कि कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं है और उसे राज्यों में गठबंधन करना ज़रूरी है. आख़िरकार चुनावों में आपसी पसंदगी से ज़्यादा संख्या मायने रखती है.

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फंड एक बड़ी समस्या
पार्टी के सामने चौथी चुनौती चुनावों के लिए फंड जुटाने की भी है. कांग्रेस केंद्र में और कई राज्यों में सत्ता में नहीं रही है. ऐसे में चुनाव में होने वाले बड़े खर्चों का प्रबंधन बीजेपी के मुक़ाबले कांग्रेस के लिए मुश्किल हो सकता है. बीजेपी ने वित्तीय वर्ष 2017-18 में 1027 करोड़ रुपए की आय घोषित की है.
वहीं, राहुल गांधी बहुत मेहनत कर रहे हैं लेकिन उनकी छवि को लेकर धारणा अब भी बनी हुई है. लोग सवाल पूछते हैं कि अगर मोदी नहीं, तो उनकी जगह कौन.
राहुल गांधी ने अपनी छवि बदलने की कोशिश की थी और पिछले एक साल में इस दिशा में सही क़दम भी उठाए हैं लेकिन अब भी उन्हें अपने लक्ष्य तक पहुंचना बाक़ी है. इसलिए अपनी छवि को मज़बूत करना बहुत अहम है. इसके लिए मतदाताओं से जुड़ना बहुत ज़रूरी है.
राजनीति में संदेश देना बहुत महत्वपूर्ण होता है और सीडब्ल्यूसी ने गांधीनगर से देश को कई संदेश दिए हैं. हालांकि, ये संदेश कितनी दूर तक पहुंचते हैं ये मतगणना वाले दिन 23 मार्च को पता चलेगा.
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